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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -अंग्रेज चले गए, सी. आर. छोड़ गए

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -अंग्रेज चले गए, सी. आर. छोड़ गए


अगर आप सरकारी अधिकारी-कर्मचारी हैं या उनके परिवार से हैं या आपका वास्ता उनसे पड़ता है तो आप सी. आर. का मतलब भली-भांति समझ सकते हैं। सीआर यानी कान्फिडेंशियल रिपोर्ट। सरकारी भाषा में इसे वार्षिक गोपनीय चरित्रावली भी कहा जाता है। भारतीय सेवा के अधिकारियों के लिए यह एनुअल अप्रेजल रिपोर्ट होती है जो जितना बड़ा अधिकारी होता है उसे उतनी ही अपने सी. आर. की चिंता होती है। अच्छी सी.आर. के आधार पर ही अगला प्रमोशन मिलता है। क्लास वन से  सुपर क्लास वन में प्रमोशन के लिए मेरिट कम सीनियरिटी का सिस्टम है। यानी यदि आपकी पिछले 5 साल की सी. आर. प्रमोशन के समय ए प्लस पाई गई तो आप अपने सीनियर को सुपर सीट करके प्रमोशन पा सकते हैं। इस खेल में बहुत सारे जूनियर अधिकारी अपने सीनियर का हक मारके डिपार्टमेंट में प्रमोशन पा चुके हैं। सी. आर. का संबंध सरकारी व्यक्ति के कामकाज से कम सीनियर अफसरों, विभागीय मंत्रियों की चाटुकारिता से ज्यादा होता है। कम ही लोग ऐसे खुशकिस्मत होते हैं जिन्हें उनके बॉस उनके कामकाज और समूचे व्यक्तित्व का मूल्यांकन कर ए प्लस सी. आर. देते हों। हमारे देश में ईस्ट इंडिया कंपनी आने के बाद जब अंग्रेजों का राज आया तब उन्होंने राजकाज को चलाने के लिए आई सी एस सेवा के अधिकारियों को पदस्थ किया। कलेक्टर-कमिश्नर जैसे अधिकारी जब एक दूसरी जगह जाते थे तो एक ब्लू डायरी में वहां के लोगों के बारे में वहां की गतिविधियों के बारे में एक गोपनीय रिपोर्ट लिखकर छोड़ जाते थे ताकि आने वाला अधिकारी उसे पढ़कर सारी बातों को जान सके। ये एक प्रकार से कच्चा चिट्ठा या गुरुमंत्र होता था राज करने के लिए। गुलाम मानसिकता की प्रतीक है यह कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट (सी.आर.)। आज इसकी उपयोगिता और औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या इसको लिखने की जरूरत भी है क्या पहले तो सी.आर. शब्द पर ही आपत्ति है। क्या सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए पारदर्शिता की ज्यादा जरूरत है न कि सी.आर. की। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऑर्डर पास करके हर शासकीय सेवक को उसकी सी.आर. कम्युनिकेट करना जरूरी कर दिया है। यदि ये सी.आर. जब सभी संबंधितों को कम्युनिकेट हो गई तो फिरये कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट कैसे रही। सी. आर. लिखने की समूची प्रक्रिया को नया स्वरूप देने की जरूरत है। सी.आर. का प्रमोशन से कोई संबंध नहीं होना चाहिए। मेरिट कम सीनियरिटी प्रणाली को खत्म होना ही चाहिए। जिस तरह बैंक और अन्य जगहों पर परीक्षा प्रणाली द्वारा आगे के प्रमोशन होते हैं उसी तरह सरकारी विभागो3 में भी प्रमोशन होना चाहिए। सीआर रंग दूंगा, बिगाड़ दूंगा यह वाक्य अक्सर सरकारी दफ्तरो की बेजान दीवारों से टकराता रहता है। यह इतना बड़ा हथियार है जिससे अच्छा खासा अफसर भी डरने लगता है। यदि लोगों को सीआर की चिंता या डर ना हो तो वो अपने बॉस के घर मारे डर के साल में दशहरा दीपावली मिलने भी ना जाये।

