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कला साहित्य संस्कृति जगत की आबिद अली को भावपूर्ण श्रंद्धाजलि : मौकौ कहां ढूंढें रे बंदे मैं तो तेरे पास - सुभाष मिश्र

कला साहित्य संस्कृति जगत की आबिद अली को भावपूर्ण श्रंद्धाजलि : मौकौ कहां ढूंढें रे बंदे मैं तो तेरे पास - सुभाष मिश्र


इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने इप्टा की राष्ट्रीय समिति ने कॉमरेड आबिद के दुखद निधन पर शोक व्यक्त किया। अविभाजित सांसदए गायक संगीतकार अभिनेता निर्देशक और एक बहुत ही स्नेही और स्नेही आयोजक के इप्टा के पूर्व महासचिव आबिद अली। हम अपनी सम्मानजनक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनकी पत्नी के दुख को साझा करते हैं और इकलौती बेटी और दोस्त। मेरे लिए हर बीतते दिन श्रद्धांजलि लिखना बहुत दर्दनाक होता जा रहा है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि इप्टा के वरिष्ठ सदस्यए सुपरिचित रंगकर्मी और पत्रकार आबिद अली जी का निधन राज्य की एक अपूरणीय क्षति है। कोरोना ने एक और हुनरमंद नेक इंसान हमसे छीन लिया। ईश्वर उनके परिवार को दुख की घड़ी सहने की शक्ति प्रदान करें।

कला साहित्य संस्कृति जगत से जुड़े बहुत से लोगों ने आबिद अली को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी है। अपनी अभिनय कलाए संगीत और गायकी से सबको प्रभावित करने वाले आबिल अली अब हमारे बीच नहीं रहे। आज उन्हें रायपुर में सुपुर्दे खाक कर दिया गया। आबिद अली ने पिछले 40 सालों में अलग.अलग नाट्य संस्थाएं और खासकर के इप्टा से जुड़कर बहुत सारे नाटकों में काम किया तथा नाटकों में संगीत दिया और गायन किया। वे अपने सामाजिक सरोकार के लिए भी जाने जाते थे। बहुत ही हंसमुख खुशमिजाज आबिद अली पेशे से पत्रकार थे और उन्होंने रायपुर में बहुत सारे अखबारों में काम किया। अभी कुछ वर्षों से वे एक उर्दू अखबार के लिए काम कर रहे थे। आबिद की अभिनयए क्षमताए गायकीए संगठन के प्रति उनका प्रतिबद्धता के कला साहित्य और रंगमंच के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखते थे। उनके इस तरह अचानक चले जाने से सब हतप्रभ है। आबिद अली को याद करते हुए उन्हें दी गई श्रद्धांजलि के कुछ अंश.


मौकौ कहां ढूंढें  रे बंदेए मैं तो तेरे पास - सुभाष मिश्र

साथी आबिद अली को जब आज मौदहापारा रायपुर के कब्रिस्तान में सुपुर्द खाक किया जा रहा था तो मैं पास खड़े सोच रहा था कि इस कोरोना महामारी में पता नहीं कितने साथी बिछड़ेगे मरना तो सबको एक दिन है पर इस तरह असमय सुपुर्द खाक होना स्वीकार नहीं। आबिद अली प्रधान का जब भी जिक्र आयेगा तो उनकी गायिकाए अभिनय क्षमताए जिंदा दिलीए समाज की बेहतरी के लिए सोचने वाले एक ऐसे शख्स की याद आयेगी जो अपनी सोचए आचरण और जीवनशैली में कबीर की तरह फक्खड़ था। मिर्जा मसूद के निर्देशन में भीष्म साहनी द्वारा लिखित नाटक में कबीर की भूमिका निभाने वाले आबिद अली को जिस किसी ने भी मंच पर अभिनय करते गाते सुना है उसे आबिद अली कहेगा मौका कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास।

