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मरवाही के हर सियासी मंच पर जोगी जाप जारी है.. जाप का फल कड़वा होगा या मीठा.. मतदाता मौन

मरवाही के हर सियासी मंच पर जोगी जाप जारी है.. जाप का फल कड़वा होगा या मीठा.. मतदाता मौन

वशिष्ठ

मरवाही के उप चुनाव में अब केवल सात दिन बचे है। सातवें दिन याने तीन नवंबर को मरवाही का मौन मतदाता अपने फ़ैसले को इव्हीएम से दर्ज कर देगा, जिस फ़ैसले को दस नवंबर को प्रदेश और देश पढ़ेगा। यह फ़ैसला जो भी होगा, जैसा भी आएगा उसकी तब आख्या और व्याख्या होगी, और ज़ाहिर है होनी भी चाहिए, आख़िर राजनीति चिरंतन सनातन शिक्षा है, जो रोज़ विद्यार्थियों को नए सबक देती है।

  मान्यता है कि उप चुनाव हमेशा सरकार लड़ती है और ज़ाहिर है सरकार सर्व शक्तिमान होती है तो इसलिए ही उप चुनाव अमूमन वह दल नहीं हारता जो कि सरकार में होता है।यह मान्यता तथ्य और तर्क के साथ है इसलिए ही जब भी उप चुनाव वह दल हारता है जिसकी सरकार है तो उसे राजनैतिक विश्लेषक बहुत से पैमानों पर कसते हैं।इस तथ्य के बावजूद कि जीत जीत होती है भले एक मत से हो, नतीजे का विश्लेषण तर्क वितर्क व्याख्या के साथ साथ नई मान्यता का भी जन्म मतों के अंतर से होता है। मरवाही के उप चुनाव को लेकर भी नज़रें इसलिए ही टिकी हैं। 


   मरवाही में जीत हार से भी अलग “बहुत कुछ” हो रहा है। मरवाही करीब बीस बरस बाद कोई ऐसा चुनाव देख रही है जहाँ प्रत्याशी के रुप में जोगी नामधारी कोइ नही है। वही जोगी जिसने विरोधियों को नौचंदी के मीना बाज़ार का खिलौना बनाकर रख दिया था। वह जोगी जिसने कूटनीति, छद्मावरण, छल, घात याने महाभारत में दर्ज राजनीति की हर विधा को पूरा ना सही पर बहुत सी विधाओं को जीवंत किया। वह जोगी आज स्मृतिशेष हैं, और इसलिए मरवाही उप चुनाव देख रही है। 

   बाक़ी देश प्रदेश समर्थक विरोधी के लिए जोगी की छवि अलग-अलग थी। पर उस मरवाही के लिए जोगी क्या थे, जिस मरवाही ने जोगी को छत्तीसगढ़ का प्रथम मुख्यमंत्री बनने की वैधानिक स्थिति प्रदान की। यहाँ यह याद रखना चाहिए कि जोगी के पास तब विकल्प बहुतेरे थे जिनमें वरीयता में बहुत उपर कवर्धा जैसे नाम भी थे। पर जोगी ने चुना मरवाही। आखिर मरवाही ही क्यों ? क्या केवल इसलिए कि वो खुद को आदिवासी बतलाते हुए आदिवासी सीट से सुविधा से जीतना चाहते थे.. सुविधा शब्द इसलिए क्योंकि जिस अंदाज में उन्होने अपना विधानसभा का उपचुनाव 2001 में लड़ा था, वह स्मृति पटल में दर्ज है। मुख्यमंत्री जब उप चुनाव लड़ता है तो सारा तंत्र कार्यकर्ता बनता है,हर ग़लत सही हो जाता है, ऐसी मान्यता 2001 में स्थापित हुई थी। पर मरवाही अजीत जोगी को जीत दिलाती गई, हर बार बढ़ते क्रम में।सबसे ज़्यादा मतों के अंतर से तो तब जब जोगी हाशिए पर होते हुए विरोधियों की नज़र में ख़ारिज माने गए। यह अलहदा विषय है कि नई पार्टी बनाए जाने के पीछे “पुत्रमोह” इकलौता कारण था या नही, पर उसके लिए भी जगह मरवाही ही चुनी गई। 

