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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - संस्कृति के क्षेत्र में ऐतिहासिक फैसला

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - संस्कृति के क्षेत्र में ऐतिहासिक फैसला

- सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल बहुत ही उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण है कि वह भारत भवन की तर्ज पर एक संस्कृति भवन बनाना चाहती है, इसीलिए उन्होंने संस्कृति परिषद के गठन की घोषणा भी की है। किसी भी देश और समाज की संवेदनशीलता और मनुष्यता की पहचान वहां की संस्कृति पर निर्भर करती है। किसी भी देश और समाज की संस्कृति उस देश की आत्मा की पहचान होती है। सांस्कृतिक संपन्नता देश का गौरव होती है। जिस समाज या राज्य की संस्कृति जितनी संपन्न होगी उस राज्य की पहचान विशिष्ट रहती है, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार के लिए असली चुनौती अब शुरू होगी, क्योंकि महज इमारतें बना देने से संस्कृति का संरक्षण नहीं होता, उसके लिए योग्य व्यक्ति और संस्था में कारगर नीतियों का गठन होना होगा। संस्कृति परिषद में आदिवासी लोककला परिषद, कला परिषद और साहित्य परिषद पृथक-पृथक होना चाहिये और इसके लिए प्रतिवर्ष पर्याप्त बजट की व्यवस्था की जानी चाहिए। सरकार ने घोषणा करके अपनी सांस्कृतिक नीयत का उजलापन जाहिर कर दिया है और अब जब इसे अमलीजामा पहनाया जाएगा तब निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ का नाम देशभर में एक विशिष्ट पहचान के साथ लिया जाएगा। छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक रूप से बहुत संपन्न है और उसकी अपनी एक पृथक से गौरवशाली पहचान है। अब इसके संरक्षण, संवर्धन और सुरक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाना भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी होगी। उम्मीद की जा सकती है कि छत्तीसगढ़ सरकार अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारी को न केवल अच्छी तरह से समझती है, बल्कि अपनी नेक नियत को अच्छी तरह से प्रकट करने के लिए कटिबद्ध रहेगी, यह एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला है। प्राय: सरकारें संस्कृति के क्षेत्र में किसी भी कार्य को करने में इसलिए विलंब करती है कि वह उसकी प्राथमिकता में नहीं रहता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे अपनी प्राथमिकता में शामिल किया है इसलिए निश्चित रूप से वह साधुवाद की हकदार है। एक अच्छी शुरुआत का संकल्प निश्चित रूप से अच्छे परिणाम तक भी पहुंचता है। एक अच्छा संकल्प लिया गया है। एक अच्छी नियत के साथ लिया गया है तो निश्चित रूप से यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को न केवल अक्षुण्ण रखेगा बल्कि उसके सांस्कृतिक वैभव को पूरी देश-दुनिया में एक निराली पहचान देगा। बस जरूरत इतनी है कि इसमें पूरी परिकल्पना के निर्माण और पूर्णता में और उसके संचालन संवाहन में किसी प्रकार का कोई स्थानीय समझौता ना किया जाए। मध्यप्रदेश में भारत भवन के संचालन में तत्कालीन समय में किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं था और वह पूर्ण रूप से साहित्यिक और सांस्कृतिक विशेषज्ञ लोगों के हाथों में था। यही कोशिश यहां भी होनी चाहिए ज्ञानवान, गुणवान और दूरदर्शी लोगों की दखल इसमें होनी चाहिए।

इस संबंध में भविष्य में जो भी स्वरूप निर्धारित होगा उसमें संस्कृति परिषद का एकीकृत रूप में गठन करने की बजाय साहित्य संगीत दृश्य कला रूपंकर कला आदिवासी एवं लोककला के लिए स्वतंत्र स्वायत्त परिषदों का गठन किया जाए तो पारम्परिक और लोककलाओं के संरक्षण और समकालीन कलाओं के संवर्धन का काम बेहतर ढंग से हो सकेगा।

2. इन परिषदों की स्वायत्तता की रक्षा बहुत आवश्यक है अन्यथा ये नौकरशाही की चपेट में आकर अपना ध्येय और अर्थवत्ता खो देंगी। इनके वैधानिक ढांचे में सचिव को न सिफऱ्  समुचित वित्तीय अधिकार प्रदान किये जाने की व्यवस्था होनी चाहिए बल्कि उसकी नियुक्ति योग्यता और संबंधित कला क्षेत्र में उसके विशिष्ट योगदान के आधार पर किये जाने का प्रावधान किया जाना चाहिए।

3.परिषदों के सदस्य के रूप में मीडियाकरों को नहीं बल्कि श्रेष्ठ सर्जकों को स्थान दिया जाना चाहिये। ऐसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जिनसे धर्मनिरपेक्षता, समता, न्याय जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास हो। राम वनपथ गमन का विकास आज दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यक्रम का सांस्कृतिक पक्ष निर्मित करता है। यह छद्म एजेंडा है। अगर मौजूदा शासन के सांस्कृतिक एजेंडा में यह प्रमुख रूप से शामिल है तो कहना होगा कि इसके विचारधारात्मक प्रभाव से राज्य के सांस्कृतिक कार्यकलाप को मुक्त रखना एक बड़ी चुनौती होगी।

