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व्यंग्य: ​​क्या से क्या हो गये देखते देखते - अखतर अली

व्यंग्य: ​​क्या से क्या हो गये देखते देखते - अखतर अली


एक कथाकार से साक्षात्कार में पूछा गया – आप रोज़ एक कहानी सोच कैसे लेते है ?

कथाकार ने कहा – मै किसी परिचित को हज़ार रूपये उधार दे देता हूं फिर रोज़ उसके घर पैसे मांगने जाता हूं और वह रोज़ एक नई कहानी सुना देता है |

उधार के संबंध में एक साहब ने बताया – मैंने अब ज़रूरतमंद को उधार देना बंद कर दिया हूं , मै उसे दान दे देता हूं आर्थिक सहयोग | उधारी देने से न पुण्य मिलता है न पैसा , मिलता है बस तनाव और क्रोध , उधार देने से पैसा और दोस्ती दोनों डूब जाते है | उधार दो या दान जब पैसा दोनों ही स्थिति में नहीं मिलना है तो फिर दान ही दिया जाये | दान देने में राहते बहुत है ,इसमें पुण्य मिलता है , वाहवाही मिलती है , ताल्लुक बने रहते है , उससे अच्छी बात यह है कि मै देकर भूल जाता हूं और इससे बड़ा कमाल यह है कि वो भी लेकर भूल जाता है इस तरह मै उसे कर्ज़ के बोझ और झूठ बोलने के अपराध से बचा लेता हूं |

उधारी की बात पर एक अन्य साहब का किस्सा याद आ गया | उनसे उनके एक साथी ने दो दिन के लिये कुछ रकम उधार ली और वादा किया कि वह दो दिन में उनका पैसा वापस कर देगा | साहब ने पैसा उधार दे दिया और लेने वाले ने भी वादे के मुताबिक़ शुक्रिया के साथ पैसे लाकर दे दिया | बस तब से वो साहब टेंशन में है कहते है – उसने उधार लिया और वक्त पर वापस कर दिया नहीं मालूम उसके दिमाग़ में क्या चल रहा है , अल्लाह जाने कहां ले जाकर डूबायेगा ?

अब असल किस्सा शुरू किया जाये | एक चतुर दोस्त मेरे से हज़ार रूपये उधार लेने में कामयाब हो गया | उधार लेकर न देने का उसको लम्बा अनुभव था और देने और वसूलने के क्षेत्र में मै था अनुभवहीन नौसिखिया | दो दिन के लिये ली गई रकम जब दो वर्ष तक वापस नहीं की गई तब मेरे को अहसास हुआ कि मै तो ठगी का शिकार हो गया हूं | अब मैंने भी ठान लिया कि मै अपने पैसे लेकर रहूगा | जिद्धी आदमी बौखलाए सांड से भी ज़्यादा खतरनाक होता है यह मेरा वहम था जो उधारी वसूली के दौरान मेरी समझ में आ गया | अब मै रोज़ सुबह उसके घर पैसा मांगने पहुच जाता हूं |

मेरे को देखते ही वह भड़क जाता है | मांगते समय वह याचक था , वसूली के समय मै याचक हो गया हूं | पहले वह चिंता युक्त था अब चिंता मुक्त हो गया है | युक्त से मुक्त तक की यात्रा में हम दोनों एक ही ट्रेन के यात्री है अंतर बस यह है कि वह ए.सी. प्रथम श्रेणी का यात्री है और मै अनारक्षित बोगी का |

मेरे को देखते ही वह भड़क गया | जो दोस्त को उधारी देते है वो पैसे के साथ साथ मांगने के सारे अधिकार भी दे देते है | लेने वाला पैसे के साथ भड़कने का अधिकार भी ले लेता है | उधारी के लोकतंत्र में नियम और कानून की धज्जिया उड़ जाती है | हम और आप कितना भी उधारी के संक्रमण से बचने का प्रयास करे इसकी चपेट में आ ही जाते है | भावुक आदमी को यह बीमारी जल्दी लगती है | अभी ऐसी किसी वैक्सीन का ईजाद नहीं हुआ है जिस की दो डोज़ से आप उधारी देने के रोग से बच सके | जब मै अपना ही पैसा मांगने उसके सामने खड़ा होता हूं तो ऐसा लगता है डालर के सामने रुपया खड़ा है |

मेरे को देखते ही वह भड़क गया | मेरी विनती और उसका क्रोध देख कर वहां आस पड़ोस के लोग यही समझते थे कि मै उससे मदद मांगने आता हूं | उनके एक हमदर्द ने तो यह तक कह दिया था कि काहे ऐसे लोगो को सिर पर चढ़ा कर रखते हो , इनको ज़्यादा मुंह मत लगाया करो | मेरे तकाज़ा करने पर उसने अपने क्रोध को नियंत्रण में किया , आवाज़ को दबाया और मुट्ठी को कस कर बंद कर के कहा – तुमको कहा था न कि जिस दिन भी पैसा मेरे हाथ में आयेगा तुम को तुम्हारा पैसा घर लाकर दे दूंगा , कोई बात समझा कर बोलो तो तुमको समझ क्यों नहीं आती है ?

