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शब्द श्रद्धांजलि : स्व.करूणा शुक्ला के राजनीतिक जीवन और व्यक्तित्व का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी..राजनीति में समाजवादी थीं करूणा शुक्ला..!

शब्द श्रद्धांजलि : स्व.करूणा शुक्ला के राजनीतिक जीवन और व्यक्तित्व का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी..राजनीति में समाजवादी थीं करूणा शुक्ला..!

अनिल द्विवेदी

आखिर क्रूर.कोरोना ने हमारे बीच की ‘करूणा‘ को भी छीन लिया. रात एक बजे के आसपास डाॅ. राकेश गुप्ता का संदेश देखा कि पूर्व सांसद और पूर्व विधायक श्रीमती करूणा शुक्ला जी नही रहीं. दिल धक सा हो गया! गुजरे दिनों ही उनसे फोन पर हालचाल जाना तो अंत में उन्होंने कहा कि किसी दिन चाय पीने आओ..! दीदी का यह निमंत्रण अब जिदंगीभर का सम्मान-पत्र हो गया है मानो. विनम्र श्रद्धांजलि उन्हें.

करूणा जी प्रदेश की धाकड़ राजनीतिक नेत्री, योद्धा थीं. उनका ला.उबाली अंदाज दूसरी नेत्रियों को उनसे जुदा रखता था. निडर और स्पष्टवादी. प्रदेश के किसी भी राजनीतिक दल में मैंने ऐसी तराश-खराश वाली महिला नेत्री नही देखी. जो बोलना है, मुंह पर और सामने. भाजपा में तो उनकी टक्कर में सिर्फ उमा भारती ही रहीं. पूर्व विधायक और पूर्व सांसद करूणा शुक्ला जी से मेरी पहली मुलाकात वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय अमिताभ तिवारी ने कराई थी. पंडितजी उनके दूर के दामाद लगते थे, थोड़ा चुभते भी थे इसलिए दीदी मेरे बहाने उन्हें संदेश भिजवा देती थीं. पण्डितजी के स्वर्गवासी होने के बाद भी अपनी मुलाकात करूणाजी से होती रही.



राजनीति को कोई 50 साल दिए होंगे दीदी ने. इसमें से बमुश्किल 7—8 साल कांग्रेस को और भाजपा में लगभग 40 साल. यानि एक युग सा जीयीं वे. कितना बड़ा रेंज, क्या डायमेंशन और क्या दायरा था उनका. उन्होंने 1983 में पार्टी का दामन थामा तो राजनीति में महिलाओं का अकाल सा था. इसी साल दीदी पहली बार बीजेपी से विधायक चुनी गयीं. उस दौर में सुश्री रजनीताई उपासने और सुश्री नीना सिंग का जलवा हुआ करता था. नई पीढ़ी के राजनेता शायद सुश्री नीना सिंग को ना जानते हों. 1989 में स्वर्गीय पं. श्यामाचरण शुक्ला के खिलाफ राजिम से विधायक का चुनाव लड़ी थीं लेकिन हार गई. पटवा सरकार बनी तो नीना सिंग का रूतबा बढ़ा लेकिन तब तक करूणा शुक्ला का प्रभाव पार्टी में बढ़ने लगा. पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटलजी की भतीजी तो थी हीं, कुशल वक्ता, समय और दूसरों को परखने की क्षमता के बलबूते राजनीतिक भूमि पर दीदी ने जो पैर जमाए, पार्टी ने उन्हें सरमाथे चढ़ाए रखा. वे बीजेपी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सहित तमाम बड़े पदों पर रहीं.

करूणाजी में एक स्वाभाविक प्रगतिवाद था. वे कुशल वक्ता थीं ठीक अटलजी की तरह. पुस्तक प्रेमी, स्वाभिमानी, संघर्षशील और स्पष्टवादी नेता. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी के टिकट पर कांग्रेस के चरणदास महंत के खिलाफ किस्मत आजमाई लेकिन सफल नहीं हुई. ऐसे लोग चाहने वालों का मेला सजाकर रखते हैं और जंगल भी. कांग्रेस में तो फिर भी ऐसे नेता सरमाथे पर होते हैं लेकिन भाजपा में संगठन और अनुशासन की कड़ी इतनी मजबूत है कि कोई उसे तोड़ ना सका. हजारों लोगों ने कोशिश जरूर की लेकिन वे खुद ही हार मानकर बैठ गए. राजनीतिक जमीनें किसी की स्थायी नही होतीं. खेतीहर भूमि की तरह वह भी उथला होती हैं. उसमें नए बीज डाले जाते हैं, कोंपलें फूटती हैं और नेता नई फसल की तरह खड़े हो जाते हैं.

