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छत्तीसगढ़ एक खोज- 24वीं कड़ी: माधव राव सप्रे – रमेश अनुपम

छत्तीसगढ़ एक खोज- 24वीं कड़ी: माधव राव सप्रे – रमेश अनुपम

वामन बलीराम लाखे, माधवराव पाध्ये, केशवराव पाध्ये जेल में माधवराव सप्रे से मिलकर माफीनामा पर दस्तखत करने के लिए मानमनौव्वल करते रहे, पर माधवराव सप्रे अपने निर्णय में अडिग थे। 

माधवराव सप्रे के इस निर्णय के विषय में  वामन बलिराम लाखे ने  पितातुल्य बड़े भाई बाबूराव को  जानकारी दी । उस समय तक बाबूराव भी अपने भाई को किसी तरह जेल से छुड़ाने के लिए नागपुर पहुंच चुके थे।

बाबूराव ने माधवराव सप्रे के मित्रों से कहा कि अगर माधवराव सप्रे माफीनामा पर दस्तखत नहीं करते हैं, तो वे आत्महत्या करने के लिए विवश होंगे। 

वामन बलिराम लाखे, केशवराव पाध्ये और माधवराव पाध्ये ने जेल जाकर यह बात माधवराव सप्रे को बताई। माधवराव सप्रे अपने पितातुलय बड़े भाई के इस निश्चय को सुनकर विचलित हो उठे। 

उनके मन में अपने पितातुल्य बड़े भाई के प्रति अपार सम्मान का भाव था। वे  अपने पितातुल्य बड़े भाई को इस तरह मरते हुए नहीं देख सकते थे.

उन्होंने रोते हुए माफीनामा पर दस्तखत कर दिए। माधवराव सप्रे रो रहे थे, दस्तखत करते हुए उनके हाथ कांप रहे थे।

माधवराव सप्रे का हृदय भी रो रहा था। वे जान रहे थे कि इस तरह से जेल से माफी मांग कर  छूटने से वे जीवन भर इस अभिशाप से मुक्त नहीं हो पाएंगे ।इस अभिशाप को उन्हें जीवन भर  को ढोने के लिए विवश होना पड़ेगा । उन्हें इसके लिए जीवन भर कोई  माफ  भी नहीं करेगा। वे जानते थे कि वे स्वयं भी इसके कभी खुद को माफ  नहीं कर पाएंगे । पर उनके सामने और कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था। उनके पितातुल्य ज्येष्ठ भ्राता बाबूराव का जीवन उनके लिए अमूल्य था।

जिस दिन माधवराव सप्रे की अदालत में पेशी थी, उस दिन उनके वकील केशवराव गोखले और अदालत में उपस्थित सभी लोगों को उस समय गहरी ठेस पहुंची ,जब जज ने माधवराव सप्रे द्वारा दिए गए माफीनामा को पढ़कर सुनाया। 

अदालत में सन्नाटा छा गया, किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि हिंदकेसरी माधवराव सप्रे अंग्रेज सरकार से इस तरह माफी मांग कर छूटेंगे ।

जेल से छूटने पर पंडित जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल माधवराव सप्रे से मिलने गए। माधवराव सप्रे ने उनसे कहा कि आप  ' हिंदी केसरी ’ के अगले अंक में मेरे इस कृत्य की आलोचना कीजिए।

 जग्गन्नाथ प्रसाद शुक्ल ने माधवराव सप्रे के निर्देश का पालन किया। ' हिंदी केसरी ’ के अगले ही अंक में यह मोटे-मोटे अक्षरों में प्रकाशित हुआ :

" माफी मांग कर सप्रे जी ने अपने राजनैतिक सार्वजनिक जीवन का सत्यानाश कर लिया है। इस घटना से सार्वजनिक आंदोलन को, विशेषकर हिंदी पत्रों के बढ़ते हुए जोश की बड़ी हानि हुई है। हिंदी संसार में, हिंदी समाचार पत्रों के इतिहास में यह पहला ही राजद्रोह का मुकदमा था, इसलिए अन्यों की अपेक्षा हिंदी में इसका कहीं अशेष महत्व था। ”

इस दुखद घटना के कुछ दिनों पश्चात ' हिंदी केसरी ' और ' हिंदी ग्रंथ माला ' जैसी हिंदी के दो श्रेष्ठ पत्रों का अंत हो गया। अंग्रेजी हुकूमत के डर से अब लोगों से आर्थिक सहायता मिलनी भी बंद हो गई थी। कर्ज भी काफी हो गया था, प्रेस भी कर्ज की बलि चढ़ गया था।

' हिदी केसरी ' और ' हिंदी ग्रंथ माला ' की पूरी टीम बिखर चुकी थी। पंडित जग्गन्नाथ प्रसाद शुक्ल प्रयाग चले गए और लक्ष्मीधर वाजपेई माधवराव सप्रे के साथ रायपुर आ गए।

शेष अगले रविवार...