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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सेरोलॉजिकल सर्वे के परिणाम और लॉकडाउन

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सेरोलॉजिकल सर्वे के परिणाम और लॉकडाउन

 
पूरे देश में कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं होने से स्थानीय प्रशासन अपनी समझ और परिस्थिति के अनुसार निर्णय ले रहा है। अभी तक देशव्यापी कोरोना आपदा प्रबंधन की कोई नीति नहीं बनी। कोरोना को लेकर इस समय जितने मुंह उतनी बातें हैं। कोई प्लाज्मा थैरेपी की बात कह रहा है तो कोई इम्युनिटी डेव्हलप करने की, कोई काढ़ा पीने की। दिल्ली जैसी जगह में कोरोना से रिकवरी की दर 90 प्रतिशत तक पहुंच गई है जबकि अभी इसकी दवा उपलब्ध नहीं है। एक तरफ जहां दिल्ली, मुंबई, बड़ौदा में हो रहे सेरोलॉजिकल सर्वे के आधार पर चौंकाने वाले परिणाम सामने आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अभी भी कुछ जगह में लोगों को लग रहा है कि कोरोना की चैन को लॉकडाउन के जरिये रोका जा सकता है। जबकि देश के प्रधानमंत्री द्वारा पूर्व में जोर-शोर से की गई तालाबंदी के बाद इस बारे में यह कहकर चुप्पी साध ली गई कि हमें कोरोना के साथ जीने की आदत डालनी होगी और राज्य सरकारों पर जिम्मेदारी डाल दी गई। राज्य सरकारों ने कलेक्टरों पर और कलेक्टर ने तहसीलदार पर जिम्मेदारी डाल दी। लोगों को ये समझ में नहीं आ रहा है कि जब पहले सख्ती से लागू किये गये लाकॅडाउन के बाद सकारात्मक परिणाम नहीं आये और दिन-प्रतिदिन कोरोना पॉजिटिव के प्रकरण बढ़ते गये तो अब ये प्रकरण कम कैसे हो जायेंगे? जब बहुत जगह से यह बात भी सामने आ रही है कि कोरोना का फैलाव समुदाय के स्तर पर होने लगा है। जनचर्चा तो यह भी है कि छोटे-मोटे लक्षण के आधार पर भी लोगों को भर्ती किया जा रहा है जो लोग होम क्वारेंटीन हो सकते हैं, उन्हें भी अस्पतालों में भर्ती किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में केवल कुछ ही शहरों में सख्ती से लॉकडाउन का पालन कराकर बाकी शहरों और ग्रामीण इलाकों को खुला छोड़ दिया गया है।

राजधानी रायपुर में रक्षाबंधन और बकरीद को देखते हुए केवल दो दिन कुछ घंटों के लिए किराना दुकानें खोलने के निर्णय से सोशल डिस्टेसिंग की जो धज्जियां उड़ी, फूड मार्ट, रिलायंस मार्ट के सामने उमड़ी भीड़ अपने साथ कितने कोरोना संक्रमण ले गई, ये किसी को नहीं पता। दो दिन बाद ये कोरोना के संवाहक घर में रहकर शदाणी दरबार, बीरगांव, कुकुरबेड़ा, भाठागांव की तरह पूरी बस्ती, समुदाय को संक्रमित करेंगे। हमारे देश में बहुत से राज्यों, शहरों में पूर्ण लॉकडाउन लागू होने के बावजूद कोरोना वायरस के मामले बढ़ रहे हैं, ऐसे में यह मानना शुरू कर दिया गया है कि लॉकडाउन लागू करना कोरोना संकट का समाधान नहीं है। लॉकडाउन कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए समाधान नहीं है और संसाधन जुटाना सरकार के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने और अन्य जगहों पर सप्ताह भर के बंद के विस्तार से इनकार किया है। लॉकडाउन किसी भी तरह से कोरोना वायरस का समाधान नहीं है। लॉकडाउन एक पॉज़ बटन की तरह है। जब हम लॉकडाउन से बाहर आते हैं, तो वायरस अपना काम फिर से शुरू कर देता है।

सरकार द्वारा कोरोना संक्रमण को रोकने के नाम पर की गई पूर्ण तालाबंदी के बाद भारत के 1.3 बिलियन नागरिकों में से कई बेरोजगार और भूखे रह गए हैं। हज़ारों प्रवासी मज़दूरों को अपने पैतृक गांवों में सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। वैश्विक वायरस महामारी के कारण देशभर से ओडिशा लौट चुके लगभग 71 प्रतिशत प्रवासियों को स्थिर रोजगार के अवसर मिलने पर अन्यत्र प्रवास करने की रुचि नहीं है। पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा गई है । राहत पैकेज बेमानी साबित हो रहे हैं।

नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल द्वारा किए गए एक सेरोलॉजिकल सर्वेक्षण में पाया गया है। दिल्ली के 11 जिलों में एकत्रित 21,387 नमूनों में से 23.48 प्रतिशत में कोरोना वायरस के प्रति एंटीबॉडी थी। इसका मतलब 2 करोड़ की आबादी वाले शहर के लिए होगा, कुल मामलों की संख्या लगभग 47 लाख होनी चाहिए। दिल्ली में वर्तमान में कुल 1,23,747 मामले हैं। छूटे मामलों का परिणाम सामुदायिक प्रसारण में भी होगा। दिल्ली के सभी 11 जिलों के लिए सेरोलॉजिकल सर्वे के लिए टीमें बनाई गईं। लिखित सूचित सहमति लेने के बाद  चयनित व्यक्तियों से रक्त के नमूने एकत्र किए गए और फिर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा अनुमोदित आईजीजी एंटीबॉडी और संक्रमण के लिए उनके सीरा का परीक्षण किया गया। आईजीजी एंटीबॉडी मानव शरीर में पाए जाने वाले सबसे आम एंटीबॉडी हैं। 21,387 नमूने एकत्र किए गए। पिछले महीने, आईसीएमआर ने कोविड-19 पर अपने देशव्यापी सेरोलॉजिकल सर्वेक्षण के पहले चरण के परिणाम जारी किए हैं। जिसमें 69 जिलों के 26,400 लोगों का डेटा एकत्र किया गया। 65 जिलों के आंकड़ों के विश्लेषण के बाद यह पाया गया कि 30 अप्रैल तक इन जिलों में 0.73 प्रतिशत लोग वायरस के संपर्क में थे। सीरो सर्वे के अनुसार, झुग्गी बस्तियों में 57 प्रतिशत और रिहायशी इलाकों में 16 प्रतिशत लोग कोरोना संक्रमण की चपेट में हैं।

मार्च के बाद से पूरे देश में कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए कई तौर पर बहुत से इंतजाम किये गये कहीं पर निजी अस्पतालों को अधिग्रहित किया गया। कहीं रेल के कोच को अस्पताल का वार्ड बनाया गया। कहीं स्टेडियम तो कहीं होटलों को महंगे किराये पर आरक्षित किया गया। दो-तीन माह की सख्ती और तालाबंदी के बाद आर्थिक हालातों और जनआक्रोश को देखते हुए ऑनलॉक वन-टू की प्रक्रिया शुरू की गई। अनलॉक के बाद जब कोरोना संक्रमण के प्रकरण बढऩे लगे तो एक बार फिर लॉकडाउन की ओर लौटने की प्रक्रिया कुछ राज्यों में शुरू हुई। इस बीच कोरोना के उपचार के नाम पर कीट के नाम पर भी बहुत सी मुनाफाखोर कंपनियां, अस्पताल सक्रिय हो गये।

कर्नाटक जैसे राज्य में निजी अस्पतालों द्वारा कोरोना संक्रमितों से 5 लाख रूपये तक वसूले जाने की शिकायत आई है। दिल्ली सरकार ने आज कोरोना संक्रमित लोगों को रखने के लिए आरक्षित किये गये होटल को रिक्त करने कहा है। रायपुर जैसी जगह में मरीजों की बढ़ती संख्या को देखकर स्टेडियम में कोरोना वार्ड बनाया गया है। बहुत सारे लोगों का कहना है कि जब कोरोना की कोई दवाई नहीं आई है और उन्हें सुबह शाम विटामिन सी और हाईड्राक्सी क्लोरोक्वाईन देना है, काढ़ा पिलाना है तो फिर अस्पतालों में दी जाने वाली कीट, रूम चार्ज, खाना और बाकी सुविधाओं के नाम पर जो कुछ अस्पतालों में हो रहा है उसका क्या।

कोरोना से कैसे निपटे यह पूरे देश को एक बार मिल बैठकर सोचना होगा। राज्य सरकारों को कोरोना के मुद्दे पर घेरना, विधानसभा में सदस्य सोशल डिस्टेसिंग का पालन करेंगे कि नहीं यह पूछने और राम मंदिर के शिलान्यास में सोशल डिस्टेसिंग के पालन की बात करने की बातों में समय जाया करने के बजाय एक ठोस और ईमानदार, वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न कोरोना आपदा नीति बनाने की जरूरत है। एक अगस्त से लागू अनलॉक-तीन के बाद पता नहीं क्या स्थिति बनेगी।