हमने आबिद के रूप में एक प्यारा दोस्त एक ऐसे साथी को खोया है जो अपनी खामोशी और मुस्कान से भी बहुत कुछ कह जाता था। अभी कुछ दिनों पहले की ही तो बात है मिनहाज आबिद अरूण काठोटे और मैं अपने रंगकर्मी साथी मणिमय मुखर्जी के बेटे की शादी में भिलाई गये थे। सबके साथ फोटो  खिंचवाते हुए मिनहाज मजाक कर रहा था कि अच्छे से फोटो खिंचवा लो  पता नहीं कोरोना में कब कौन चला जाये।
जिस तरह सिनेमा की दुनिया में सलीम जावेद की जोड़ी चर्चित रही है वैसे रायपुर के रंगमंच में मिनहाज आबिद की जोड़ी । यदि आपको आबिद को बुलाना तो आपको मिनहाज को बुलाना पड़ेगा । यातायात संसाधन के मामले में मिनहाज आबिद का वेताल था । आबिद की  संगीत  सहभागिता के बिना मिनहाज के नााटक की कल्पना अधूरी है । अब जब आबिद लोगो को बताने के लिए उपलब्ध नही है सारे जवाब मिनहाज को देने पड़ रहे हैं । यही वजह की मिनहाज उस तरह से अपनी प्रतिक्रिया लिखकर नही दे पाया जैसे बाकी सब दे रहे हैं । मिनहाज का गुस्सा वाजिब है की यदि आबिद ने कोरोना वैक्सीन का टीका लगवा लिया होता तो आज हमे ऐसा कुछ नही लिखना पड़ता पर वो आबिद था आसानी से कहां मानता ए थोड़ा हठधर्मि जो ठहरा ।

मिनहाज और में आज आबिद को सुपुर्दखाक होते देखते हुए सोच रहे थे पता नहीं कब कौन चला जाए। आबिद जिस्मानी तौर से हमारे बीच नहीं है वह रायपुर के मौदहापारा कब्रिस्तान में कही लैटा हुआ नाटक की किसी नई धुन को किसी जनगीत स्वर दे रहा हो। आबिद बहुत सुरीला था संकोची था और जहां बोलना होता था वही बोलता था पर परफेक्ट साफगोई के साथ बोलता था।

कांकेर में मेरी पदस्थापना के दौरान 1985.86 में हमने कांकेर के नहरदेव स्कूल में इप्टा रायपुर का नाटक कबीरा खड़ा बाजार में करवाया। आबिद कांकेर के नाटक दृश्यों के बीच किसी हीरो सा छा गया। सभी आबिद से मिलना चाहते थे। अपने अभिनय और गायन से ज्यादा अपने संगठन इप्टा को समय देने वाले आबिद को देशभर के कला.संस्कृतिए साहित्य से जुड़े मित्र यूं ही श्रद्धांजलि नहीं दे रहे है यूं ही याद नहीं कर रहे हैं। आबिद कबीर की ही तरह सबसे कह रहा है।

कबीर जब हम पैदा हुए जग हंसे हम रोये।
ऐसी करनी कर चले हम हंसे जग रोये।

आपका संघर्ष हमारे स्मृतियों में हमेशा अमिट रहेगा . लेखक चिंतक ईश्वर सिंह रू जब पता चला कि आबिद भाई कोविड पॉजिटिव हैं और अम्बेडकर अस्पताल में भर्ती हैं तो मुझे यक़ीन था कि वे कोविड से जीत जायेंगे । मुझे इसलिए भी यक़ीन था कि आपके साथ हिम्मती बेटी सिदरा थी । बेटी सिदरा से मैं लगातार संपर्क में थाए साथ ही आबिद भाई का उपचार कर रहे डॉ साथियों से भी।  डॉ मुझे उनका ऑक्सीजन स्तर शारीरिक ताप और दूसरे ज़रूरी स्थिति रोज़ बताते थे और मैं उसे अपने वरिष्ठ साथियों को भेज देता था और कहता था लड़ेंगे और जीतेंगे । हम यह जंग जीतने के कऱीब भी पहुंच गये थे । आबिद भाई की कोविड रिपोर्ट निगेटिव हो गयी थी कुछ दिनों पहले और उन्हें नान कोविड वार्ड में शिफ़्ट कर दिया गया था । अब्बू की हालत वैसे ही बनी हुई है।