उसने जब कहा कि जब भी पैसा हाथ में आयेगा तुमको तुम्हारा पैसा घर लाकर दूंगा तभी मेरे को शंका हो गई थी कि अब पैसा नहीं मिलेगा | जिनको देना नहीं होता है वे लोग हमेशा घर में लाकर देने की बात करते है | जी में आया कि कह दू – मै तो रोज़ ही आप के घर आता हूं तो जिस दिन आपके हाथ में पैसा आयेगा मेरे को यही दे देना , आप क्यों आने का कष्ट करेगे गरज आपको नहीं मेरे को है लेकिन मै उनके क्रोध के डर से कुछ नहीं कहा |

मैंने कहा – आपने प्रेम से समझाया था समझ गया , आपने कहा था जब भी पैसा हाथ में आयेगा आप दे देगे | मै तो माई बाप बस इतना पता करने आया हूं कि आपके हाथ में पैसा कब आयेगा , जहां से आने वाला है वहां से रवाना हुआ या नहीं , रवाना नहीं हुआ है तो कब तक होगा और हो गया है तो हाथ तक कब तक पहुचेगा ? आप के हाथ में इन दिनों कुछ और तो नहीं है वरना पैसा आयेगा और आपका हाथ खाली नहीं रहेगा तो कही वापस न चला जाये | पैसा बहुत जल्दी बुरा मान जाता है उसका आदर , सत्कार , स्वागत नहीं करो तो नाराज़ होकर चला जाता है फिर उसे लाने के लिये कितनी भी मेहनत करो , पसीना बहाओ , सजदे करो वह कभी लौट कर नहीं आता |

फ्राड आदमी उपदेश पसंद नहीं करता है | वह गुस्से में तमतमा गया और मेरे पर हावी होकर कहने लगा – तुम से तो उधार लेकर फस गया अगर मालूम होता कि तुम इतने बेसब्रे हो तो तुम से संपर्क ही नहीं करते | कसम से कह रहा हूं मेरे को पचासों लोग उधार देने के लिये मस्का लगा रहे थे , मेरे आगे पीछे घूम रहे थे लेकिन मैंने तुम को अवसर दिया कि अपने आदमी के होते दूसरे को मौका क्यों दे ? एक मैं हूं जो तुम्हारे लिये इतना सोचा और एक तुम हो अहसान मानना तो दूर मेरा जीना मुश्किल कर दिये हो | सच यार तुमसे उधार लेकर मैंने ज़िंदगी की सब से बड़ी गलती की है तुम इस लायक ही नहीं हो कि तुमसे उधार लिया जाये |

मैंने कहा – ठीक है अब मेरे से कभी उधारी मत लेना |

दोस्त ने दांत पीसते हुए उंगली नचा नचा कर बोला – तुम भी कान खोल कर सुन लो मेरे को आज के बाद पैसा उधार देना भी मत , अगर तुमने मेरे को आइंदा उधार दिया तो फिर मेरे से बुरा कोई नहीं होगा | तुम सोच भी नहीं सकते कि मै तुम्हारी क्या गत बनाउगा , अगर उधार देने का इतना ही शौक है तो दूसरो का दरवाज़ा खटखटाओ |

मैंने बोला – मेरे को दुख पैसे का नहीं है दुख इस बात का है कि तुमने पैसे लेने के लिये झूठ बोला |

दोस्त ने कहा – नोट और वोट झूठ बोल कर ही लिये जाते है | इन दोनों ही प्रकार के एपीसोड में अभिनय एक जैसा ही होता है बस अभिनेता अलग अलग होते है | मुझ गरीब को हज़ार रूपये देकर रोज़ मांगने आ जाते हो , कभी उनके बंगले पर भी जाओ जिसने झूठ बोल कर तुम से तुम्हारा वोट ले लिया है , उससे भी उसके वादे का हिसाब मांगो और कहो कि घोषणा पत्र में जो कहे थे वो करो या मेरा वोट वापस दे दो |

मैंने कहा – मेरे को यह मत समझाओ कि मेरे को क्या करना है ? यह बताओ मेरे पैसे कब दे रहे हो |

दोस्त ने स्पष्ट कह दिया – नहीं देता जाओ जो कर सकते हो कर लो |

मै उसका कुछ नहीं कर सका और यह सोचते सोचते वापस आने लगा नोट हो या वोट क्या हम गलत को देने के लिये श्रापित है ? हमको वसूली करना कब आयेगा ? लेते वक्त वो याचक की मुद्रा में रहते है लेने के बाद हिंसक मोड में आ जाते है ? जब लेने आये थे तब मुंह से फूल झर रहे थे अब मुंह से आग उगल रहे है , वो तो क्या से क्या हो गये देखते देखते |