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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -स्कूल-कॉलेज बंद: बाकी सब खैरियत है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -स्कूल-कॉलेज बंद: बाकी सब खैरियत है

-सुभाष मिश्र
क्रिकेट मैच होने दो, मॉल खुले रखो, व्यापारिक गतिविधियों जोर शोर से चलने दो, चुनावी रैली, सभाएं जारी रखों, सिनेमा, बीयर-बार चालू रहे। सड़कों पर बाजारों में यातायात धक्का-मुक्की के स्तर का होता रहे, धार्मिक जुलूस-जलसे बेखौफ होते रहे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन शैक्षणिक संस्थाएं यदि खुली रह गई तो कोरोना संक्रमण फैल सकता है। बच्चे देश का भविष्य है, इन्हें हर हाल में सुरक्षित रखना है। युवा बाकी कहीं भी जाएं पर स्कूल-कॉलेज जाने से वे संक्रमित हो सकते हैं। युवा शक्ति को भी आने वाले कल के लिए बचाना जरूरी है। यही वजह है कि पिछले एक साल से शैक्षणिक संस्थाएं लगभग बंद सी है। ऑनलाईन पढ़ाई के नाम पर हो रहे खेल में भी अब धीरे-धीरे नीरसता आ गई है। पिछले दो शिक्षा सत्र बिना परीक्षा दिये ही पास करने वाले रहे। वैसे भी कक्षा एक से आठ तक बच्चों को फेल नहीं करना है। रही 9 और 11वीं की बात तो इस साल भी उन्हें जनरल प्रमोशन मिल जायेगा। शिक्षा गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के लिये पूर्व में संचालित अभियान के आंकड़े भले ही बार-बार गिरते शिक्षा के स्तर की ओर इशारे कर रहे हों पर क्या करें? कम्बख्त कोरोना है कि मानता ही नहीं। स्कूली बच्चे शरारती होते हैं ना ठीक से मास्क पहनते हैं, ना ही दोगज की दूरी का पालन करते हैं, ना ही साफ-सफाई पर ही ध्यान देते। अभी उनके लिए कोरोना वैक्सीन का डोज भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में स्कूल बंद करके बिना परीक्षा लिए ही उन्हें जनरल प्रमोशन के जरिए पास करना ही सबसे सरल और लोकप्रिय उपाय है, जो हर कल्याणकारी सरकार आजमा रही है। पिछले एक साल में कोरोना संक्रमण के बीच स्कूल और महाविद्यालय स्तर पर ऑनलाईन क्लास और परीक्षा को लेकर जो तैयारियों की जानी चाहिए थी, वह नहीं हुई। कोरोना संक्रमण आने के बारे ताबड़तोड़ में बिना ज्यादा डिवाईस, नेटवर्क और एनराईड फोन के ऑन लाईन पढ़ाई शुरू कर दी गई, जो आज भी वैसी ही है, जैसे पहले दिन थी। यह स्थिति शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले तंत्र की अकर्मणयता को ही दर्शाती है। ऐसा नहीं है कि सरकार की ओर से स्कूल, कॉलेजों को ऑनलाईन पढ़ाई या नये तौर तरीके से पढ़ाई के लिये संसाधन और आबंटन पर्याप्त मिला, किन्तु सही दिशा-निर्देश और इच्छाशक्ति के अभाव में यह जमीनी स्तर पर सफल नहीं हुआ। स्कूल शिक्षा के आंकड़े बताते हैं कि 2601994 विद्यार्थी और 208444 शिक्षक पंजीकृत है, और 46640 वर्चुवल स्कूल है। 19546 असाइनमेंट अपलोड किये गये। अभी तक 1233194 ऑनलाईन कक्षाएं संचालित कर 25592 लर्निंग वीडियो अपलोड किये गये। साथ ही 4702 लर्निंग कोर्स मटेरियल तैयार किये गए। महाविद्यालय पर 182221 विद्यार्थी और 6894 शिक्षक पंजीकृत हैं। यह सब काम ताबड़तोड़ तरीके से हुआ।

कोई रोडमैप नहीं, कोई कार्ययोजना नहीं, कोई विजन नहीं, जब जैसा मौका आया फौरी तौर से निर्णय लेकर जैसा चाहे वैसे करो। बहुत से स्कूल बिना पढ़ाई फीस लें, चलेगा, कुछ को फीस ना मिले चलेगा। टीचर ऑनलाईन पढ़ाई के नाम पर बिना तकनीकी ज्ञान के कैसी भी शिक्षण सामग्री तैयार करें, चलेगा। टीचर एक साथ ऑनलाईन, ऑफलाईन क्लास लें चलेगा। जो टीचर ठीक ढंग से अपने मोबाईल के सारे फीचर का उपयोग भी नहीं कर सकते वे बिना किसी ट्रेनिंग, तकनीकी ज्ञान के, आधुनिक तकनीक को माध्यम बनाकर पढ़ाएं चलेगा। आंकड़े अपडेट चाहिए। क्लास ऑनलाईन दिखनी चाहिए।

पूरी दुनिया के अलग-अलग देशों में अब धीरे-धीरे लॉकडाउन का विरोध होने लगा है। लंदन में शनिवार को लॉकडाउन के विरोध में 10 हजार से ज्यादा लोगों ने प्रदर्शन किया। दूसरी तरफ जर्मनी, नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, स्विटजरलैंड, रोमानिया, सर्बिया, पोलैंड, फ्रांस और ब्रिटेन में भी लॉकडाउन और स्थानीय समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन होने लगे हैं। हमारे बच्चों की जिंदगी बर्बाद करना बंद करो और नकली महामारी जैसे नारे लिखे पोस्टर लेकर लोग लॉकडाउन का विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि लंबे समय से लॉकडाउन के कारण हमारे सामने रोजगार सहित विभिन्न तरह के संकट पैदा हो गए हैं।  

