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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- प्रशासनिक संवेदनशीलता के लिए एंटीडोज की जरूरत

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- प्रशासनिक संवेदनशीलता के लिए एंटीडोज की जरूरत

-सुभाष मिश्र

सालभर की मशक्कत के बाद कोरोना संक्रमण से बचने की वैक्सीन आ गई,  किन्तु अंग्रेजी हुकूमत जाने के इतने सालों बाद भी देशी हुक्मरानों के लिए संवेदनशीलता का कोई एंटी डोज नहीं आ पाया। गोरे हकीम चले गए काले हकीम आ गए, किन्तु गोरी हुकूमत की मानसिकता अभी भी कायम है। सरकार लाख संवेदना की बात करे, प्रधानमंत्री टीवी कैमरे के सामने कितने ही आंसू बहाए किन्तु बहुत सारे अफसर कोरोना की त्रासदी में भी उतने ही असंवेदनशील, क्रूर और निर्मम हैं, जैसे कि जलियांवाला बाग में गोली चलाने का आर्डर देने वाला जनरल डायर। भारतीय सेवा में चयनित होने वालों को मसूरी, हैदराबाद और ना जाने कहां-कहां, अलग-अलग तरह का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में मानवीयता, संवेदनशीलता, मनोविज्ञान, बेहतर प्रशासनिक क्षमता विकसित करने के फंडे सिखाए व बताए जाते हैं। बीच-बीच में बहुत सारे रिफ्रेशर्स कोर्स होते हैं किन्तु जब मैदानी क्षेत्र में ये अधिकारी पदस्थ होते हैं तो सब कुछ भूलकर किसी रोबोट की तरह काम करने लगते हैं। इसी तरह का प्रशिक्षण राज्य सेवा के अधिकारियों को भी दिया जाता है। ये अपना हित लाभ, पोस्टिंग और तत्कालीन आकाओं को खुश करने के गुर जरूर सीख जाते हैं, किन्तु जिस जनता की सेवा और कार्यों की मदद के लिए इन्हे पदस्थ किया गया है, उसे भूल जाते हैं या फिर उसे हेय दृष्टि से देखते हैं।

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में एक कलेक्टर द्वारा कोरोना जांच के लिए जा रहे युवक को जिस तरह चांटा मारा गया, मोबाइल तोड़ा गया, वह हमारे मौजूदा प्रशासनिक तंत्र की एक झलक मात्र है। ये बड़ी अजीब बात है कि लोगों को बचाने के लिए उन्हें पीटा जाए। ऐसे लोगों के लिए शासन के मौजूद कायदे-कानून और उससे निकलने की इतनी गलियां हैं कि सरकार चाहकर भी ऐसे दुस्साहसी अधिकारियों का कुछ नहीं कर पाती।

मामला पश्चिमी त्रिपुरा के एक मैरिज हॉल में शादी के दौरान लोगों से बदसलूकी करने वाले जिलाधिकारी शैलेश यादव का हो या इंदौर की महिला सीएमएचओ पूर्णिमा गडरिया से अभद्रता करने वाले इंदौर कलेक्टर का या फिर मास्क नहीं लगाने वाले ठेला संचालक के साथ सरेराह बदतमीज़ी कर  उसके मुंह पर दो बार ठंडा पानी फेंकने वाले एसडीएम का। ये अधिकारी जब फंस जाते हैं तो फिर बड़ी बेशरमाई से माफी मांग लेते हैं, खेद व्यक्त कर देते हैं और अगली बदतमीज़ी और बदसलूकी के लिए तैयार रहते हैं।

भारत में नौकरशाही का अहंकार दरअसल एक मनोवृत्ति के रूप में औपनिवेशिक शासन की विरासत है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नौकरशाही का ढांचा अक्षुण्ण रहा। इसके चलते मनोवृत्ति भी यथावत रही। अंग्रेजों ने आम जनता से हमेशा दूरी कायम रखी। इसके पीछे औपनिवेशिक श्रेष्ठता का नस्लवादी किस्म का अहंकार था। दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत में शासक वर्ग में श्रेष्ठता का दम्भ बरकरार रहा। अंग्रेज़ी राज के सेवक का रंग भर बदला था, उसकी मनोवृत्ति नहीं। गोरे की जगह अब काले साहब की धाक थी। स्वतंत्र भारत में सिविल सेवक भारत की जनता का सेवक होता है, उसका मालिक नहीं। यह बात अक्सर भूला दी जाती है। उच्च पदों पर आसीन अधिकारी इसी मानसिकता के साथ काम करते हैं कि उनके हाथ में अधिकार है और जनता उनके अधीन है जिस पर हुक्म चलाना उनका दायित्व है, भले ही ऐसा करने से जनता को कष्ट हो उन्हें परवाह नहीं। उनकी जि़म्मेदारी नियम-कानून को लागू करना है। अभद्रता और उद्दंडता को वे नियम पालन करवाने की सख्ती समझते हैं। अपने अशिष्ट आचरण को वे कानून के पालन का तर्क देकर ही उचित ठहराते हैं, फिर मामला सूरजपुर का हो, इंदौर का या पश्चिमी त्रिपुरा के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा की गई अभद्रता का।

