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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहा है वैक्सीनेशन

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहा है वैक्सीनेशन

-सुभाष मिश्र

कोरोना संक्रमण अपनी बरसी मना रहा है। इस बीच लोगों ने चिकित्सकों, विशेषज्ञों, नीम-हकीम और घरेलू नुस्खे, व्हाट्सअप यूनिवसिर्टी से मिले ज्ञान और इलाज के तरीकों को दो गज की दूरी और मास्क के जरिये खुद को बचाए रखा। इस बीच में 11,156,923 लोग संक्रमित हुए और 10,826,075 स्वस्थ हुए। 15,471 लोग काल के गाल में समा गए। अचानक हुए लॉकडाउन और बंद किए गए यातायात के साथ साधनों की वजह से देश के लाखों-लाख लोगों ने अपने पैर की ताकत पर भरोसा करके खुद को किसी तरह बचाया।

पहली बार लोगों को घर की महत्ता समझ में आई। वैसे तो हमारे देश का आम आदमी कभी भी न तो पूरी तरह से अपना पाते हैं न छोड़ पाता है ना तो पूरी शिक्षा, न ही पूरा स्वास्थ्य उसके हिस्से में आता है। उसके हिस्से में जो कुछ आता है, वह इस जनतंत्र का हिस्सा बनकर यूं ही जीता रहता है। सरकार की तमाम योजनाएं, पार्टियों के घोषणा-पत्र सब धरे के धरे रह जाते हैं।

दुष्यंत कुमार का एक शेर है-
न हो कमीज तो पांव से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफर के लिए

भारतीय व्यक्ति की सहनशक्ति या कहें इम्युनिटी कुछ ज्यादा ही अच्छी है। देश में सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमण महाराष्ट्र में था, वो आज भी दूसरे चरण के स्टेज के रूप में दिखाई दे रहा है। कोरोना से निपटने के लिए जब पूरी दुनिया के देश प्रयासरत थे, तब भारत ने भी अग्रणी भूमिका निभाते हुए कोवैक्सीन और कोविडशील के जरिये अभी तक फ्रंट लाइन वर्कर सहित डेढ़ करोड़ लोगों ने अभी तक वैक्सीनेशन करवाया। हमें नहीं मालूम कि कौन सी वैक्सीन कितनी असरकारक है किंतु इन डेढ़ करोड़ नागरिकों में मैं और मेरी पत्नी रचना भी है। बिना किसी हिलहुज्जत, बिना ज्यादा प्रतीक्षा के हमने रायपुर के आयुर्वेदिक अस्पताल में वैक्सीन लगवा ली। आधे घंटे की प्रतीक्षा के बाद जब कुछ नहीं हुआ तो हम सकुशल घर लौट आये। हमारे जैसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने वैक्सीन का पहला डोज ले लिया है। भारत बायोटेक ने दावा किया है कि उसकी वैक्सीन 81 प्रतिशत प्रभावी है। वहीं कोविड शील्ड को 70 प्रतिशत प्रभावी पाया गया है। शुरु-शुरू में वैक्सीनेशन को लेकर फ्रंटलाइन वर्कर सहित बहुत सारे लोगों में भ्रांति बनी हुई थी। देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, राष्ट्रपति और बहुत सारे लोग यदि पहले ही फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के साथ वैक्सीनेशन करवा लेते तो संभवत: यह रफ्तार बढ़ जाती है। खैर देर आये- दुरुस्त आये अभी सबने वैक्सीनेशन करवा लिया है। लोगों के मन में एक विश्वास पैदा हुआ है कि वैक्सीनेशन सेफ है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री सिंहदेव पहले इस बात पर अड़े हुए थे कि जब तक वैक्सीनेशन का तीन चरण का परीक्षण नहीं हो जाता तब तक मैं छत्तीसगढ़ में भारत बायोटेक की कोवैक्सीन नहीं लगवाउंगा। अब चूंकि वैक्सीन के नतीजे आ चुके हैं तो छत्तीसगढ़ में भी अब बाकी कंपनियों की वैक्सीन लगना शुरु हो जायेगी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हषवर्धन का कहना है कि वैक्सीन की क्षमता 15 करोड़ डोज से बढ़ाकर सालभर में 350 करोड़ करने का लक्ष्य रखा गया है। भले ही हमारे देश में वैक्सीनेशन की रफ्तार शुरू से ही कम रही हो किन्तु दुनिया में कोरोना वैक्सीन के मामले में भारत इस समय बिग ब्रदर की भूमिका में है। स्वदेशी सीरम इंस्टीट्यूट ने सालाना उत्पादन क्षमता 160 करोड़ डोज से बढ़ाकर 250 करोड़ कर ली है। वहीं, भारत बायोटेक भी सालाना उत्पादन क्षमता 20 करोड़ डोज से 70 करोड़ डोज पर पहुंच गई है। इसके अलावा जिन 7 कंपनियों की वैक्सीन बाजार में आनी है, उन्होंने भी अपनी निर्माण क्षमता दोगुनी करने के लिए नए प्लांट लगा लिए हैं। इस तरह से देश में वर्तमान में वैक्सीन बनाने जा रहे प्लांट की सालाना क्षमता 200 करोड़ डोज तक बढ़ गई है।  

