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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -मीडिया को झूठ की प्रयोगशाला में बदलने की कवायद

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -मीडिया को झूठ की प्रयोगशाला में बदलने की कवायद

- सुभाष मिश्र
मूर्खता पर किसी समाज, धर्म विशेष का कॉपीराइट नहीं है। मंडन मिश्र की संतानें शास्त्रार्थ करने की बजाय सोशल मीडिया से कापी-पेस्ट करके कुतर्क कर रही हैं। चित्रगुप्त को मानने वाले सही ग़लत का सही-सही हिसाब नही रख पा रहे हैं। सत्य अहिंसा परमोधर्म के खेवनहार अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ लिप्सा में लीन हैं। अलग-अलग गुरुओं, धर्मों को मानने वाले बातें तो धर्म की, गुरू की करते हैं पर उनके बताए प्रेम के, सत्य के और त्याग बलिदान के मार्ग पर चलने कोई तैयार नहीं है। जो लोग समाज में गंभीर हैं, संवेदनशील हैं वे हाशिये पर हैं। धर्म की ध्वजा अधिकांश जगहों पर उनके हाथों में है जो धर्म का मर्म ही नहीं समझते। धर्म के नाम पर जब पाखंड, आडम्बर और दिखावा महिमामंडित होने लगता है तो धर्म की मूल भावना कहीं नेपथ्य में चली जाती है। धर्म ध्वजा ऐसे लोगों के हाथ में आ जाती है जिनका क़तई मक़सद वैष्णव जन तो तेने कहिये जे, पीड़ पराई जाने रे तो क़तई नहीं होता। मेरी साड़ी से तेरी साड़ी सफ़ेद कैसे, का स्लोगन रचने वाला बाज़ारू समाज कब इस स्लोगन को जीवन में  उतार लेता है, पता ही नहीं चलता। जब भी कोई किसी प्रवृत्तियों, घटना, वादों पर चोट करता है तो उसे व्यक्ति पर, पार्टी पर , धर्म पर चोट मानकर उस वर्ग, समाज, धर्म, जाति और पार्टी के बहुत सारे लोग भक्त मंडली अनाप-शनाप कमेंट्स पर उतर आते हैं। तार्किक तरीक़े से बात करने की बजाय गाली-गलौज की भाषा का प्रयोग होने लगता है। अखंड भारत की बात करने वाले सोशल मीडिया पर अपने कमेंट के जरिए एक दूसरे के टुकड़े-टुकड़े करने पर मां-बहन करने पर उतर आते हैं। ब्रेकिंग न्यूज या कहें जल्दबाजी और उतावलेपन के इस दौर में बहुत से लोग बिना सोचे-विचारे, तथ्यों को जाने अपनी ऊलजलूल, गाली-गलौच से भरी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। ऐसी प्रतिक्रिया कभी तर्क, ज्ञान, शोध पर आधारित नहीं होकर जानबूझकर फैलाई जा रही वैमनस्यता का ही विस्तार होती है।