छत्तीसगढ़ में कोरोना के बढ़ते संक्रमण के चलते अगले आदेश तक तत्काल प्रभाव से सभी स्कूल बंद करने का आदेश जारी किया है। साथ ही होम एग्जाम वाले स्टूडेंट्स को जनरल प्रमोशन देने का भी निर्णय किया गया है। स्कूल शिक्षा विभाग के आदेश के अनुसार कक्षा 10वीं और 12वीं बोर्ड की परीक्षाएं पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार ही ऑफलाइन मोड में ली जाएंगी।

महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों में कोरोना के बढ़ते मामलों के बाद एक बार फिर स्कूलों को बंद कर दिया है। इधर सीबीएसई अप्रैल में नया सेशन शुरू करने की गाइडलाइन्स जारी कर चुका है, लेकिन केन्द्रीय शिक्षामंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने साफ़ कहा है कि स्कूल खोलने पर फैसला पेरेन्ट्स और स्कूल की राय के बाद ही किया जायेगा।

दिल्ली सरकार ने आठवीं कक्षा तक के छात्रों के आकलन के लिए बुधवार को सभी सरकारी स्कूलों को दिशा-निर्देश जारी कर सामान्य परीक्षाएं लेने से मना कर दिया और उनके 'प्रोजेक्ट और 'असाइनमेंट के आधार पर परिणाम घोषित करने को कहा है। शिक्षा निदेशालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि वर्तमान में आठवीं कक्षा तक के छात्रों को मूल्यांकन के बाद अगली कक्षा में प्रवेश दिया जाए। दिल्ली शिक्षा निदेशालय ने अपने आदेश में कहा, 'चूंकि प्राथमिक और मिडिल स्तर पर कक्षाओं में कोई पठन-पाठन नहीं हुआ है, ऐसे में सामान्य परीक्षाओं की जगह विषयवार प्रोजेक्ट और असाइनमेंट के माध्यम से तीसरी से आठवीं कक्षा तक के छात्रों का मूल्यांकन किया जाए।

शिक्षा पर काम करने वाली संस्था राइट टू एजुकेशन फोरम ने सेंटर फॉर बजट एंड पॉलिसी स्टडीज और चैंपियंस फॉर गर्ल्स एजुकेशन के साथ मिलकर देश के 5 राज्यों में एक अध्ययन किया है, जिसके मुताबिक कोरोना के कारण स्कूली लड़कियों की पढ़ाई पर बहुत ही प्रतिकूल असर पड़ा है। घर पर कंप्यूटर या पर्याप्त संख्या में मोबाइल ना होने के कारण जहां ऑनलाइन पढ़ाई में लड़कों को लड़कियों पर प्राथमिकता दी जा रही है, वहीं कोरोना के कारण हुए आर्थिक तंगी के कारण लड़कियों की पढ़ाई छूटने का भी डर शामिल हो गया है।

कोरोना काल में टीवी पर भी एजुकेशन से जुड़े कई कार्यक्रम आ रहे हैं लेकिन ज्यादातर बच्चों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है। अध्ययन में शामिल कुल परिवारों में से लगभग 52 फीसदी के पास घर पर टीवी सेट था, इसके बाद भी केवल 11 फीसदी बच्चों ने ही कहा कि वे टीवी पर पढ़ाई से जुड़ा कोई प्रोग्राम देखते हैं। यानी घर पर टीवी या स्मार्ट फोन होना भी इस बात की गारंटी नहीं देता है कि स्कूली बच्चों को उसके इस्तेमाल की इजाजत मिल सके। इसके साथ ही बिजली न होना भी बच्चों की पढ़ाई में बाधा डाल रहा है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के साल 2017-18 के एक रिपोर्ट के अनुसार केवल 47 फीसदी घर ऐसे हैं, जहां 12 घंटे या उससे ज्यादा बिजली रहती है। ऐसे में टीवी के होने से भी कोई खास फायदा नहीं होता है। इसके अलावा, महामारी के दौरान शिक्षा में बाधा पडऩे की एक और बड़ी वजह डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता में भारी असमानता है। स्मार्टफ़ोन रखने के मामले में भारत में बहुत अधिक असमानता देखने को मिलती है। यही स्थिति इंटरनेट की सुविधा के मामले में भी है।

शिक्षा को लेकर सरकार और प्रायवेट शिक्षण संस्थाओं को पिछले एक साल के कोरोना संक्रमण के दौरान जिस तरह की तैयारी करनी थी, वह नहीं हुई। सबकी सोच यही रही कि ये थोड़ी दिन की बात है, जैसे-तैसे जो चल रहा है, चलने दो। स्कूल-कॉलेज जाकर परंपरागत ढंग से पढऩे वाले विद्यार्थियों की पढ़ाई, लिखाई छूट गई। ऑन लाईन क्लास के माध्यम से पढ़ाई का ज्यादा कम माता-पिता करते रहे। अब बच्चों पर परीक्षा का भी कोई दबाव नहीं है। आने वाले समय में शिक्षा की गुणवत्ता, विद्यार्थियों के पढ़ाई-लिखाई का स्तर क्या होगा यह कह पाना मुश्किल है। बहरहाल छत्तीसगढ़ के सोशल मीडिया पर यह वाक्य ट्रेडिंग कर रहा है-
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री द्वारा स्कूलों में जनरल प्रमोशन का फैसला लेने के बाद...
छत्तीसगढ़ के बच्चे -
काकरो बाप नहीं कर सके मोला फैल...
मोर नेता भूपेश बघेल....