हैदराबाद स्थित फार्मा कलस्टर जीनोम वैली का लक्ष्य अगले एक दशक में 4 लाख रोजगार देने का है। दुनिया को एक तिहाई वैक्सीन सप्लाई करने वाले जीनोम वैली की क्षमता सालाना 500 करोड़ डोज है। यहां कोरोना के अलावा दूसरी बीमारियों की वैक्सीन भी बनाती है। यहां कोरोना वैक्सीन का प्रोडक्शन ही 135 करोड़ डोज होगा। भारत ने कम आय वाले देशों को 20 करोड़ डोज देने का वादा किया है। भारत ने 239.7 लाख डोज दूसरे देशों को दिए हैं। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, 60 देशों को टीके दिए गए। कुछ लोगों को लगता है कि देश की दवा कंपनियों, सैनेटाइजर बनाने वालों और मास्क बनाने वालों ने अच्छी खासी हाईप क्रियेट करके लोगों के डर का भरपूर दोहन किया है।

ब्राजील को चीन ने अपनी वैक्सीन दी थी। वहां किए गए ट्रायल में यह सिर्फ 50 प्रतिशत ही असरदार दिखी। 25 देशों में चीनी वैक्सीन का लगना शुरू हो चुका है, लेकिन बहुत सारे देशों ने टीका लेने से मना कर दिया है।

ऐसा दावा किया गया है कि दुनिया में सबसे कम लागत पर वैक्सीन और दवाएं भारत में बनती हैं। लागत कम होती है तो हम दाम भी कम रखते हैं। अमेरिका में जो वैक्सीन बनी है उसकी कीमत 50 डालर है, जबकि भारत में बनी वैक्सीन की कीमत 3 डालर से भी कम है। सरकार ने यह 200 रुपए प्रति डोज के हिसाब से खरीदी की है। अगर बाजार बिक्री भाव और एक्सपोर्ट की बात भी की जाए तो भी भारत की वैक्सीन का रेट एक चौथाई से भी कम है। साइड इफेक्ट या असर की बात की जाए तो अभी लगभग 1 करोड़ से ज्यादा डोज लग चुके हैं, लेकिन गंभीर साइड इफेक्ट का कोई केस सामने नहीं आया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे कोरोना काल में जिस तरह की लीड, मीडिया हाईव और मन की बात कही वैसा शायद ही किसी देश के नेता ने किया होगा कि वे जनता की नब्ज और प्रोपेगेंडा का मतलब समझते हैं। उन्होंने सभी योग्य लोगों से वैक्सीन लगवाने की अपील की है। कोरोना के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को मजबूत करने में हमारे डॉक्टर और वैज्ञानिकों ने जिस तेजी से काम किया वह असाधारण है। मैं सभी योग्य लोगों से अपील करता हूं कि वे वैक्सीन लगवाएं। हमें साथ मिलकर देश को कोरोना मुक्त बनाना है।