सुप्रसिद्घ व्यग्यंकार हरिशंकर परसाई कहते हैं कि जब आपका बॉस आपको बड़ी-बड़ी धमकी दे तो समझ लो कि वो आपका तबादला करवा सकता है आपको सस्पेंड करवा सकता है इससे ज्यादा वो कुछ नहीं कर सकता। सी.आर. और ट्रांसफर ये दो कारण हैं जिसकी वजह से सरकारी लोग खुलकर अपनी बात विचार अपने सीनियर के सामने नहीं रख पाते। यदि शासकीय अधिकारी अपने दिमाग से सी. आर. और स्थानांतरण का भय निकाल दे तो वह खुलकर जन सेवा कर सकता है। सी. आर. एक तरह से हमारी गुलाम व्यवस्था का ही प्रतीक है वह गुलामी के लिए प्रेरित करता है। सी. आर. के जरिये प्रमोशन की प्रणाली को खत्म कर हर 5 साल में एग्जाम होना चाहिए। प्रमोशन के लिए संबंधित अधिकारी का साइकोलॉजी टेस्ट लेकर उसकी कार्य के प्रति लगन और उत्साह और संस्था को आगे ले जाने की इच्छा शक्ति को देखा जाना चाहिए। अभी हाल ही में 20 साल की सेवा या 50 साल की आयु के आधार पर पूर्वाग्रह से बहुत सारे कर्मचारी अधिकारियों को नौकरी से निकाला गया जिन्हें बाद में कोर्ट के आदेश पर वापस नौकरी में रखा गया।

व्यापारिक बोलचाल में करोड़ की बात वन सीआर, टूसीआर, जैसी शब्दावली में होती है। कुछ व्यापारिक सोच के अफसर की सी.आर. लिखने के लिए नगद नारायण चाहते हैं। सरकार के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद बहुत सारे अधिकारी अपने मातहत अधिकारी, कर्मचारी की वार्षिक गोपनीय चरित्रावली समय पर नहीं लिखते। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग के स्पष्ट निर्देश हैं किन्तु अधिकारी इनका भी पालन नहीं करते। अप्रैल महीने में लिखी जाने वाली वार्षिक गोपनीय चरित्रावली के संबंध में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा कोरोना वायरस संक्रमण से उत्पन्न स्थिति के कारण शासकीय सेवकों की गोपनीय चरित्रावली लिखे जाने की समय-सीमा में केवल वर्ष 2019-20 की अवधि के लिए एक माह की वृद्धि करने का निर्णय लिया था किन्तु आज भी बहुत से अधिकारी अपनी सी.आर. लिखवाने के लिए भटक रहे हैं। बहुत से अधिकारी सी.आर. के अभाव में पदोन्नति से वंचित हो रहे हैं। आफिसों से सी.आर. गायब होना आम बात है। अक्सर प्रमोशन के समय लोगों की सी.आर.गुम हो जाती है या कर दी जाती है।
एसीआर यानी वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन प्रत्येक वित्त वर्ष अनुसार लिखी जाती है। यानी 1 अप्रैल से 31 मार्च तक की अवधि के कार्य व्यवहार आचरण का आकलन किया जाता है। आहरण संवितरण अधिकारी या कार्यालय प्रमुख का दायित्व होता है कि वह प्रत्येक 30 अप्रैल तक अपने कार्यालय के सभी कर्मचारियों की एसीआर तैयार करके संबंधित की निजी नत्थी में रखें। एसीआर में श्रेणी विभाजन और अंक इस प्रकार होते हैं-
क-4 अंक -उत्कृष्ट, ख-3 अंक -बहुत अच्छा, ग-2 अंक -अच्छा, घ-1 अंक -औसत, इ-0 अंक  घटिया होता है। यदि सी.आर.में एसीआर में कर्मचारी के विरुद्ध प्रतिकूल टिप्पणी की जा रही है तो कार्यालय प्रमुख का दायित्व है कि वह संबंधित को इस आशय का सूचना पत्र प्रदान करें और कर्मचारी अपने विरुद्ध की गयी प्रतिकूल टिपण्णी को विलोपित करवाने के लिए अभ्यावेदन दे सके। अथवा प्रतिकूल टिपण्णी का सूचना पत्र इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि कर्मचारी अपने कार्य व्यवहार आचरण में सुधार कर सके। अभ्यावेदन पर सामान्य रूप से प्रतिकूल टिपण्णी विलोपित करने का अधिकार टिपण्णी अंकित करने वाले अधिकारी के सबसे पहले उच्च पद के अधिकारी को होता है। क्रमोन्नति और पदोन्नति में पिछले 5 वर्षों की एसीआर देखी जाती है, 5 वर्षों में 10 या अधिक अंक प्राप्त करने वाला कर्मचारी पात्र माना जाता है।