   मरवाही में विकास के स्थापित मानकों में बहुत कुछ शून्य है, जो निराश कर देता है।सड़क, बिजली, आवास, स्वास्थ्य शिक्षा आप विषयवार आँकड़े उठाते जाईए और निराश भाव के साथ रखते जाइए, तो फिर जोगी मरवाही के मतदाता के लिए स्थाई क्यों रहे ? विकास के सारे मानक जहाँ पर धूल धूसरित धराशायी हैं, वहाँ जोगी बढ़ते क्रम में जीतते क्यों रहे ? आख़िरी चुनाव में तो चिन्ह बदल चुका था, और तब जोगी और ज्यादा मत हासिल कर गए।

Know the downfall Jogi rule from the marwahi seat with Ajit jogis death  mpas | मरवाही उपचुनाव 2020: अपने ही गढ़ में कैसे OUT हुए जोगी और जेसीसीजे?

  इसके मायने यह हैं कि “घर का जोगी जोगड़ा.. आन गाँव का सिद्ध” वाली लोकोक्ति जोगी ने बेहद सधे अंदाज में लागू की, शेष चिर परिचित सियासत की “जोगीयाना तिकड़म” के साथ। जोगी का फोन मरवाही के लिए रात हो दिन किसी भी पहर उठता था, जोगी ने मतदाता के लिए खुद को कभी दूर नही किया। धन की आपूर्ति ज़रूरतमंद मतदाता तक कभी बाधित नही हुई। इस मामले में “सहकारिता” का अद्भुत इंतज़ाम मौजुद था। किसी के यहाँ शादी हो या कि गमी, जरुरत के समय राशि पहुँच जाती, और ज़ाहिर है यह आवश्यकता से हमेशा कुछ “ज्यादा” ही होती थी। यह सबसे महती जरुरत के बाद एक फोन जरुर पहुँचता था जिसमें जोगी का निवेदन होता था “बताबे कमी नई पड़े.. मैं आहूं..फोन करबे कुछो होही तो”। मरवाही की शादी या गमी जोगी वहाँ घंटों अपनी सक्रिय मौजुदगी रखते थे।शादी है तो बेटी को अपनी बिटिया बताते हुए दामाद को गर्वभाव की अनुभूति कराना.. गमी हो तो परिवार के छोटा बनकर “मोर बड़ा हर गुज़र गे.. उड़गे हँसा.. पर में हों मोला बता” वाले बेहद मोहक शब्दों से जीवंत रिश्ता बना ले जाना। 

   जोगी ने अपने हर चुनाव में कार्यकर्ता और मतदाता तक खुले हाथ से “व्यवस्था” पहुँचाई, और आख़िरी चुनाव में तो “व्यवस्था” का वितरण कुछ ऐसा किया कि, उसे वितरण नही “लुटाना” कहा जाना ज्यादा सही है। शेष दलों के लिए कार्यकर्ता तक “व्यवस्था” का वितरण होता है पर जोगी ने मरवाही में यह बदल दिया था। 

   आखिर जोगी ने ऐसा क्यों किया था..! इसका जवाब आज मतदाताओं को रिझाने के लिए कार्यकर्ताओं को उर्जावान करने की क़वायद में “खीज” जाते रणनीतिकारों को देखते हुए समझ आता है। जोगी के समर्थकों को कांग्रेस या भाजपा प्रवेश करते देख उत्साहित रणनीतिकारों को याद रखना चाहिए कि यह “नए कांग्रेसी” उन्हे पॉकेट तो दिखा सकते हैं पर पॉकेट जितने में भरेगा वह अपेक्षा पूरी कौन करेगा, कैसे करेगा ? वह भी तब जब राजनीति में शातिर घूटे हुए जोगी जिनकी सियासत उन्हे राजनीति का एक पाठ्यक्रम साबित करती हो उन्होने मतदाता को यह खुले तौर पर बता रखा हो “कोई पईसा बकरा देहे आही.. तो मना मत करिहा.. जियादा लिहा.. तुमन के पईसा है.. देहत हे तो एहसान थोड़े करत हे..बाक़ी मैं तो हों”

    इसके साथ साथ यह सवाल भी मुँह बाएँ खड़ा है कि जो कांग्रेस का कार्यकर्ता कांग्रेस को नही छोड़ा वो जब छजका समर्थकों को मंच पर साफ़ा गमछा पहनाते हुए नीचे दरी बिछाकर बैठे हुए देखता होगा तो उसे कैसा लगता होगा।