भारत में कोरोना वायरस के खिलाफ टीकाकरण के दूसरे फेज ने भी रफ्तार पकड़ ली है। दूसरे फेज के पहले दिन कुल 5.52 लाख डोज दिए गए थे, जबकि दूसरे दिन यह संख्या 40 प्रतिशत से बढ़कर 7.68 लाख हो गई। इसी तरह वैक्सीन डोज लेने वाले सीनियर सिटीजन की संख्या में भी दोगुने से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। सोमवार को 1.29 लाख सीनियर सिटीजन ने वैक्सीन डोज लिया था, जबकि मंगलवार को इनकी संख्या 2.60 लाख से अधिक रही। अब तक 67.33 लाख हेल्थकेयर वर्कर्स को पहली डोज दी गई है, जबकि करीब 27 लाख ने दूसरी डोज भी ले ली है। इसी तरह 56 लाख फ्रंटकेयर वर्कर्स ने पहली डोज ली है। वहीं, करीब एक हजार ने दूसरी डोज ली है।

भारत में भले ही वैक्सीनेशन देरी से शुरू हुआ हो और लोगों ने डोज लेने में आनाकानी की हो, हमारे प्रतिदिन डोज देने की रफ्तार में हम सिर्फ अमेरिका से पीछे हैं। अवर वल्र्ड इन डाटा के मुताबिक, अमेरिका में प्रतिदिन औसतन 17 लाख डोज दिए जा रहे हैं। वहीं, भारत में यह संख्या 4.5 लाख डोज प्रतिदिन की है। भारत में कोरोना टीकाकरण के दूसरे चरण में वरिष्ठ नागरिकों और 45 साल से अधिक उम्र के बीमार लोगों को टीका लगाने का काम शुरू हो गया है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कोरोना वैक्सीन की पहली खुराक ली और उन्होंने लोगों से देश को कोरोना मुक्त बनाने के लिए टीका लगवाने की अपील भी की। देश में फिलहाल दो कंपनियों की कोरोना वैक्सीन का इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत बायोटेक की कोवैक्सिन और सीरम इंस्टीट्यूट की कोविशील्ड। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा है कि दोनों वैक्सीन प्रतिरक्षा की दृष्टि से पूरी तरह सुरक्षित है। दरअसल, इन दोनों वैक्सीन में कुछ समानताएं हैं, तो कुछ अंतर भी है।

कोवैक्सीन को भारत बायोटेक कंपनी ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के साथ मिलकर बनाया है। इसीलिए इसे स्वदेशी वैक्सीन भी कहा जाता है। इसके निर्माण में मृत कोरोना वायरस का इस्तेमाल किया गया है, ताकि वैक्सीन से लोगों को कोई नुकसान न पहुंचे। यह कोरोना संक्रमण के खिलाफ शरीर में एंटीबॉडी पैदा करती है, जिससे कोरोना से लडऩे में मदद मिलती है। कोविशील्ड, ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका का भारतीय संस्करण है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कंपनी भारत में इसका उत्पादन कोविशील्ड के नाम से कर रही है। इस वैक्सीन का विकास कॉमन कोल्ड एडेनोवायरस से किया गया है।
कोवैक्सिन और कोविशील्ड दोनों ही वैक्सीन दो खुराक वाली है, यानी कोरोना से बचाव के लिए आपको इनकी दो खुराक लेनी पड़ेगी। दोनों खुराक के बीच 28 दिन का अंतर रखना पड़ता है। इसका मतलब ये है कि आपने इनमें से किसी भी वैक्सीन की पहली खुराक अगर आज ली है, तो दूसरी खुराक आपको उसके 28 दिन बाद लेनी है। हमें अगले 28 दिन का इंतजार है।

वैक्सीन लगाने के लिए अब लोग घर से निकलकर ऑनलाईन रजिस्ट्रेशन करवा रहे हैं। हम जानते हैं कि हमें जैसे सर्दी, खांसी, डेंगू, मलेरिया जैसा बीमारी के साथ जीने की आदत डालनी पड़ी है उसी तरह अब हमें कोरोना के साथ भी जीना सीखना होगा।