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छत्तीसगढ़ एक खोज, 30वीं कड़ी: रतनपुर का रत्न बाबू रेवाराम - रमेश अनुपम

छत्तीसगढ़ एक खोज, 30वीं कड़ी: रतनपुर का रत्न बाबू रेवाराम - रमेश अनुपम


रतनपुर में जो तीन रत्न हुए उनमें से एक हैं बाबू रेवाराम। रतनपुर के अनमोल रत्न बाबू रेवाराम की गाथा के बिना छत्तीसगढ़ की खोज संभव नहीं है। 

बाबू रेवाराम बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। संस्कृति के क्षेत्र में भी उनके असाधारण योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।

रतनपुर और छत्तीसगढ़ की जगह अगर वे किसी अन्य प्रदेश में जन्म लेते, तो उनकी स्मृति में क्या कुछ नहीं हो गया होता। अब तो रतनपुर में ही उनकी कीर्ति गाथा को जानने वाले कितने लोग बचे होंगे, यह कह पाना कठिन है।

जिस रतनपुरिया गम्मत को उन्होंने जन्म दिया और पल्लवित किया उसे ही आज छत्तीसगढ़ में जानने वाले कितने लोग होंगे? 


जिस साहित्यकार के लिखे हुए भजन के बिना आज भी रतनपुर में कोई सामाजिक या धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता है, उस बाबू रेवाराम को आज छत्तीसगढ़ में कौन याद करता है ?

छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर में सन 1813 में जन्म लेने वाले बाबू रेवाराम हिंदी, संस्कृत, मराठी और फारसी भाषा के विद्वान थे।

बाबू रेवाराम रतनपुर के स्कूल में शिक्षक थे। उन्होंने हिंदी, संस्कृत और फारसी में लगभग तेरह ग्रंथों की रचना की है। इसके साथ ही ज्योतिष शास्त्र में भी बाबू रेवाराम को महारत हासिल थी।

संस्कृत में उन्होंने पांच अमूल्य ग्रंथों की रचना की है " सार रामायण दीपिका ”, " ब्राह्मण स्रोत", " गीत माधव ”, "नर्मदाष्टक" तथा " गंगा लहरी ”।


हिंदी में लिखे काव्य ग्रंथो में "रामाअश्वमेध ", " विक्रम विलास", "रत्न परीक्षा " , " दोहावली” , "मातासेवा के भजन " और "कृष्ण लीला गुटका " प्रमुख हैं।

इसके अतिरिक्त " लोक लावण्य वृत्तांत " तथा " रतनपुर का इतिहास " उनके दो प्रमुख ग्रंथ हैं। 

बाबू रेवाराम द्वारा लिखित " कृष्ण लीला गुटका " को रतनपुर तथा आस-पास के गावों में उसकी हस्तलिखित प्रति बनाकर एक धार्मिक ग्रंथ की तरह सहेज कर रखा जाता रहा है।

रतनपुर निवासी बाबू रेवाराम द्वारा लिखित कृष्ण लीला भजन को रतनपुर तथा आस-पास के गांवों में प्रत्येक धार्मिक पर्व तथा अनुष्ठान के अवसर पर गायन, वादन और नर्तन के द्वारा प्रस्तुत किया जाता रहा है।

एक छोटी सी जगह में रहते हुए बाबू रेवाराम ने जिस तरह से साहित्य साधना की, वह विरल और प्रणम्य है।

आज यह सोचकर हमें विस्मय हो सकता है कि उन्नीसवीं शताब्दी में रतनपुर में बैठकर एक साहित्य साधक किस तरह से संस्कृत, हिंदी और फारसी की रचना में निमग्न रहा होगा। 

शारीरिक व्याधि से पीड़ित एक साहित्य सर्जक किस तरह से सरस्वती की एकांतिक आराधना में लीन रहे होंगे, बिना लोगों के उपालंभ की परवाह किए।

छत्तीसगढ़ की माटी के इस महान सपूत ने गम्मत की एक नई परंपरा को जन्म दिया जिसे रतनपुरिया गम्मत के नाम से जाना गया। रतनपुरिया गम्मत कभी इस प्रदेश की जान, शान और पहचान रहा है। 

पर दुखद यह कि जिस तरह से छत्तीसगढ़ की बहुमूल्य लोक संस्कृति, संस्कृति विभाग के कूपमंडुक अधिकारियों और कर्मचारियों की लोक संस्कृति के प्रति अज्ञानता तथा बेरुखी के चलते लुप्त होती चली गई, उसी तरह रतनपुरिया गम्मत और रहस भी इन्हीं अधिकारियों के चलते लुप्त प्राय होता चला गया।

नाचा, भरथरी, बांसगीत, चंदैनी का हश्र आज हम सब देख ही रहे हैं।

बाबू रेवाराम की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को सहेजने, समेटने में प्रदेश के संस्कृति विभाग की क्या भूमिका रही है ? यह भी इनसे पूछा जाना चाहिए।

बाबू रेवाराम की मेधा को पंडित लोचन प्रसाद पांडेय बखूबी पहचान गए थे। वे बाबू रेवाराम को छत्तीसगढ़ का प्रथम गद्य लेखक मानते हैं। उनके मतानुसार " रतनपुर का इतिहास " इस प्रांत (सी.पी.एंड.बरार ) का प्रथम गद्य रचना है। उन्होंने इसका रचनाकाल सन 1856 माना है।

कहा जाता है कि रतनपुर के दाऊ कृपाराम के जीवन काल में एक बार पंडित लोचन प्रसाद पांडेय का रतनपुर आगमन हुआ था। पंडित लोचन प्रसाद पांडेय बाबू रेवाराम के जन्मस्थल तक गए जो उस समय तक एक खंडहर में तब्दील हो चुका था, उन्होंने वहां की मिट्टी को अपने माथे पर लगाया और उस भूमि को दंडवत प्रणाम किया।

रतनपुर के इस अनमोल रत्न का देहावसान सन 1873 में साठ वर्ष की आयु में हुआ।

रतनपुर आज भी उनके रतनपुरिया गम्मत, उनके रहस, उनके कृष्ण लीला, मातासेवा के भजन तथा उनके द्वारा रचित अनेक अन्य भजनों और गीतों को अपने प्राणों में समेटे हुए है।

उस महान साहित्यकार और छत्तीसगढ़ के अनमोल रत्न बाबू रेवाराम को श्रद्धांजलि स्वरूप उन्हीं की दो रचनाएं ( हिंदी तथा फारसी में ) यहां प्रस्तुत है :


                     ( 1 )


  "जावो जावो री दीवानी बृज       

   नारियां

   बृज नारियां सुकुमारियां 

   मतबारियां दिलदारियां

   तुम्हें लाजहुं न आई

   निज सुत गहि लाई

  

  अस कहत   

  तिहारी ये कन्हईया


  मेरो नन्हा सा मुरार

  देखो खेलन पगार

  किसने कियो तेरो गृह लंगराइयाँ

   

  तुम जोबन की माती 

  सब पर छर घाती 

  चलो हटो नहि देऊंगी मैं गारियां”

  


                ( 2 )


 "आशिक यार दिदार दोस्त 

   सकुनत

   जो थी अव्वल कास ही

   जो जाहिर भर मस्त 

   मुससिल हुई

   यारी दिदारी जिमन

   दानाई दिन बढै नरमई 

   नादा नंदा निस्तदा

   नादानी हस्बुल हरे कन 

   नहिं

   जी किस्त मुस्तै दही। "

अगले सप्ताह छत्तीसगढ़ का अनमोल सपूत और हिंदी सिनेमा का महानायक किशोर साहू...