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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- कौन है घुसपैठियॉ और कौन बाहरी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- कौन है घुसपैठियॉ और कौन बाहरी


कभी देश की सुरक्षा या कभी अपने प्रदेश के लोगों को रोजगार के अवसर देने के नाम पर देश में रह रहे लोगों को घुसपैठिया का नाम देकर या फिर बाहरी या परदेशी कहकर धमकाना, भगाना, प्रताडि़त करना उन लोगों के लिए हमेशा एक मुद्दा होता है, जो अपनी राजनीति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर करते हैं। कभी आरक्षण के नाम पर सवर्ण और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दलितों के बीच अलगाव पैदा करना। कभी बेरोजगारों के बीच इस बात को प्रचारित करना कि उन्हें नौकरी इसलिए नहीं मिल है कि बाहरी लोग ले जा रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि सरकारी और निजी क्षेत्रों में नौकरी के अवसर कम हुए हैं। वे ही लोग ले-देकर ठीक ढंग से गुजारा कर पा रहे हैं, जिनके पास कोई हुनर हैं। केवल कॉलेज की डिग्री लेने से किसी को भीरोजगार की गारंटी नहीं है। कई मामलों में विपक्ष के हमले झेल रही शिवसेना ने एक बार फिर मराठा सम्मान का कार्ड खेला है। 

अभी हालिया घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिहार के चुनाव के प्रचार करते हुए कहा कि यदि हमारी सरकारी आई तो हम बिहार से बाहरी घुसपैठियों को बाहर करेंगे। इसके तुरंत बाद बिहार की सत्ता को 15 साल तक संभालने वाले नीतिश कुमार, जो कि जेडीयू और भाजपा की ओर से अगले मुख्यमंत्री का चेहरा है ने इस बात से इंकार किया है कि वहां से किसी को निकाला जाएगा। दरअसल योगी और नीतिश अलग-अलग स्कूल के विद्यार्थी है, अलग-अलगविचारधारा से जुड़े हुए हैं। इनकी सोच एक जैसी नहीं हो सकती है। यही हाल महाराष्ट्र में शिवसेना का है। भले ही अभी उसने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली हो, किन्तु उसका असली कार्ड क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़ा है। मराठी मानस की बात करने वाली शिवसेना का मुखपत्र सामना आजकल फिर से मराठी सम्मान की बात कर बाहरी लोगों को गरियाया रहा है। ये बाहरी कोई और नहीं उसी हिन्दू राष्ट्र के नागरिक हैं जिसे बनाने का स्वप्न बाला साहब ठाकरे और संघ के लोग एक साथ मिलकर देखते रहे हैं।

जब भारत का विभाजन हुआ था तब हमने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र चुना था, जिसमें सभी को रहने की आजादी थी, जो यहां रहना चाहता था। यही वजह थी कि जिन मुसलमानों के पास पाकिस्तान जाने का विकल्प था वे भी भारत को अपना देश समझकर यहीं रहें। इसके अलावा किश्चियन, बौद्ध, पुतर्गाली सभी ने धर्मनिरपेक्ष भारत को ही चुना। भारत-पाक युद्ध के बाद जब बांग्लादेश बना तब बंगाली शरणार्थियों को भी भारत में बसाया गया और बाद में नागरिकता दी गई। इसी तरह चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने के दौरान जो शरणार्थी भारत आए उन्हें व्यवस्थित ढंग से बसाया गया।  

इतिहास साक्षी है कि सम्राट अशोक की पुत्री महात्मा बुद्ध द्वारा स्थापित बौद्ध धर्म का प्रसार करने कई देशों में गईं। उन्हें कहीं भी घुसपैठिया नहीं कहा गया। आज अब घुसपैठिया या बाहरी की बात होती है, तो सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि हमें किस घर वाला मानेगे और किसे बाहरवाला। मानव विज्ञान कहता है कि भारत के मूल निवासी, जनजातियां रही हैं और आर्य समूह ने यहां घुसपैठ की है। बहुत बार राजनीति से जुड़े लोगों ने मूल मुद्दे से लोगों का ध्यान भटकाने और लोगों के बीच भय की भावना फैलाने के उद्देश्य से इस तरह के मुद्दों को हवा देते हैं। इस समय हमारे देश में कोरोना का संकट सबसे व्यापक है। उसके अलावा लोगों के सामने बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भूखमरी, भाई-भतीजावाद जैसे मुद्दे है, किन्तु उन पर राजनीतिक दल खुलकर बात करने, जिम्मेदारी लेने से कतराते हैं। हमारे अपने देश के बहुत सारे प्रतिभाशाली डाक्टर, इंजीनियर, तकनीक के जानकार लाखों लोग विदेशो में बसे हैं। सवाल यह भी है कि क्या उन्हें ये देश ऐसे लोगों को घुसपैठिया, कहकर खदेड़ रहे हैं? 