    बहरहाल मामला यह है कि जोगी और मरवाही के रिश्ते क्या थे.. उपर इन रिश्तों को लेकर संकेतों और संक्षेप में बाते दर्ज हैं। बीस बरस से यह मसला जारी रहा है, और पंद्रह बरस में एक नई  पीढ़ी आ जाती है।

    बेहद आक्रामक स्वभाव के साथ प्रदेश में कांग्रेस  के इकलौते लीडर बनने की ओर तेज़ी से अग्रसर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और अजीत जोगी के बीच रिश्ते कैसे थे और “अंतागढ़ प्रकरण” ने इसे और कितना खूंरेज किया यह शायद ही बताने की जरुरत हो। राहुल के अगवानी के लिए मशक़्क़त करते हुए जोगी के साथ जिस अंदाज में हैलीपैड पर जिससे संवाद हुए उन्हे भला अलग से याद करने की क्या जरुरत है !

   मरवाही संसदीय क्षेत्र कोरबा में आता है, जहाँ के क्षत्रप चरणदास हैं, जिनके नाम में ही “महंत” जुड़ा हुआ है।लेकिन मरवाही के उपचुनाव को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल  ही लड़ रहे है, मरवाही में अपनाई जा रही हर रणनीति को अंतिम रुप देते हुए उन्हे देखना और उस नीति को  क्रियान्वयन करने में जूटे उनके समर्थकों की सेना को देखते हुए यह मानने में कोई शंका रहनी भी क्यों चाहिए।

   अंतागढ उप चुनाव में जो हुआ, वहीं मरवाही उप चुनाव में हो रहा है। अंतागढ में इव्हीएम मशीन के बोर्ड में ना कांग्रेस का निशान था ना प्रत्याशी। वैसे ही अब मरवाही में ना तो जोगी है ना छजका।जाति के मसले को लेकर नामांकन पर दावा आपत्ति के आख़िरी दिन नामांकन ख़ारिज हुए, ग़लत सही का मसला बाद में तय होता रहेगा लेकिन वोट देते वक्त मशीन में ना छजका निशान है और ना ही जोगी का नाम। 

   मरवाही में जोगी विहीन चुनाव का हश्र क्या होगा ? निष्कर्ष पर तो ख़ैर मरवाही आने नहीं देगी क्योंकि मरवाही को लेकर समझ बस यह बताती है कि  उसे “बाहरी” रुप से कुछ नहीं समझा जा सकता।यह “बाहरी” शब्द बहुत गहरे तक पैठा हुआ है, तो जो समझ आना है या कि नई धारणा बननी है वह तो दस नवंबर को ही समझ आएगा। 

   अंतागढ दंश की तपिश को ज़िंदा रखते हुए मरवाही में जो हुआ वो ठंडक दे गया होगा, लेकिन किंतु परंतु अभी भी हैं,और बहुत गूंजते हुए हैं। पूरी क़वायद है कि, जोगी परिवार मरवाही के चुनावी समर में ना पहुँच पाए.. निर्वाचन को दिए जा रहे लिखित आवेदन चुनाव के दूषित होने की आशंका के साथ साथ कोविड फैल जाने के ख़तरे तक को बताते हैं और माँग रखते हैं कि कोटा विधायक और स्व. अजीत जोगी की पत्नी डॉक्टर श्रीमती रेणु जोगी को हाट बाज़ारों में घूमने से रोका जाए,जहां वे स्व. अजीत जोगी की आत्मकथा की किताबें बाँटते हुए ग्रामीणों से संवाद कर रही हैं।रोक उन न्याय यात्रा की गाड़ियों पर भी लगे जिन्हें कथित रुप से अनुमति नहीं है। 