4. सरकार का राजनीतिक दृष्टिकोण और उसकी व्यावहारिक रणनीति में स्थानीयतावाद की गहरी छाप दिखाई देती है। संस्कृति के क्षेत्र में कहीं यह संकीर्ण रूप न ले ले यह भी एक ख़तरा है। इससे स्थानीयता के दुराग्रह से कुचल दी गई संस्कृति के अनुदार, रूढ़ और अतिवादी संस्करण को विकसित होने से रोका नहीं जा सकेगा।

5. समकालीन फासीवाद की सर्वग्रासी विचारधारा के दुष्प्रभाव को रोकने में राज्य की सांस्कृतिक सक्रियता को कारगर बनाने के लिये समावेशी कार्यक्रम तैयार कर उसे लागू करना आज राज्य की सबसे बड़ी सांस्कृतिक चुनौती होगी। अगर इसे स्वीकार नहीं किया गया तो सारी क़वायद व्यर्थ हो जाएगी।

6. छत्तीसगढ़ में भारत भवन की क्या सचमुच जरूरत है, अगर ऐसी कोई संस्था बनती है तो मध्यप्रदेश से किस तरह इसकी अलग राह विकसित करनी होगी, इस पर भी मंथन जरूरी है। यहां यह भी जरूरी है कि राज्य को स्पष्ट सांस्कृतिक नीति तैयार कर उसके आधार पर कार्य करना चाहिए। यह सांस्कृतिक नीति, धर्मनिरपेक्षत और सामाजिक समन्वय के उच्चतर मूल्यों के आधार पर निर्मित की जानी चाहिए।  

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के दौरान जब संस्कृति परिषद और भारत भवन को बजट में पारित किये जाने की घोषणा की तो पूरे प्रदेश के लिए एक सुखद और अभिनव खबर थी। विगत बीस वर्षों से हमारा छत्तीसगढ़ राज्य साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में लगभग शून्य रहा है। पिछले अनेक वर्षों से छत्तीसगढ़ के साहित्य एवं संस्कृतिकर्मी इसे लेकर बेहद चिंतित रहे हैं तथा इन परिषदों की मांग करते रहे हैं। वर्तमान कांग्रेस सरकार से सभी साहित्यिक सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को उम्मीद थी। मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ कला, शिक्षा, वनोपज, कृषि एवं अन्य सभी प्रकार के उत्पादों तथा व्यंजनों को एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराने के लिए सी मार्ट स्टोर की स्थापना करने की घोषणा की है, जो सराहनीय है।

आज जिस भारत भवन की बात हो रही है वह भारत भवन भारत के प्रान्त भोपाल में स्थित एक विविध कला सांस्कृतिक केंद्र एवं संग्रहालय है। इसमें कला दीर्घा, आट्र्स गैलरी, ललित कला संग्रह, इनडोर-आउटडोर आडिटोरियम, रिहर्सल रूम, भारतीय कविताओं का पुस्तकालय आदि कई चीजें शामिल हैं। भोपाल के बड़े तालाब के निकट स्थित भारत भवन के सूत्रधार चाल्र्स कोरिया का कहना है-यह कला केन्द्र एक बहुत ही सुंदर स्थान पर स्थित है, पानी पर झुका हुआ एक पठार जहाँ से तालाब और ऐतिहासिक शहर दिखाई देता है।

वर्ष 1982 में स्थापित भारत भवन में अनेक रचनात्मक कलाओं का प्रदर्शन किया जाता है। भारत भवन के पांच अंग हैं। जिनमें रूपंकर ललित कला का संग्रहालय है। रंगमंडल का सम्बन्ध रंगमंच से है। वागर्थ कविताओं का केन्द्र है। अनहद शास्त्रीय और लोक संगीत का केन्द्र है, जबकि छवि सिनेमा से जुड़ी गतिविधियों के लिए है। अपनी स्थापना के समय से ही भारत भवन कला के केंद्र के रूप में पहचाना जाता रहा है। भारत भवन अपनी कला से जुड़ी गतिविधियों के साथ ही अपनी स्थापत्य कला और प्राकृतिक दृश्यों के लिए भी मशहूर है। भारत भवन को भारत भवन बनाने में अर्जुन सिंह जैसे मुख्यमंत्री और अशोक वाजपेयी जैसे साहित्यिक, सांस्कृतिक अभिरुचि के ब्यूरोक्रेट कवि, लेखक, शामिल थे। भारत भवन की स्वायत्तता बरकरार रहे इसके लिए सरकार ने अपने स्तर पर यहां काम करने की पूरी छूट दी।

छत्तीसगढ़ जहां सिनेमा उद्योग भी राज्य बनने के बाद से तेजी से पनपा है। एक ओर जहां सरकार भारत भवन की तर्ज पर भवन बनाने के लिए अपनी रूचि दिखा रही है वहीं दूसरी ओर नवा रायपुर अटल नगर में फिल्म निर्माण के लिए अलग से फिल्म सिटी बनाने वाली है। पुरखौती मुक्तांगन के निकट 300 एकड़ में फिल्म सिटी के निर्माण का प्रस्ताव है। प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में नकली और कृत्रिम निर्माण से ज्यादा जरुरी नई तकनीक और सिनेमा की शिक्षा  है। लोकेशन तो चारों ओर है, प्रशिक्षण और व्यवहारिक ज्ञान यहां के लिए ज्यादा जरुरी है, इसका भी ध्यान रखना होगा।