ओ जाने वाले हो सके तो लौट आना . अख्तर अली  छत्तीसगढ़ के रंगमंच में सितारा हैसियत रखने वाले इस शख्स के अंदर अदबो आदाब का कीमती खज़ाना था। यह व्यक्ति चलता था तो इसके साथ साथ सभ्यता चलती थी। यह व्यक्ति सच्चाई ईमानदारी का प्रतीक था। वामपंथी विचारधारा का अलमबरदार था। न इसे दौलत की भूख थी न श्रेय लेने की प्यास कामरेड था और मौजूदा निज़ाम में कामरेड होना आसान नहीं है।
आबिद भाई में नाटय संगीत की गहरी समझ थी उनकी आवाज़ में दर्द था लरजि़श थी सम्मोहन था और इससे भी बड़ी बात यह थी कि उनकी आवाज़ में ईमानदारी थी। खऱाब को सुधार देने की तड़प थी। ज़ुल्म के खि़लाफ़ गुस्सा था और यही वजह है कि वो जनगीत गाते थे गायक तो सैकड़ो है लेकिन जनगीत गाने की हैसियत सब की नही है। जनगीत गाने के लिये सिफऱ् अच्छी आवाज़ ही पर्याप्त नही है अच्छा किरदार होना भी ज़रूरी है। आवाज़ और जज़्बा ऐसा कि आवाज़ हलक से निकलती तो फ़लक तक जाती। फ़र्श वाले तो लाभांवित हो चुके अब अर्श वालों की बारी है।
इप्टा से जुड़े वरिष्ठ रंगकर्मि और आबिद अली के मित्र अरूण काठोटे ने कहा कि आपने सही कहा डॉक्टर उनकी गायी नज़्म और गज़लों के कार्यक्रम को हम अमलीजामा नहीं पहना सके इसका अफसोस ताउम्र रहेगा। इसके लिए मैं और आबिद वृंदावन हॉल में पूछताछ करने भी गए थे लेकिन वांछित तिथि पर बुकिंग न मिलने के कारण यह टल गया। लगभग एक माह पहले मैंने उसे मैसेज किया थाए तुमने जो नज़्म और गज़ल ;अपने गायन के लिएद्ध निकाली हैए उसमें चुनिंदा भेजो। कविता पोस्टर के लिए। यह भी सच है कि जिंदगी की जद्दोजहद में वे चाहकर भी रंगकर्म को समय नहीं दे सके। फांस नाटक की रिहर्सल में भी वे आखिर वक्त पहुंचे हाथों में लैपटॉप लिए। रिहर्सल के दौरान वे मिनहाज के कमरे में बैठकर ऊर्दू अखबार के लिए खबरें बनाकर भेजते रहते। रिहर्सल खत्म होने के बाद वे मंडली के साथ गीतों की धुन बनाने जुट जाते। संगीत उनके साथ निरंतर चलता रहता। चाहे रिहर्सल में उन्हें लाते वक्त या वापस घर जाते हुए। शाहीन बाग में हर रोज वे मौजूद थेए इसके बाद किसान आन्दोलन के समय भी भारत बंद के समर्थन में वे सुबह जयस्तंभ चौक पर हाजिर थे। कबीर ठेले पर चाय की चुस्कियों के साथ अक्सर वे किसी बात पर भड़कते तो कभी कोई बात न बनने पर खीझ भी जताते। इतनी यादें हैं कि रह रह कर कल से दिलो.दिमाग को बेचैन कर रही हैं। करीब एक महीना पहले एक नज़्म मुझे भेजी थी जो उनकी पीड़ा भी दर्शाती है। सलाम आबिद तुम्हें भुलाना नामुमकिन है दोस्तण्ण्ण्।
शेखर नाग रंगकर्मि  आबिद भाई का हार्ट बीट कुछ समय के लिए बंद हो गया था और थोड़ी देर बाद लौट आया। मुझे थोड़ी तसल्ली हुई। लेकिन ये तसल्ली ज़्यादा देर नहीं रही फिर थोड़ी देर बाद पता चला कि आबिद भाई हमारे बीच नहीं रहे । हम सब के प्रयास व्यर्थ हो गये। बेटी सिदरा तुम बहुत ही हिम्मती हो। तुमने कई रात दिन बिना खाये.सोये आबिद भाई की सेवा की। तुमने ख़ुद की परवाह किये बग़ैर डॉक्टरों के बराबर आबिद भाई का ख़्याल रखा। बेटी सिदरा तुम्हे बहुत बहुत सलाम है। तुम पर फ़क्र है हमें। कॉमरेड आबिद आपके संघर्षों से हमारे सारे साथी परिचित हैं। आगे आने वाले दिन दुनियाँ के लिए बड़े मुश्किलों के होंगे और उन दिनों आपके संघर्ष हमें नई राह दिखाएंगे। आप सशरीर हमारे साथ अब नहीं हो बेशक लेकिन आपका संघर्ष हमारे स्मृतियों में हमेशा अमिट रहेगा । लाल सलाम कॉमरेड