   कांग्रेस की ओर से यह लिखित आवेदन इसलिए जा रहे हैं क्योंकि  चुनावी मैदान से बाहर किया जा चुका जोगी परिवार जिसके अब स्वाभाविक मुखिया अमित जोगी हैं,खुद को बेबस लाचार और सिस्टम का सताया हुआ प्रचारित करने की क़वायद में हैं। वे तब जबकि चुनावी माहौल शुरु ही हुआ था तब खुद को अनाथ पूत्र बताते हुए मरवाही की भावनाओं में ज्वार भाटा को बनाए रखने की भुमिका निबाह रहे थे,  जिसे क़रीब डेढ़ महिने पहले मरवाही के गली मोहल्लों में श्रीमती रेणु जोगी भरपूर उंचाई दे आई थीं। अब जबकि चुनावी मैदान से जोगी नाम ही बाहर है, डॉ. श्रीमती रेणु जोगी के हाट बाज़ार भ्रमण और अमित जोगी के निर्देशन में चल रही यात्राओं में खुद को अनाथ के साथ सताया जा रहा परिवार भी बताते हुए मरवाही से न्याय माँगने  के रुप में इशारा दे रहा है कि “वोट शिफ़्ट कर दिए जाएँ”

   चुनाव मुद्दों पर लड़ा जाए तो कुछ बात हो, दूरंदेशी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ज़रा याद कीजिए कि नए ज़िले की सौग़ात गौरेला पेंड्रा मरवाही को कब दी थी। तब किसी ने उप चुनाव कीकल्पना तक नहीं की होगी।चुनाव आते आते क़रीब साढ़े तीन सौ करोड़ की विकास योजनाओं को अलग स्वीकृत किया गया। पर जब चुनाव भावनाओं पर लड़े जाने की क़वायद हो तो कई बार भावनाएँ भारी पड़ जाती है। 

   अंतागढ़ का हिसाब चुकाने के लिए अपनाई गई रणनीति तो सफल हो गई। पर “खुद पर फेंके हर पत्थर से अपने लिए घर बनाने का इस्तमाल” वाली नीति अमित ने अपना ली है। अमित जोगी जिसने राजनीति में हमेशा पहली दूसरी और कई जगहों पर तीसरी पंक्ति के कार्यकर्ताओं को खड़ा किया,पहली पंक्ति के जाने पहचाने चेहरों की रवानगी के बाद दूसरी और तीसरी पंक्ति के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की क़वायद में है। इसलिए जाति पत्नी बच्चा माँ पिता परिवार और ख़िलाफ़ में सरकार के मसले को अचूक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए “चिर-परिचित-योजनाकार” अमित जोगी न्याय माँगने के बहाने कांग्रेस की हार तलाश रहे हैं। 

   अमित की खुद को पीड़ित और सताए हुए दिखाए जाने की मौन  भूमिका को संवादों की मज़बूती कांग्रेस का ही मंच दे रहा है। कांग्रेस के मंच से “जोगी” का ज़िक्र होता ही है, कुछ न कुछ ऐसा निकल पड़ता है कि भाषण को सुन रहे मतदाता के मन में “जोगी” प्रकट हो जाते हैं। सनातन धर्म,मंत्रों याने शब्दों में ब्रह्म की बात कहता है, एक शब्द या संवाद की चूक अर्थ का अनर्थ करती है।निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को उनके अपने ही दल के मंच से यह अंदाज पसंद नहीं आएगा।पर उन्हें इस ओर ध्यान कब तक दिलाया जा सकेगा यह देखने की बात होगी।

   इधर भाजपा के मंच पर भी “जोगी” होते हैं, फ़र्क़ यह है कि इस मंच से इस कठोर अनुशासन का पालन होता है कि जोगी को लेकर नकारात्मक कुछ ना बोला जाए, बल्कि सकारात्मकता के साथ उन्हें याद किया जाए। हालिया दिनों युवा मोर्चा के बैनर तले राजधानी से आए  प्रदेश पदाधिकारी के भाषण की शुरुआत के साथ ही एक पर्चा पहुँच गया कि विषय बदलें।युवा नेताजी को पर्चा पढ़ते ही पूरा मज़मून बदलना पड़ गया।

   ‘जोगी-बिन-मरवाही’ यह केवल इव्हीएम की मशीन की हकीकत है। मैदान में उतरने से साफ समझ आता है मुद्दा विकास होना चाहिए पर मसला जोगी ही है। और आख़िर में एक बात.. जिस “व्यवस्था” से अजीत जोगी चुनाव लड़ते थे और मतों की बरसात होती थी, उस “व्यवस्था” का इंतज़ाम कितना हो सकेगा, कौन कर सकेगा.. और वितरण की प्रणाली दूषित नही हो.. इसकी निगरानी के साथ कौन करेगा.. बहुत अहम यह भी है।