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छत्तीसगढ़ एक खोज: इक्यावनवीं कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव- एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष

छत्तीसगढ़ एक खोज: इक्यावनवीं कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव- एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष


रमेश अनुपम
18 मार्च के पश्चात स्थिति बिगड़ती ही चली गई। आदिवासियों का असंतोष बढ़ता ही चला गया जो किसी तरह रुकने का नाम नहीं ले रहा था। महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की गुहार हमेशा की तरह इस बार भी अनसुनी ही रह गई। शासन-प्रशासन इस सबसे हमेशा की भांति उदासीन ही बना रहा।

इस बीच 22 मार्च को कमिश्नर वीरभद्र सिंह जगदलपुर आए। सर्किट हॉउस में रविशंकर वाजपेयी नागरिकों के एक शिष्टमंडल के साथ मिले और उन्हें वस्तु स्थिति की जानकारी दी।

कमिश्नर वीरभद्र सिंह ने नागरिकों के शिष्टमंडल को यह आश्वासन दिया की एस.ए.एफ की बटालियन अगले 10 दिनों तक गांव में पेट्रोलिंग नहीं करेगी। इसके बाद कमिश्नर बीजापुर के लिए रवाना हो गए।

स्थानीय प्रशासन ने कमिश्नर की इस बात को भी गंभीरता से नहीं लिया। एस.ए.एफ के जवानो की पेट्रोलिंग नहीं रुकी। आदिवासियों का असंतोष बढ़ता ही चला जा रहा था। 24 मार्च को बड़ी संख्या में आदिवासी राजमहल पहुंचने लगे थे।

25 मार्च सन 1966 की सुबह जगदलपुर में होने वाली एक सामान्य सुबह ही थी। इंद्रावती धीरे-धीरे बह रही थी। पूर्व दिशा में सूर्य इंद्रावती की जल राशि को निहारता हुआ नीले बादलों के बीच से मुस्कुराता हुआ उदित हो रहा था। सागौन और साल के वृक्षों पर बैठी हुई वनपाखियां अपना आलस छोड़कर उन्मुक्त नभ में उडऩे के लिए बेकरार हो रही थीं।
इधर, राजमहल में एकत्र आदिवासी अपने-अपने ईटों के चूल्हों पर कोदों रांध रहे थे। कुछ आदिवासी आपस में बैठकर अपने गांव घर की बातें कर रहे थे। कुछ ही देर में घटित होने वाली दारुण विपदा से बेखबर आदिवासियों का हुजूम राजमहल के बाहर और भीतर अपने सामान्य दिनचर्या के कामों में मशगूल था।

राजमहल के भीतर संचालित होने वाले महाविद्यालय और स्कूल में शिक्षक और छात्र-छात्राएं रोज की भांति पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त थे।
सुबह धीरे-धीरे राजमहल की मुंडेरों पर खिसकने लगी थी। घड़ी का कांटा धीरे-धीरे सरकता हुआ दस की ओर बढ़ रहा था। तभी जैसे राजमहल में एक भूचाल सा आ गया। सुरक्षा बल के जवान भारी संख्या में राजमहल के भीतर घुस आए थे। आदिवासियों के ईंटों पर पकने वाले भोजन को लाठियों से गिराने लगे थे।आदिवासियों को सरेआम पीटने लगे थे। राजमहल के भीतर बिना किसी चेतावनी के अश्रु गैस के गोले फेंके जाने लगे। चारों ओर अफरा-तफरी मच गई थी।

महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव स्वयं स्कूल पहुंचकर बच्चों और शिक्षकों को राजमहल के पीछे के दरवाजे से जो दलपत सागर की ओर खुलता था, उससे बाहर निकालने में लग गए थे।

इधर आदिवासी पुलिस जवानों द्वारा अचानक किए जाने वाले लाठी चार्ज और अश्रु गैस से क्रोधित हो उठे थे। उन्होंने अपने-अपने तीर धनुष उठा लिए थे। पुलिस के जवानों को मौका मिल गया था उन्होंने आदिवासियों पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी थी।

अपरान्ह 10. 45 को जगदलपुर शहर में धारा 144 लगाए जाने की घोषणा लाउडस्पीकर द्वारा की जाने लगी। राजमहल के भीतर से धमाकों की आवाज आने लगी थी। राजमहल की दीवारें धमाकों और गोलियों की आवाज से थरथराने लगी थीं।

आसपास के पेड़ों पर बैठी हुई वनपाखियां इन धमाकों के डर से न जाने कब की उड़ चुकी थीं। सारे शहर की सड़कें इन धमाकों और गोलियों की ताबड़तोड़ फायरिंग से गूंजने लगी थीं। लोग अपने-अपने घरों में दुबक कर बैठ गए थे। सबने घर के भीतर की सांकल चढ़ा रखी थी। धमाकों और फायरिंग की आवाजों से दलपत सागर के पानी में कंपकपी सी फैल गई थी। इंद्रावती की जलराशि भी जैसे बैचेन होकर ठहर गई थी। 25 मार्च सन 1966 को इस मनहूस तारीख को न दलपत सागर कभी भूला सकता है और न इंद्रावती नदी ही। इस काली तारीख को कभी भूलाया नहीं जा सकता।
25 मार्च को अपरान्ह 11 बजे से शुरू हुई पुलिस फायरिंग 26 मार्च की सुबह 4 बजे तक चलती रही।  उस रात कोई परिंदा अपने घोसलों में ठीक से नहीं सो सका था और न ही जगदलपुर के लोग ही उस रात चैन से सो पाए थे।

25 मार्च को सारा शहर गोलियों की आवाज से कांप रहा था। 26 मार्च की सुबह इंद्रावती नदी ने सबसे पहले देखा कि आज का सूर्य पहले से कुछ बदला हुआ सा है और आसपास के पेड़ों से सवाल किया कि आज का सूर्य इतना रक्तिम क्यों है?


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