रंगमंच का  कुशल चितेरा चला गया  मनोज शुक्ला भाजपा नेता के सहयोगी के रूप में उनके साथ रहने वाले मीडिया से जुड़े मनोज शुक्ला ने कहा कि आबिद अली एक उम्दा  रंगमंच का कलाकार  गायकी में एक मझा हुआ कलाकार एक अच्छा लेखनी का सिपाही ए पत्रकार और न जाने कितने गुण भगवान ने उन्हें  दिए थे। इस इंसान में आज हमारे बीच नहीं रहे। आबिद भाई जितने अच्छे पत्रकार कलाकार व लेखनी के सिपाही थे उतने ही अच्छे इंसान थे मैंने कभी भी उन्हें किसी के खिलाफ यह किसी के विरोध में बोलते नहीं सुना। अनेक अवसर पर वह मुझे भी कहते थे मनोज किसी के खिलाफ बोलने से क्या फायदा रे।  इसलिए हमेशा उनकी अच्छाई की बात करें क्या पता उस व्यक्ति के सोच में हमारे कारण कोई परिवर्तन आ जावे हमेशा सब के प्रति उनकी सोच सकारात्मक ही रहती थी मैंने कभी उसे इसी के खिलाफ या किसी के विरुद्ध बोलते कभी नहीं सुना।  
आखिरी सलाम आबिद भाई . सतीश कुमार सिंह रू आबिद भाई के साथ दैनिक जनसत्ता रायपुर में दो तीन वर्ष तक मैंने काम किया। उस समय वे जनसत्ता का फ्रंट पेज सम्हालते थे और मैं ब्यूरो प्रमुख था। वे अपना छोटा भाई मानते थे मुझे और बहुत स्नेह करते थे । महाराष्ट्र मंडल में होने वाले नाट्य आयोजनों में अक्सर साथ लेकर जाते और देश भर से जुटे रंगकर्मियों से जितना मैं नहीं हूँ उससे कहीं ज्यादा प्रशंसा करते हुए मिलवाते थे। मैं झेंप जाता था उनकी इस सहृदयता के सामने। बहुत प्यार मिला आबिद भाई आपका। कोरोना ने आज आपको भी निगल लिया ।
कला समीक्षक राजेश गन्नोदवाले . ओह ण्ण्!! आबिद भाई के साथ कबीरा खड़ा बाज़ार में के दौरान काम करने की स्मृतियाँ हैं। वे बढिय़ा गज़़ल भी गाया करते थे। श्रद्धा सुमन आबिद भाई कोण्ण्ण्।

डॉ अखिलेश कुमार त्रिपाठी. लगता है कि अपने भीतर से अपना एक हिस्सा टूट कर अलग हो गया। इतना लंबा साथ। इतनी यादें। इतनी गर्मजोशी। आबिद। तुम्हारे बगैर न कोई रायपुर था और न कभी होगा। हम गुफ्तगू करते रहेंगे जन गीत गाते रहेंगे बेहतर दुनिया के ख्वाब देखते रहेंगे। एक दूसरे की नादानियों पर हंसते मुसकुराते रहेंगे। तुम्हें अलविदा कैसे कह देंण्ण्ण्।

 रंगकर्मी निसार अली
. उफ़ ! कामरेड आबिद इतनी जल्दी चले जाएंगे ए यह मालूम न था। उन्यासी अस्सी से वे शीघ्र ही घुल मिल गए थे । इक्यासी के अंत में मैं शासकीय सेवा में चला गया बालोद दुर्ग । फिर आबिद से बातें होती रहती थी। इधर उधर भटकने के बाद नब्बे में महासमुंद आ गया। रायपुर में साथियों सहित आबिद से मुलाकात  होती रहती थी। ऐसा अंदाज न था कि मेडिकल कॉलेज रायपुर में एडमिट आबिद इस दुनियां से चला जाएगा बहुत दूर ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्! लाल सलाम कामरेड ! ज़माना याद रखे या ना रखे ए तुम बहुत याद आओगे ! लाल सलाम।