दरअसल जो समाज इन दिनों बन रहा है, दुर्भाग्यवश उसमें धर्म और आस्था के नाम पर अंधधार्मिकता और संकीर्णता का बोलबाला है।  बल्कि अंधधार्मिकता को ही धर्म और कुतर्क को ही विवेक समझे जाने का रिवाज बन गया है। पिछले पांच-सात वर्षों के दौरान इस मनोवृत्ति में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हुई है। साफ दिखाई देता है कि अतार्किकता हमारे समय की मूलवृत्ति बन चुकी है। सामाजिक जीवन में उसकी बढ़ती स्वीकृति  कतिपय राजनीतिक ताकतों की कामयाबी की हवस का नतीजा है जिन्हें नैतिक शुचिता और सामाजिक मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है।  राजनीतिक सफलता के लिये ये  ताकतें समाज का सब-कुछ दांव पर लगा देने में भी नही ंहिचकतीं। अपने क्षुद्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए सबसे पहले मीडिया पर कब्ज़ा कर उसे पूरी तरह निर्विवेक और अबुद्धिवाद के हवाले कर दिया गया। दूसरे शब्दों में कहें तो मीडिया को अहर्निशझूठ और अर्धसत्य उगलने के यंत्र में तब्दील कर दिया। जनमत निर्माण करने में मीडिया की भूमिका और उसकी ताक़त का अनुमान तो मीडिया-अध्ययन के विशेषज्ञों ने बहुत पहले कर लिया था लेकिन भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर पहली बार किसी राजनीतिक दल ने अपने एजेंडे को राष्ट्रव्यापी स्वीकृति दिलाने के लिए मीडिया का इस्तेमाल झूठ की प्रयोगशाला के उपकरण के रूप में किया। इसके संचालन के लिए बाकायदा डिजिटल आर्मी या आईटी सेल तैयार किया गया जो बड़े पैमाने पर झूठ के उत्पादन और संचार में रात-दिन संलग्न है। सोशल मीडिया ने उसके प्रसार-प्रचार की गति को कई गुना बढ़ा दिया है। फलस्वरूप इस तरह उत्पादित झूठ को सच की तरह ग्रहण करने वाला एक वर्ग तेज़ी से निर्मित हुआ। इस तरह देखें तो झूठ को विश्वसनीय रूप में पेश कर मीडिया ने लगातार अपने दर्शकों और पाठकों को अशिक्षित करने का काम किया है।
हमारा समाज सहज धर्मविश्वासी है। आईटी सेल द्वारा खेप की खेप पैदा की गई इस सामग्री में धर्म, जाति, नस्ल और संस्कृति के मिथ्या और यथार्थ का ऐसा घालमेल है जो एक नजऱ में यथार्थ के करीब दिखाई देता है इसलिये सहज विश्वसनीय भी मालूम पड़ता है। इस अर्धसत्य के पीछे नफऱत, बेईमानी, जाति-द्वेष और अलगाव का ज़हर होता है जो समाज के सामूहिक मनोविज्ञान के भीतर फैलने लगता है। इससे सहज विश्वासी जनसमूह मिथ्या धारणाओं को सच मान बैठता है। लगातार यदि मिथ्या विश्वासों की बमबारी की जाए तो समाज का एक बड़ा हिस्सा उसके प्रहार से अपना सहज विवेक खो देता है। वह किसी भी तथ्य की जांच  किये बगैर उसे स्वीकार न करने के विवेक और अपनी स्वाभाविक तर्कबुद्धि से भी हाथ धो बैठता है। जो परोसा जाए उसे जांचे बगैर वह न केवल सच मान लेता है, बल्कि उस पर आँख मूँदकर भरोसा भी करता है। यही तो भक्ति की आध्यात्मिक अवस्था है लेकिन लोकतंत्र में प्रश्नांकित करने और परीक्षण करने पर विश्वास किया जाता है जिसका इधर व्यापक क्षरण हुआ है। सच पूछा जाए तो मीडिया ने इन वर्षों में तर्क और विवेक की पीठ पर खंजर भोंककर बुरी तरह घायल कर डाला है। एक बुद्धिविहीन और मूढ़ समाज गढऩे के अभियान में उसे दूर तक कामयाबी हासिल हुई है लेकिन यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

विडम्बना है कि इस प्रयत्न में स्वयं मीडिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठता है लेकिन निर्बुद्धि का यदि अमोघ राजनीतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा हो और उसमें कामयाबी भी हासिल हो रही हो तो विश्वसनीयता का सवाल आखिऱ कौन उठाएगा? यही स्थिति फासीवाद की ज़मीन तैयार करने के लिए मुफ़ीद होती है, जब मिथ्या प्रचार पर सवाल उठाने की बजाय उसका न सिफऱ् गुणगान किया जाता है बल्कि सवाल उठाने वालों को उनके नैतिक अधिकार से वंचित कर उल्टे उन्हें लांछित करने वाले ताकतवर समूह पैदा हो जाते हैं। ये आज के भक्त समूह हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक समूह सक्रिय हैं जिनकी हरकतों में नाज़ी जर्मनी के स्टॉर्म ट्रूपर्स की याद आती है।

नस्ल, धर्म, जाति और वर्ण के आधार पर श्रेष्ठता का अहंकार अगर भारत के सवर्ण समूहों में है तो याद किया जाना चाहिए कि नाज़ी जर्मनी में आर्य नस्ल की उच्चता का सिद्धांत भी इसी आधार पर  विकसित किया गया था और जब उसने मनोग्रंथि का रूप लिया तो जर्मन समाज घृणा, अविश्वास और तबाही से बच नहीं पाया था।