वार्षिक गोपनीय चरित्रावली रिपोर्ट एसीआर एक लोक सेवक की प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट है जो उसके तत्काल वरिष्ठ अधिकारी द्वारा लिखी जाती है। इसमें शासकीय सेवक के कार्य प्रदर्शन के अलावा, उस अधिकारी के चरित्र, आचरण और सत्यनिष्ठा आदि पर भी विशिष्ट टिप्पणियां शामिल रहती है।

उच्चतम न्यायालय ने देवदत्त बनाम भारत संघ के मामले में अपने निर्णय दिनांक 12.5.2008 में निर्धारित किया है कि वार्षिक गोपनीय चरित्रावली के बारे में संबंधित शासकीय सेवक को सूचित किया जाना चाहिए ताकि वह यदि उस रिपोर्ट को अपग्रेड कराना चाहता हो तो अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सके।  बहुत सारे विभागों में अभी भी अपने अधिकारियों-कर्मचारियों को सी.आर. संसूचित नहीं की जाती।

सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा सी.आर. के संबंध में स्पष्ट निर्देश है कि वार्षिक गोपनीय चरित्रावली पर प्रतिवेदित अधिकारी का भविष्य निर्भर रहता है, अत: इसे अत्यंत सावधानी से लिखे जाने चाहिए। वार्षिक गोपनीय चरित्रावली लिखने वाले अधिकारी को अपर्याप्त सामग्री या सुनी सुनाई बातों के आधार पर अस्पष्ट टिप्पणियां और मत देने से बचना चाहिए। इस बात की सावधानी रखना चाहिए कि व्यक्तिगत रूचियों, अरूचियों तथा व्यक्तिगत राय का स्थान न मिले, केवल कार्यों, आचरण व इस संबंध में शासन के निर्देशों के अनुुसार ही इस पर टिप्पणी की जाना चाहिए। सरकार की इस मंशा के ठीक विपरीत सी.आर. लिखने का काम बहुत ही कैजुअल तरीके से होता है। जब तक अधिकारी स्वयं संपर्क नहीं करे, बॉस को उपकृत नहीं करे तब तक बहुत सारे बॉस मोगाम्बो खुश हुआ के तहत खुश नहीं होते। मातहत अधिकारी पर अपना रौब और प्रभाव कायम रहे इस कारण से भी बहुत से अधिकारी सी.आर. नहीं लिखते या इसे दबाकर रखते हैं। सी.आर. का उपयोग लोग हथियार की तरह करते हैं।  सी.आर. का खेल कोई पास कोई फेल पर अब बदलते समय और बदलती कार्यप्रणाली के साथ विचार करने की जरुरत है। सभी कर्मचारी अधिकारी के लिए सी.आर. का सिस्टम एक सा ऑनलाईन होना चाहिए। सी.आर. लिखने के लिए एक निर्धारित समय सीमा पर वह पोर्टल की खिड़की खुले जिस पर ऑनलाईन सी.आर. जमा की जा सके। इसके पश्चात जिन अधिकारियों को इसमें अपना अभिमत देना है, उसकी भी एक निश्चित समय सीमा हो। यदि समयावधि का पालन नहीं होता तो ऑनलाईन शोकाज नोटिस आदि का प्रावधान हो। सी. आर. लिखने का पूरा मामला मनमर्जी पर न होकर एक सुव्यवस्थित पारदर्शी आधुनिक ऑनलाईन प्रणाली पर हो।