बीजेपी में भी जब राजनीतिक नेत्रियों की नई फसल आई तो करूणाजी को उनसे टक्कर मिलने लगी. पार्टी में एक नया 'त्रिफला' तैयार हुआ जिसे रमन-सौदान-सरोज के नाम से जाना गया. बकौल करूणाजी: मेरी लड़ाई सिर्फ इन तीनों से थी. और सच भी है कि 15 साल के भाजपाई राज में, तत्कालीन मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह के खिलाफ पार्टी के कई धुरंधरों ने मोर्चा खोला, लेकिन समय की आंधी, राजनीतिक मजबूरी या लालसाओं की पूर्ति के बाद वे ध्वस्त हो गए लेकिन दीदी तो मानो चिंगारी थीं, शांत होतीं और फिर दावानल हो जातीं. भाजपा में रहते हुए वे राज्यसभा जाना चाहती थी. वे चाहती थीं कि किसी महिला को मौका मिले और वे सबसे उपयुक्त दावेदार हैं. हालांकि भाजपा आलाकमान इस पर राजी नही था. वह किसी आदिवासी को भेजना चाहता था. करूणाजी को लगा कि उनकी दाल नही गल पा रही है तो उन्होंने खुद ही नंद कुमार साय का नाम आगे कर दिया. रमनसिंह इस पर राजी नही थे लेकिन पार्टी ने साय को राज्यसभा भेज दिया. इससे साबित होता है कि करूणाजी बड़े से बड़े गुब्बारे में पिन चुभोकर उसके फुस्स हो जाने का हुनर जानती थीं.

हालांकि पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सहित तमाम बड़े पदों की जिम्मेदारी दी लेकिन रमनसिंह के खिलाफ एक बार मोर्चा खोला तो उसका दूसरा सिरा कांग्रेस में जाकर खुला जब करूणाजी ने ‘पंजा से पंजा‘ मिलाने का मूड बनाया. इसके पहले उन्होंने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को—जिसमें तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी शामिल थे—समझाने की कोशिश भी की. रमनसिंह की तो चुप्पी ही मानो सहमति थी.अंत में अटलजी से अप्वाइंटमेंट ना मिल पाना जैसे सबक ने उनके मन में गहरी हूक पैदा कर दी. करूणाजी ने यह लड़ाई जारी रखने का फैसला करते हुए कांग्रेसियत' ओढ़ ली. यह शेर उन पर फिट बैठता है कि :

हमको जुनूं क्या सिखलाते हो, हम थे परीशां तुमसे जियादा.
फाड़े होंगे हमने अजीजो चार गिरेबां तुमसे जियादा


कांग्रेस ज्वाइन करने के बाद एक दिन उनके निवास पहुंचा तो मैंने उन्हें कहा, ‘रमेश बैस जी राज्यपाल बना दिए गए, इस पद पर आप भी बैठ सकती थीं अगर आप कांग्रेस में ना आती तो.‘ उन्होंने अपने चश्मे को पोंछते हुए कहा, ‘अनिल, राजनीति में वर्तमान महत्व रखता है ना कि अतीत और भविष्य. साल 2018 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के खिलाफ राजनांदगांव से लड़ाया लेकिन वे हार गई पर पार्टी को जितवा दिया. अगर आपके पास तस्वीर या वीडियो हो तो देखिएगा जब भूपेश बघेल मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो करूणा शुक्ला मंच पर किनारे खड़ी थीं. उन्होंने नमस्ते तक नही किया. मानो अहसास कराना चाह रही हों कि मेरी लड़ाई पर जनता ने विजय की मुहर लगाई हो. डाॅ. रमनसिंह ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए आज कहा, ‘वे श्रद्धेय श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी की भतीजी थीं और दशकों से जनसेवा का कार्य कर रही थीं.‘

करूणाजी कांग्रेस पार्टी में अकेली समाजवादी थीं. वे अपवाद ही रही होंगी कि भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आईं तो उन्हें भरपूर सम्मान मिला. करूणाजी का राजनीतिक अनुभव, उनकी राय का पूरा सम्मान किया गया. उचित मंचों पर सबके बीच वे पर्यावरणीय उपस्थिति थीं. हालांकि उनकी प्रतिभा का आतंक समकक्ष नेताओं पर हमेशा बना रहा. यह दर्द उन्हें सालता रहा कि सरकार बनने के बाद उन्हें उचित पारिश्रमिक नही मिला. समाज कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष जरूर बनाया गया मगर उनके हाथ में आदेश तक नही पहुंचा था, पॉवर तो दूर की कौड़ी थी. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा, 'मेरी करुणा चाची यानी करुणा शुक्ला जी नहीं रहीं. निष्ठुर कोरोना ने उन्हें भी लील लिया. राजनीति से इतर उनसे बहुत आत्मीय, पारिवारिक रिश्ते रहे. उनका सतत आशीर्वाद मुझे मिलता रहा.' आगे देखेंगे कि कांग्रेस सरकार अपनी कांग्रेस नेत्री को कौन सी गौरवपूर्ण श्रद्धांजलि देती है!



( लेखक दैनिक आज की जनधारा समाचार-पत्र एवं वेब मीडिया हाउस के संपादक हैं )