प्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल की तीन कविताएं

 प्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल की तीन कविताएं

राजिम का विष्णु-मंदिर


राजिम का वह आठवीं शताब्दी का

विष्णु-मन्दिर है

गर्भ-गृह में विष्णु को सबने दूर से प्रणाम किया


मन्दिर के मंडप में

दुर्गा की मूर्त्ति है

कठोर पत्थर की अत्यन्त सुन्दर

अंदर से कोमल हो सम्भवत: ।


सबने दुर्गा की प्रतिमा का

चरण-स्पर्श किया

कुछ ने माथा टेका

मैंने देखा

प्रतिमा के पैरों की उंगलियाँ

माथा टेकने और चरण-स्पर्श से

घिसकर चिकनी और सपाट हो चुकी हैं

इसमें मन ही मन का चरण-स्पर्श

और दूर का माथा टेकना भी शामिल है।


विष्णु की प्रतिमा को

समीप से नहीं देख पाया।

आकाश से उड़ता हुआ


आकाश से उड़ता हुआ

एक छोटा सा हरा तोता

( गोया आकाश से

एक हरा अंकुर ही फूटा है. )

एक पेड़ में जाकर बैठ गया.

पेड़ भी ख़ूब हरा भरा था.

फ़िर तोता मुझे दिखाई नहीं दिया

वह हरा भरा पेड़ ही दिखता रहा.


शहर से सोचता हूँ



शहर से सोचता हूँ

कि जंगल क्या मेरी सोच से भी कट रहा है

जंगल में जंगल नहीं होंगे

तो कहाँ होंगे ?

शहर की सड़कों के किनारे के पेड़ों में होंगे ।


रात को सड़क के पेड़ों के नीचे

सोते हुए आदिवासी परिवार के सपने में

एक सल्फी का पेड़

और बस्तर की मैना आती है

पर नींद में स्वप्न देखते

उनकी आँखें फूट गई हैं ।


परिवार का एक बूढ़ा है

और वह अभी भी देख सुन लेता है

पर स्वप्न देखते हुए आज

स्वप्न की एक सूखी टहनी से

उसकी आँख फूट गई ।