तीनों ही मामलों में जिले के सबसे बड़े अधिकारी का आचरण न सिर्फ गैर जि़म्मेदार है, बल्कि वह दम्भ, हिंसा और निष्ठुरता से भरा हुआ भी जान पड़ता है। आम जनता को शासन के प्रतिनिधि के रूप में कलेक्टर जैसे उच्च अधिकारी से संवेदनशील व्यवहार की अपेक्षा होती है। कानून का पालन करने के नाम पर उदंड व्यवहार दुर्भाग्यपूर्ण है।

एक लोकसेवक का यह आचरण औपनिवेशिक शासकों की हिंसा की याद दिलाता है। सूरजपुर की सड़क पर उसे तमाशे के रूप में देखा गया और तकनीक की मदद से वीडियो के रूप में वायरल होकर वह जग हंसाई का सबब बना, लेकिन मनोवृत्ति के रूप में सरकारी तंत्र के भीतर छिपी हिंसा अधिकारियों के दैनिक व्यवहार में जब-तब प्रकट होती है और अधीनस्थ कर्मचारियों के मानसिक उत्पीडऩ का कारण बनती है। मुश्किल यह है कि वे न प्रतिरोध कर पाते हैं, न उसे स्वीकार कर पाते हैं। मानसिक घुटन का यह अनुभव समूचे प्रशासन तंत्र में व्याप्त हो तो अचरज नहीं। इस तरह प्रशासन के पदानुक्रम में प्रताडऩा का दैनन्दिन अपसरण नीचे के अधिकारियों के भीतर भी हिंसक मनोवृत्ति के बीज बोता चलता है। जिसे अंतत: आम जनता ही भुगतती है।

कोरोना काल में लॉकडाउन का पालन कराने, कानून का राज यानी डंडा राज को महिमा मंडित करने बहुत से लोगों को पुलिस ने सड़कों पर पीटा। वजह थी उन्हें कोरोना संकट से बचाना। पहली बार आईएएस एसोसिएशन ने एक पोस्ट के जरिये रणवीर शर्मा की इस हरकत की निंदा करते हुए कहा है कि मुश्किल के इस दौर में एक आईएएस का व्यवहार जनता के प्रति बेहद जिम्मेदार होना चाहिए। सूरजपुर की घटना का वीडियो वायरल होने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कलेक्टर को हटा दिया।

अमेरिका में एक अश्वेत नागरिक को पिछले साल जब पुलिस वालों ने मारा तो उसके खिलाफ पूरे अमेरिका में ब्लैक लाइव्स मैटर नामक आंदोलन शुरू हो गया। इसी आंदोलन के विस्तार के लिए अपनाई गई तकनीक से टूलकिट नामक शब्द प्रचलन में आया जिसकी आज जमकर चर्चा है। हमारे यहां प्रशासनिक गुंडागर्दी और मनमानी के खिलाफ सब खामोश रहते हैं।

सूरजपुर कलेक्टर में ऐसा दुस्साहस दरअसल आता कहां से है। यह दुस्साहस, अनैतिक कार्य करने की हिम्मत उन्हें हमारा सिस्टम देता है। वह मानसिकता देती है जो मालिक और गुलाम की है। हाल ही में जशपुर के बगीचा में पदस्थ एक महिला एसडीएम की अनैतिक डिमांड का वीडियो भी वायरल हुआ और किसी मामले में जेंडर समानता आई हो या न हो प्रशासन में पैसे खाने, रूतबा झाडऩे और प्रशासनिक दादागिरी करने में यह साफ दिखाई देती है। बहुत सी महिला अधिकारी भी इसी तंत्र का हिस्सा होकर वही आचरण करती है जैसा एक महत्वाकांक्षी पुरुष।