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ध्रुव शुक्ल की कविताः रोज़ डूबता दिन भर का संसार

ध्रुव शुक्ल की कविताः  रोज़ डूबता दिन भर का संसार



दिन ढलता जाता है

बातें पीछे-पीछे आती हैं


फिर बातें ही बातों से उग आती हैं

कभी अंधेरे में खो जाती हैं

और कभी मन में घुटती रह जाती हैं


बातें होती रहती हैं

बात-बात में बातें रोती रहती हैं

अपनी-अपनी दरकार की बातें

अपने कारोबार की बातें

अपनी-अपनी तकरार की बातें

अपनी-अपनी सरकार की बातें

होती रहतीं बेकार की बातें

कभी-कभी ही यार से बातें होती हैं


डूब जाता है दिन, नहीं डूबती बातें

रात काटती रहती बातें

बातों से बात काटती रहती बातें 

हर दिन पर छायी रहतीं बीते कल की बातें


रोज़ डूब जाता है दिन भर का संसार

बातें बन जातीं अगले दिन पर भार