breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -भय और बस्ते के बोझ के साथ स्कूल की शुरुआत क्या उचित है?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -भय और बस्ते के बोझ के साथ स्कूल की शुरुआत क्या उचित है?

-सुभाष मिश्र

कोरोना की तीसरी लहर कई देशों में आतंक मचा रही है। कोरोना की दूसरी लहर के भयावह नजारे अभी जेहन से ओझल नहीं हुए हैं। दूसरी लहर में भी बच्चे बड़े पैमाने पर पीडि़त हुए। भारत में केवल 6 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में केवल 7.5 प्रतिशत दोनों डोज का वैक्सीन हुआ है। महामारी 100 साल में सिर्फ एक बार आती है। छत्तीसगढ़ सरकार ने दो अगस्त से स्कूल खोलने का निर्णय लिया है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर के चौथे सीरो सर्वे के अनुसार देश की 86 करोड आबादी में कोरोना एंटीबॉडी बन चुकी है। बावजूद इसके 40 करोड़ लोग अभी भी कोरोना संक्रमण की जद में आ सकते हैं। चिकित्सको की सलाह है की स्कूल-कालेज खोलने से पहले सभी शिक्षक और स्टॉफ का वैक्सीनेशन हो जाना जरूरी है। अभी हमारे देश में ऐसे हालत नहीं हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों की शिक्षा की दृष्टि से अगली 1 जुलाई 2022 काफी सुरक्षित होगा। अर्थात केवल एक साल इंतजार करना है। तब तक बच्चों से लेकर बड़ों तक के टीके आ जायेंगे।
शिक्षक संस्थानों को खोलना दोधारी तलवार की तरह है। सरकार द्वारा कोविड अनुशासन के नाम पर समय-समय पर जारी गाईड लाइन की जिस तरह से अनदेखी हो रही है, वह किसी से छिपी नहीं है। बाजार, मॉल और भीड़-भाड़ जगहों में जब वयस्क आबादी जो कोरोना की भयावह से वाकिफ हैं, वे भी कोरोना गाइड लाइन का पालन नहीं कर पा रहे हैं। अधिकांश लोगों की राय है कि बच्चों के स्कूल अभी बिलकुल भी नहीं खोले जाने चाहिए। जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं के नारो तक सभी टीचर, सभी विद्यार्थियों और सहयोगी स्टॉफ को टीके नहीं लग जाते तब तक वैकल्पिक माध्यम से ही पढ़ाई-लिखाई होना चाहिए।

सरकार के निर्णय अनुसार छत्तीसगढ़ में तकनीकी शिक्षा, नर्सिंग जैसी संस्थान 2 अगस्त के बाद से खुल सकेंगे। कॉलेज में फाइनल ईयर की क्लास पहले लगेगी। 20 दिन के बाद यानी की 20 अगस्त के बाद सेकेंड और फस्र्ट ईयर की कक्षाएं शुरु होंगी। कॉलेज में स्टूडेंट्स का जाना जरूरी नहीं होगा। स्कूल में 50 प्रतिशत स्टूडेंट को बुलाया जाएगा। यानी एक दिन के गैप में स्टूडेंट स्कूल पहुंचेंगे। शहरी स्कूलों में 10वीं की कक्षाएं खुलेंगी। ऐसी ग्राम पंचायतें जहां कोविड के जीरो केस हैं, वहां ग्राम पंचायत और पालक समिति आपस में तय करने के बाद प्राईमरी स्कूल खोल सकती है। शहरी इलाकों में पार्षद और स्कूल प्रबंधन के अलावा अभिभावकों की समिति ये तय करेगी। ये स्थानीय स्तर पर तय किया जाएगा। लेकिन कोविड प्रोटोकाल का पालन करना होगा। सवाल ये है की इस प्रोटोकाल का पालन कौन करायेगा? सामान्य दिनो में तो शिक्षा समितियां सक्रिय नहीं रहती फिर उनसे और प्रतिनिधियो से यह अपेक्षा कहीं भारी ना पड़ जाये। छत्तीसगढ़ में पिछले साल 1 अप्रैल 2020 से स्कूल बंद थे। छत्तीसगढ़ में कोरोना संक्रमण कम होने के चलते ज्यादातर जिलों में सार्वजनिक स्थान, मॉल-बाजार खोल दिए गए हैं। कुछ राज्य पहले ही स्कूल खोलने का फैसला कर चुके हैं। स्कूल खोलने की रणनीति के अंतर्गत शिक्षकों व स्टॉफ को जल्द से जल्द वैक्सीन लगवाने, कोरोना गाइडलाइन का अनिवार्य रूप से पालन कराने जैसी बातों को शामिल किया जायगा। स्कूल खोलने से पहले सरकार उन शिक्षकों का टीकाकरण कराने पर फोकस कर रही है, जिनका टीकाकरण अब तक नहीं हो सका है। इसके लिए सरकार ने बाकायदा एक सर्वे भी करा लिया है। इसमें वो सूची तैयार की गई है कि किन-किन टीचरों ने अब तक कोरोना का टीका नहीं लगवाया है। इसमें यह बात सामने आई थी कि 13 फीसदी टीचर्स ने अलग-अलग कारणों से अब तक वैक्सीन नहीं लगवाया है।