दुनिया का कोई भी धर्म हो उसका मूल आधार मनुष्यता है, मानवता है। दुनिया का हर धर्म सत्य और अहिंसा पर चलना सिखाता है। बुद्ध और महावीर के बाद गांधी एकमात्र ऐसे विचारक हुए हैं जिन्होंने अहिंसा को सफलतापूर्वक प्रमाणित किया न केवल अपने जीवन में उतारा बल्कि उसके अर्थ विस्तारित किए। उसकी उपयोगिता मजबूत की। गांधी के बाद भारत ही नहीं इस दिशा में दुनिया में एक शून्य है। धर्म का जब मनुष्यता से संबंध खत्म हो जाता है तब सबसे ज्यादा संकट की स्थिति निर्मित होती है। धर्म जब राजनीतिक पताका बन जाता है तो उसका मूल आधार से, मनुष्यता से और सभ्यता के निर्माण से नाता टूट जाता है। एक विकट किस्म की सांप्रदायिकता निर्मित होती है। राजनीतिक दल जब धर्म का सहारा लेते हैं तो समाज में भविष्य के लिएसांप्रदायिकता का भय पैदा करते हैं और इस भय से वोट की खेती करते हैं। इस तरह सभ्यता औरक्रूरता का अंतर खत्म हो जाता है। आज जो धार्मिक उन्माद पैदा हुआ है उसने असहमति और प्रतिरोध की दीर्घ भारतीय परंपरा को नष्ट करने का काम शुरू कर दिया है। यहीं से मनुष्यता कीहत्या का सिलसिला शुरू होता है। आदर्शों के इस महाविनाश के समय में नैतिकता की चर्चा करनेवाला अपराधी और देशद्रोही प्रमाणित होने लगता है। यह समय धर्म की मूल अवधारणा को नष्टकरने का समय है और एक नई धर्म सत्ता उभरकर सामने आई है जिसमें राजनीति और बाजार कासमावेश है। आदर्श और मूल्यों के विशाल भारतीय स्थापत्य को धर्म की नई व्याख्या से उपजे हिंसक और क्रूर हथियार नष्ट कर रहे हैं। व्याख्या बदली जा रही है। अनैतिकता और पाखंड का एक खूबसूरत समांतर संसार रचा जा रहा है जिसमें भविष्य की सांप्रदायिकता

से आतंकित नई पीढ़ी विचरने लगी है। हम वापस अतीत के उस कालखंड में पहुंच रहे हैं जहां धार्मिक कर्मकांड, वर्णाश्रम व्यवस्था और सनातन प्रथाएं ही धर्म का पर्याय थी। आज के समय में धर्मशास्त्र के अर्थ ही बदल गए हैं वहां आदर्श मूल्य और मनुष्यता के लिए जगह तंग हो गई है। गांधीजी के लिए धर्महमेशा सत्य, अहिंसा और मनुष्यता रहा है। वे कर्मकांड और वर्णाश्रम को नहीं मानते थे। उनका विचार था कि धर्म आचार विचार के निजी और नैतिक नियमों का संग्रह है। इसी कारण, इसी धारणा के चलते वे इस धर्म को राजनीति से जोड़ पाए और उन्हें कोई दुविधा नहीं हुई। कालांतर में धर्म की व्याख्या बिगाड़ी गई। राजनीतिक हित के लिए धर्म का एक कट्टर सांप्रदायिक रूप सामने आया। इस धार्मिक पुनरुत्थानवादी स्वरूप में धर्म को राजनीतिक सफलता की सीढ़ी बनाना शुरू किया गया। यहीं से सारे संकट शुरू हुए हैं।

चिंतन की गहराई के बिना कुछ भी कहा या सुना गया या तो केवल तात्कालिक भावनाओं के प्रवाह का नतीजा होता है या फिर केवल जुमलेबाजी। आज सोशल मीडिया में अधिकांश पोस्टिंग या कमेंट्स में विरोधाभास का अंबार लगा पड़ा है। सुबह सबेरे सकारात्मक सोच का संदेश भेजने वाला दो घण्टे बाद मौत के डरावने आंकड़े पोस्ट करता है। सारी मानवता को वसुधैव कुटुम्बकम बताने वाला एकाएक कट्टर हिन्दू राष्ट्र के संदेश वायरल करने लगता है ऐसे लोग समाज के लिए कोरोना वायरस से ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि इनके लिए डीआरडीओ भी दवा नहीं इज़ाद कर सकता और न ही इनके लिए कोई अस्पताल है और ना ही कोई भौतिक दवाई क्योंकि ये मानसिक समस्या है। कोरोना काल में हमारी शासन-प्रशासन, चिकित्सा व्यवस्था का तो एक्सरे और सीटी स्केन हुआ ही मगर इसके साथ ही लोगों की मानसिकता और विवेकहीनता का भी बड़े पैमाने पर स्केन हो गया। जिस प्रकार खाने को भली भांति पचाने के बाद ही उसके पोषक तत्व शरीर में मिलकर सही ऊर्जा का निर्माण करते हैं उसी प्रकार शास्र, गुरु या ज्ञानवर्धक पुस्तकों को पढऩे के बाद उस पर पर्याप्त मनन-चिंतन और सारतत्व को ग्रहण करके प्रतिक्रिया करना हीसमाज के लिये उचित है। वरना हम सबने ए प्लस बी के होल स्क्वायर,नाली की गैस से चाय, विंड एनर्जी के साथ पानी व बिजली बनाने जैसे जुमले देखे ही हैं। इसलिए सच्चे आर्यपुत्र बनना है तो सतही ज्ञान की जगह चिंतन की गहराई लाओ विज्ञजनों।