कई बार नेपाल, बंगलादेश और पाकिस्तान की सीमा लगी होने के कारण लोगो की रिश्तेदारियां, आवाजाही आपस में बनी रहती है। कुछ लोग विभाजन के पहले की स्मृतियों, रोजगार की संभावनाओं के चलते भी एक देश से दूसरे देश में आकर बस जाते हैं। 

कुछ रिफ्यूजी होते हैं यानी ऐसे लोग जो अपने देश के बुरे हालात- सांप्रदायिक, युद्ध, राजनैतिक उठा-पटक आदि से उपजे डर के कारण किसी दूसरे देश में रहने लगें, जहां की नागरिकता उन्हें हासिल ना हो और उसी डर के चलते अपने वास्तविक देश जाने की इच्छा ना रखते हों। बहुत सालों से दुनियाभर में गृहयुद्ध, शीतयुद्ध, जैसी चीजें चल रही हैं। अरब के कई देश इस अशांति से जूझते रहे हैं। ऐसे में अपने प्रियजनों को खो चुके लोग दूसरे देशों में खुद को सुरक्षित रखने का जरिया ढूंढते हैं और आनन-फानन सीमा पार कर दूसरे देशों में पहुंच जाते हैं।

भारत में विभाजन के बाद आये लोगों को छोड़ दे तो भी आज़ादी के बाद यहां काफी शरणार्थी आये। अवैध तरीके से रह रहे नागरिकों की पहचान के नाम पर लोकसभा और राज्यसभा से पारित नागरिकता संशोधन बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। यानी ये कानून बन चुका है, जिसके तहत देश के अलग-अलग हिस्सों में अवैध तरीके से रहने वाले शरणार्थी (गैर-मुस्लिम, जिनमें हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध, ईसाई और पारसी शामिल हैं) नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। कानून पर सड़क से लेकर संसद तक अलग-अलग राय है, लेकिन माना जा रहा है इससे कई स्टेट्स के लाखों शरणार्थी बेघर हो सकते हैं। भारत में शरणार्थियों के आने का इतिहास बहुत पुराना है और भारत में बसे कानूनी और गैरकानूनी शरणार्थियों की जनसँख्या कई विकसित देशों की जनसँख्या से भी ज्यादा है। 

जवाहर लाल नेहरू 8 जनवरी 1949 को संविधान सभा में हुई बहस के दौरान किसे भारतीय नागरिक माना जाए और किसे नहीं। इस पर जवाब देते हुए कहा गया था कि, जहां तक शरणार्थियों का सवाल है, जो भी अपने आप को भारतीय नागरिक मानता है, उसे हम भारतीय नागरिक के तौर पर स्वीकार करते हैं।

इधर उदारवादी देश फ्रांस जिसने अपने देश में शरणार्थियों को जगह दी कट्टरपंथियों के निशाने पर है। फ्रांस कट्टरपंथ के खिलाफ लगातार कदम उठा रहा है। तुर्की के अल्ट्रा नेशनलिस्ट ग्रुप 'ग्रेवूल्व्स पर प्रतिबंध लगाने के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सरकार अब एक ऐसा बिल संसद में रखने जा रही है, जो धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव पर पूरी तरह रोक लगाएगा। बिल के अनुसार यदि किसी पुरुष ने महिला डॉक्टर से इलाज करवाने से मना किया तो उसे 5 साल तक कैद हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यही बात महिलाओं पर भी लागू होती है।

अमेरिका जैसा देश भी अपने देश में अवैध तरीके से आ रहे लोगो की रोकथाम के लिए दीवार तक बनाने की पहल कर चुका है, किन्तु लोगो को जहां कहीं भी रोजगार के अवसर, बेहतर वातावरण दिखता है, वे वहां बसना चाहते हैं। हम चाहे लाख 'वसुधैव कुटुम्बकम की बात करें किन्तु हमारी राजनीतिक पार्टियों को भी अपने देश, प्रदेश के लोगों की उस चिंता को जाहिर करना है जिसे हल करने के लिए कभी भी गंभीर प्रयास नहीं किये गये।