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तेरी मेरी सबकी बात

तेरी मेरी सबकी बात


 सुभाष मिश्र

सरकार का स्लोगन है 'सबका साथ, सबका विकास. आज कोरोना के चलते विकास तो जरूर पीछे छूट गया है, पर सबका साथ जरूर है। मजबूरी में ही सही आज सब अलग-अलग होते हुए भी साथ-साथ हैं। सबने प्रधानमंत्री के आह्वान पर एक साथ ताली बजाई। घर में रहकर अपनी और औरों की जान सुरक्षित की। कुछ लोग जरूर नालायक निकलें, निकल रहे हैं, उनका क्या कीजिए। उनके लिए बहुत से कानूनी उपाय हैं। बहरहाल सबकी पीड़ा और सबकी दिनचर्या लगभग एक सी है।

जिन लोगों ने व्यक्तिगत काम के महत्व को, स्वयं को छोटे-मोटे घरेलू कार्यों को नकार दिया था, आज उन्हें मजबूरी में ही सही अपने सारे काम करने पड़ रहे हैं। कहावत है 'जाके पांव ना फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। आज कोरोना की बिंबाई से सबके पांव छलनी है। कोरोना की सबसे ज्यादा मार गरीब और श्रमिक वर्ग पर पड़ी है। किसान की हालात भी कुछ अच्छी नहीं है। खेत में फसल खड़ी है, पर काटने वाले नहीं मिल रहे हैं। कमाने, खाने के लिये कई-कई दिन, महीनों घर से बाहर रहने वाले भी घर में हैं। जो घर में नहीं हैं, उन्हें घर की चिंता है।

सरकारी महकमे ने भले ही पलायन—पंजी का ठीक ढंग से संधारण न किया हो पर अब कोरोना की चैन को रोकने ढूंढ-ढूंढकर कोरोना पंजी और उसका जद में आये लोगों की शिनाख्त पूरी मुस्तैदी से की जा रही है। जो लोग विनोद कुमार शुक्ल की कविता की तरह सोचते हैं, वे पूरी दुनिया को लेकर चिंतित हैं। श्री शुक्ल लिखते हैं :


दूर से अपना घर देखना चाहिए
मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर
कभी लौट सकेंगे की पूरी आशा में
सात समुन्दर पार चले जाना चाहिए.
जाते जाते पलटकर देखना चाहिये
दूसरे देश से अपना देश
अन्तरिक्ष से अपनी पृथ्वी
तब घर में बच्चे क्या करते होंगे की याद
पृथ्वी में बच्चे क्या करते होंगे की चिंता
घर में अन्न जल होगा कि नहीं की चिंता
पृथ्वी में अन्न जल की चिंता होगी
पृथ्वी में कोई भूखा
घर में भूखा जैसा होगा

सोशल डिस्टेसिंग का पालन करने वाले लोग अपने-अपने घरों में, कालोनी के परिसर में है और जो लोग जरूरी काम में लगे हैं, वे भी कोरोनारूपी अघोषित मृत्यु से अपने भय पर काबू रखकर, मुकाबला कर रहे हैं। यह एक ऐसी लड़ाई है जिनसे कोई बड़ा, कोई छोटा, कोई जात पात, उंच नीच नहीं है। इसकी मार सभी पर बराबरी से पड़ रही है। ऐसा पहली बार हुआ है कि यह कोरोना की बीमारी हवाई मार्ग से ऊंचे तबके की वजह से देश में आई है वरना अभी तक सारी बीमारियों का ठेका गरीब, तंग बस्ती वासियों में रहने वालों के सिर था। कोरोना संक्रमण से बचे रहने के चलते एक शहर में रहते हुए भी रिश्तेदार, मित्र एक—दूसरे से नहीं मिल पा रहे हैं।

भला हो संचार की नई तकनीक का जिसके कारण आज घर में बैठे लोग भी व्हाट्सअप, फेसबुक, इस्ट्राग्राम आदि के जरिए एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। कोरोना वायरस फैलाने के लिये चीन को लाख गालियां निकलते हुए भी लोग उसकी के द्वारा ईजाद किये गये गेम पपजी खेलने तथा टिक टॉक, लाईक बनाने में लगे हुए हैं। कोरोना संक्रमण के चलते धीरे-धीरे अब समाज का रवैय्या, सोच और कार्यप्रणाली में बदलाव दिखने लगा है। कोरोना संकट के चलते पारिवारिक इकाई का महत्व लोगों को समझ में आया है। एक दूसरे के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से रहना, जो लोग धीरे-धीरे भूलते जा रहे थे, सीख रहे हैं।