वरिष्ठ पत्रकार नंद कुमार कंसारी . नहीं बिल्कुल भी यकीन नहीं हो रहा आबिद भाई यूं आपका रुठ जाना शेखर से हर बार आपके सेहत को लेकर बात होती रही बहुत ख़ुशी हुई जब शेखर ने बताया आपने कोरोना को मात दी हैण्ण्ण् उफ्फ़़ अभी ये मनहूस ख़बर ण्ण्ण्। यादें कौंध रही है ण्ण्ण् जयस्तंभ चौक पर आपकी आवाज़ का गूंजना ऐ ख़ाक नशीनों  हइया रे हईया ए लाजि़म है के हम भी देखेंगे और भी बहुत से जनगीत डफली की शानदार थाप के साथ ण्ण्ण्अभी तो और भी तराने और भी संघर्ष बाक़ी थे कॉमरेड आबिद भाई ण्ण्ण्।

राजीव शुक्ला दिल्ली . बहुत ही अद्भुत कलाकार और अद्वितीय गायक आबिद के इस तरह बिछुडऩे से हम सब स्तब्ध और निरूशब्द है 35 साल का उनका साथ अंतहीन स्मृतियांण् सादर नमन और अलविदा आबिद भाई।

संज्ञा टंडन रंगकर्मि बिलासपुर
. 1987 में मिर्जा मसूद सर का आज तक याद किया जाने वाला  भीष्म साहनी का नाटक कबीरा खड़ा बाजार में। उस वक़्त रायपुर में हॉउसफुल शो रहा था। उसमें काम करने वाले आज बड़े बड़े नाम हैं। आबिद भाई के साथ पहचान और दोस्ती का सिलसिला तब से जो जुड़ा था कल तक अनवरत जुड़ा रहा। दूरदर्शन की कुछ टेलीफिल्म्स में भी साथ काम किया। कोरोना ये रिश्ता भी तुड़वा दिया। दूर चले गए आबिद भाई हम सबसे। बेहतरीन कलाकार गायक और इंसान अब कभी भी न होंगे हमारे साथ। सादर श्रद्धांजलि।

कवि पथिक तारक .
खोजा नसरुद्दीन के बहुचर्चित नाटक में आबिद अली जी नसीरुद्दीन की भूमिका में यह नाटक मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में रायपुर इप्टा की सफलतम प्रस्तुतियों स्थान रखती है। आबिद अली भाई आप बहुत याद आएंगे आपको विनम्र श्रद्धांजलि।

नाट्य निर्देशक राजकमल नायक . आबिद का दिली व आत्मीयता भरा  संस्मरण। मेरे नाटक दुलारीबाई अच्छे आदमीए दास्तान.ए.नसरूद्दीन आदि में अभिनय  सहित कई नाटकोंए नुक्कड़ नाटकों में प्रमुख गायक के रूप में आबिद ने अपनी अलग पहचान कायम की। बहुत विनम्र  हंसमुख इंसानियत से भरा.पूरा आबिद हरदम याद रहेगा।

मार्गदर्शक और स्नेह करने वाले बड़े भाई को खो दिया. सुभाष बुंदेले आबिद भाई मेरे रंगकर्म गुरु थे सन 1989 मैं मंचित नाटक रामलीला मैं उनके संगीत निर्देशन पर एक सहयोगी कलाकार के रूप में अपनी नाट्य संगीत की यात्रा प्रारंभ की और लगातार इप्टा रायपुर के हर एक नाटकों पर उनके साथ मिलकर 2019 मैं मंचित नाटक उनके जीवन का अंतिम नाटक फांस मैं संयुक्त रुप से संगीत संयोजन का कार्य उनके ही मार्गदर्शन पर करता रहा। उल्र्लेखनीय योगदान रहा। उनके द्वारा बनाई गई धून और संगीत संयोजन से नाटकों में गीतों की संरचना और विशेष तौर पर सुर और ताल पर आधारित गीतों की रचना करने में उन्हें महारत हासिल थी। आज भी उनके द्वारा संगीत संयोजन किए गए जन गीत संपूर्ण भारतवर्ष की इप्टा इकाई में काफी पॉपुलर है।

शाहनवाज प्रधान फिल्म एवं टीवी  अभिनेता आबिद के कजिन : रोते हो क्यूँ चला गया कुछ आंखों में है क्या !
नहीं - आंखों में जो बसा था मेरी वो चला गया !!
अलविदा....
भाई आबिद अली प्रधान