भारत में जहां दूसरी लहर से अभी राहत दिख रही है, वहीं रोजाना 40 हजार के करीब नए मरीज अभी भी सामने आ रहे हैं और 500 के करीब मौतें हो रही हैं। ऐसे में अधिकांश राज्य शिक्षण संस्थान खोलने को आतुर दिखाई दे रहे हैं। आईसीएमआर के डिवीजन ऑफ एपिडेमियोलॉजीएंड कम्युनिकेशन डिजीज के प्रमुख डॉक्टर समीरन पांडा ने आशंका जाहिर की है कि अगस्त के अंत तक कोरोना वायरस की तीसरी लहर देश में आ सकती है।  

शिक्षण संस्थानों के खोले जाने की प्रक्रिया के बीच यह सवाल सबके जेहन में है। लोग आपस में बात कर रहे हैं कि क्या बच्चे सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रख पाएंगे? क्या बच्चों को कोरोना की वैक्सीन लगवाने के बाद ही स्कूल भेजें? ऐसे बहुत से सवाल है जिनमें बच्चों के माता-पिता जूझ रहे हैं। तीसरी लहर के डर के बीच क्या ये स्कूल खोलने का यह सही वक्त है? कोरोना वायरस संक्रमण के मामले आना कम जरुर हुए हैं लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। ऐसे में बच्चों को सुरक्षित रखने की माता-पिता की चिंता भी बढ़ गई है। बच्चे अब तक घर के सुरक्षित माहौल में थे लेकिन अब उन्हें अन्य बच्चों के बीच भेजना और उन्हें संक्रमण से बचाए रखना अभिभावकों के लिए बड़ी चुनौती है।

स्कूल शुरू होने के आदेश के बाद अगली बड़ी जिम्मेदारी स्कूलों पर भी आ जाती है। उन्हें बच्चों को सुरक्षित माहौल प्रदान करना है और माता-पिता को भी भरोसा दिलाना है। लेकिन बच्चों की संख्या, उनका घुलना-मिलना, ट्रांसपोर्ट और साफ-सफाई ऐसी चुनौतियां हैं जिनका स्कूलों को सामना करना है। बच्चों को संक्रमण का खतरा सिर्फ शिक्षकों से ही नहीं है बल्कि सहायक स्टाफ से भी है। हमें सहायक स्टाफ को भी सोच-समझकर बुलाना होगा और उनकी जांच करानी होगी। हर एक स्कूल का अपना फार्मूला होगा, उनकी अपनी तैयारियां होगी क्योंकि हर स्कूल में बच्चों की संख्या अलग होती है। सरकारी स्कूलों के लिए एक बड़ी समस्या बच्चों की संख्या है। सरकारी स्कूलों में एक क्लास में 60-70 बच्चे होते हैं, ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

सरकार द्वारा जारी दिशा निर्देशों के मुताबिक बच्चों को स्कूल बुलाने के लिए माता-पिता की सहमति जरुरी है। लोगों के पास ये विकल्प है कि वो अपने बच्चों को स्कूल भेजें या नहीं। ऐसे में सभी बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं लेकिन स्कूल को तो सभी को पढ़ाना है। शत-प्रतिशत शिक्षा के लक्ष्य के बीच पचास फीसदी बच्चों को पढ़ाने बुलाना क्या व्यवहारिक होगा। कोरोना वायरस के डर के अलावा बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण मसला नई दिनचर्या का भी है। जब से कोरोना महामारी शुरु हुई है बच्चों की दिनचर्या बदल गई है। ऐसे में फिर से स्कूल के माहौल में सामंजस्य बैठाने में उन्हें वक्त लग सकता है।  

स्कूल खोलने की जल्दबाजी केवल अधिकांश उन निजी स्कूलों को है जिन्हें किसी व्यापारी के समान शाला से मुनाफे और घाटे का हिसाब-किताब देखना है। बस्ते, जूते, ड्रेस, किताबों, कापियां, वार्षिक कार्यक्रमों के नाम पर वसूली करना है। ज्ञान देना जिनका मकसद नहीं है। जबकि इन शालाओं के शहरी क्षेत्र में होने के कारण नेट की अच्छी उपलब्धता से इन्हें ऑनलाइन पढ़ाई देने में सफलता ही मिली है। सरकार को चाहिए की वह इस पूरे मामले में कतई जल्दबाजी ना करे। बकौल देश के प्रधानमंत्री - जान है तो जहान है।

निदा फाजली का शेर है -
जिन चराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चराग़ों को हवाओं से बचाया जाए
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।।