पितृ सत्तात्मक समाज का पुरूष अब मजबूरी में ही सही, अपने घर की स्त्री का घरेलू कामो में हाथ बंटा रहा है। 21 दिन के घरेलू प्रवास में बहुत से लोगों ने नई तकनीक के साथ अपने को जोड़ा है। अब लोग न्यूज पेपर की बजाय ई-पेपर पढऩा पसंद कर रहे हैं। ई-गवर्नेंस का कार्य जिसे लागू करने की बात सालों से हो रही थी, अब सोशल डिस्टेसिंग की मजबूरी में तेजी से हो रहा है। देश इस तेजी से बदलेगा, ऐसा किसी ने भी सपने में नहीं सोचा था कि एक झटके में बहुत से बैंकों का विलय, हवाई जहाज, ट्रेन, बस, ट्रक सबका रूक जाना। सोशल डिस्टेसिंग के नाम पर एक ही देश में, राज्य में, जिले में अब गांव कस्बे में सीमाओं का सील हो जाना। जरा सी छींक खांसी पर खुद पर संदेह होना।

मनुष्य का अपने अघोषित शत्रु से अपनी संभावित मृत्यु के लिए उपजा भय, पहले कभी इस तरह देखने नहीं मिला था। तीज त्यौहारों पर होने वाली रौनक, मेले-ठेले, भक्तगणों का देवी पर्व में लाखों की संख्या में मंदिरों में जाना, पैदल चलकर जाना, सब बंद हो गया। नवदुर्गा के समय मंदिरों में सैकड़ों जोत जलाये बिना, नंगे पांव जाये बिना घर में बैठे लोगों को संत कबीर का भजन याद आ रहा है।


मोको कहाँ ढूंढें बन्दे,
मैं तो तेरे पास में ।
ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकांत निवास में ।
ना मंदिर में, ना मस्जिद में, ना काबे कैलाश में ॥
ना मैं जप में, ना मैं तप में, ना मैं व्रत उपवास में ।
ना मैं क्रिया कर्म में रहता, ना ही योग संन्यास में ॥


बहुत से लोगों को मंदिर-वंदिर जाने का अनावश्यक अंधविश्वास और आडम्बर के चलते ईश्वर को यहां—वहां धार्मिक स्थलों में चढऩे वाले चढ़ावे के कारण कुछ लोगों द्वारा ईश्वर की भक्ति के दिखावे के नाम पर किये जा रहे व्यवसायीकरण पर भी रोक लगी है। लोगों ने देख लिया है कि बिना मंदिर-मस्जिद जाये घर में बैठकर भी अल्लाह-ईश्वर की आराधना की जा सकती है। जो लोग बेघर, बेदर, बेरोजगार होकर अपनी जान बचाने के लिए कई-कई मिल पैदल चलकर या 14 दिन किसी जगह क्वारटीन होकर अपने घर गांव तक लौट रहे हैं लोग कितने दिनों तक घर में रह पायेंगे। जिनके पास न जमीन जायदाद है ना किसी प्रकार का बीमा, ना ही कोई मास्क या सैनेटाईजर।

वे लोग कब अपने काम धंधे पर लौटेंगें और क्या अब उन्हें उसी तरह शहरों में काम मिलेगा जैसा वे छोड़कर आये हैं। चूंकि इस विपदा काल में उद्योग धंधों की हालत भी खराब हुई है और वे खुद ही अपनी मुक्ति के लिए सरकारी राहत की गुहार कर रहे हैं, ऐसे में क्या वे बाकी को रोजगार दे पायेंगे। बहुत से सवालों के साथ तेरी मेरी सबकी बात हो रही है। यह दु:ख तकलीफ किसी एक का नहीं, सभी का है। खेती किसानी, व्यापार, धंधा, उत्पादन इकाईयां आदि सब कुछ रूक जाने से देश के आर्थिक हालात, हमें आने वाले समय में नये तरीके से जीने के लिये विवश करेंगे।

हमें अपनी जरूरतों को सीमित करना होगा। एक दूसरे पर अधिक, सामाजिक रूप से आश्रित समाज ने भविष्य में एक दूसरे को सहयोग नहीं किया तो देश के हालात कोरोना संक्रमण से भी ज्यााद खराब होंगे। सरकार द्वारा अपने स्तर पर बहुत से उपाय, राहत की घोषणा की गई है किन्तु जब तक समाज का बड़ा तबका आगे नहीं आये, जब तक लोग सबके बारे में नहीं सोचेंगे तब तक समाज के भीतर गहरा असंतोष पनपेगा। वसुदैव कुटुम्बकम की बात कहने वाले हमारे देश के लोगों को अब समझना होगा कि हमारी असली लड़ाई किन चीजों से है! यदि अभी भी हम जात पात, ऊंचनीच, हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर, मस्जिद के मामलों में उलझे रहे तो हम कोरोना के चलते जितने पिछड़े हैं, उससे भी कहीं अधिक हम आगे पिछड़ेंगे. ऐसा कुछ हो, चुप्पी टूटे, सन्नाटे बोले, इसके पहले तुम—हम, हम—तुम संग साथ हो लें।