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विज्ञान: क्या कहानियां भी लिख सकते हैं रोबोट?

विज्ञान: क्या कहानियां भी लिख सकते हैं रोबोट?


फाबियान मे

कंप्यूटरों का इस्तेमाल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा. रोजमर्रा के जीवन में उनकी उपयोगिता देखते हुए प्रौद्योगिकी के जानकार उनकी कृत्रिम बुद्धिमता का इस्तेमाल साहित्य जैसी रचनात्मक गतिविधियों में करने को उत्सुक हैं.

रोबोट और मनुष्य के बीच बंटी 'कहानी'

लेखक डानियल केलमन ने एक रोबोट की मदद से कहानी लिखने का प्रयोग किया. उन्हें संभावनाओं का भी अनुभव हुआ और खतरों का भी. पिछले साल जर्मन-आस्ट्रियाई उपन्यासकार और नाट्यकार डानियल केलमन ने अपनी एक कहानी पर काम शुरू किया. शुरुआती लाइनें कुछ इस तरह थीं: "मै एक अपार्टमेंट की तलाश में था. लेकिन बात नहीं बन रही थी."

क्लाउड कम्प्यूटिंग की अथाह गहराइयों से उनके सह लेखक सीटीआरएल नामक एक राइटिंग ऐल्गरिदम ने कहानी आगे कुछ यूं बढ़ाई, "भाई तुम मजबूत जिगर वाले हो, तुम्हें किस बात का डर." जाहिर है कंप्यूटर का दिमाग स्टोरीलाइन को इसी तरह पढ़ रहा था.

केलमन ने कहानी को पटरी पर बनाए रखने के लिए लिखा, "यह सच है लेकिन बात अपार्टमेंट के बारे में चल रही है..." बस यह लिखना था कि कंप्यूटर जी 'भड़क' उठा और  लेखकीय गठजोड़ भी बैठ गया. 

रोबो-लेखक की खासियतें और कमियां

केलमन ने 'भविष्य के बारे में श्टुटगार्ट व्याख्यान' के अपने पहले संबोधन में मशीनी गद्य से जुड़े अपने अनुभवों के बारे में बताया. इस नई व्याख्यान ऋंखला के तहत विज्ञान, संस्कृति और राजनीति से जुड़ी शख्सियतें भविष्य के बारे में अपना नजरिया पेश करती हैं.

उनकी "मेरा ऐल्गरिदम और मैं" भाषण अब एक किताब के रूप में प्रकाशित है. उसमें केलमन ने फरवरी में सिलिकॉन वैली के अपने एक दौरे में एआई के जरिये हुए लेखकीय अनुभवों को याद किया है. वहां उनकी मुलाकात उस रोबो-लेखक यानी सीटीआरएल और उसके निर्माता ब्रायन मैककान से हुई थी.

केलमन कहानी लेखन के इस तजुर्बे को नाकाम नहीं मानते हैं क्योंकि इसके जरिये कई खूबसूरत बेतरतीब साहित्यिक टुकड़े निकल कर आए. लेकिन कहानी का प्लॉट या किरदार गढ़ने में एआई नाकाम रह जाता है. केलमन इसे मानव लिखित टेक्स्ट का एक भ्रमित 'सेकेंडरी यूजर' मानते हैं. अर्थपूर्ण और सारगर्भित अंदाज में केलमन अपना अनुभव बताते हैं कि समस्या को सुलझाने वाली यह चीज अहसास और भावना से इतनी दूर है कि सब कुछ बिल्कुल खाली खाली लगता है.

रोबोट का लिखा नाटक कितना असरदार

प्राग के स्वान्दा थिएटर में फरवरी में एआई नाटक के वर्चुअल प्रीमियर की लाइवस्ट्रीमिंग हुई. एक रोबोट एक नाटक लिखता है. कंप्यूटर और थिएटर के जानकारों के साथ काम करने वाले भाषाविदों के एक समूह ने इसे बनाया है. आर्टफिशल इंटेलिजेंस ने नाटक का 90 प्रतिशत हिस्सा लिखा था.

इस मामले में भी नाटक के प्लॉट में कुछ निहायत ही ऊटपटांग मोड़ डाले गए लेकिन एल्गोरिदम के पास अचेतन जैसी कोई चीज तो है नहीं तो केलमन के मुताबिक वो अपने गैर-अचेतन की गहराइयों से एक गूढ़ बयान निकाल कर पेश करता हैः "मेरे जरिये आप अभिनय के रहस्यों से वाकिफ होंगे. लेकिन मुझे नहीं पता कि आपको यह रहस्य बताने की मेरी कोई इच्छा है."

टेक्स्ट जेनरेट करने वाली एआई के साथ चल रहे कई लेखन प्रयोगो में से यह सिर्फ दो प्रयोग हैं.

भाषा और अहसास से दूर एआई की दुनिया

सीटीआरएल जब बना था तो लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडडिट के टेक्स्ट के साथ उसकी कुछ ट्रेनिंग हुई थी. रेडडिट के प्लेटफॉर्म पर कमोबेश हर मुद्दे पर बहस के फोरम बने है जिनमें से कुछ उग्र किस्म के भी हैं जो सीटीआरएल जैसे एल्गोरिदम को नफरती बातें पैदा करने की ताकत हासिल करा सकते हैं. आखिरकार मनुष्यों के लिए क्या उचित है क्या अनुचित, यह अंतर करने की एआई में स्वाभाविक कुव्वत नहीं है.

दूसरी बात यह है कि एआई के पास भाषाई बारीकियों की कोई समझ या अवधारणा नहीं है. उसे प्रशिक्षित करने वाले तमाम डाटा के बावजूद एआई को न हास्य समझ आता है, न मेटाफर. उसके लिए प्रासंगिक ज्ञान, अहसासों और समय के साथ निर्मित अनुभवों की जरूरत है.

तो यह कंप्यूटर जनित प्रोग्राम यानी एल्गोरिदम क्या कर सकते हैं? वे गणना बहुत अच्छी कर सकते हैं और सांख्यिकीय लिहाज से सामान्य टेक्स्ट तैयार कर सकते हैं. केलमन के मुताबिक मिसाल के लिए, टेक्स्ट में दर्ज 'आई' (मैं) शब्द के आगे बहुत संभावना है कि 'बिलीव' (मानना) शब्द आएगा जैसा लोग अपने फोन पर आगामी टेक्स्ट वाले फंक्शन में देखते हैं. लेकिन एक एल्गोरिदम 'पॉइजन' या 'लैंप' जैसे शब्दों को व्यवस्थित नहीं कर पाता है.

केलमन कहते हैं कि एआई में नैरेटिव कन्सिसटेंसी यानी आख्यान की निरतंरता का अभाव है. प्राग में नाटक खेलने वाली टीम का हिस्सा रहे चेक भाषाविद रुडोल्फ रोजा इसे अबाउटनेस का अभाव कहते हैं यानी वाक्य, संरचना और भाव से जुड़ाव की कमी.

अपने मौजूदा अवतार में एआई किस्सागोई की एक खासियत को समझने में भी नाकाम रहता हैः कहानी के प्लॉट में ट्विस्ट. कथा को विस्तार देने वाली यह केंद्रीय तकनीक संभाव्यता के आधार पर शब्दों और वाक्यों को महज गूंथने की प्रक्रिया भर नहीं हैं. और तभी जरूरत पड़ती है पाठ के 'अस्तित्वपरक' महत्त्व की या लेखक की 'आवाज' के एक अमूर्त ख्याल की.

केलमन कहते हैं, "आख्यान रचने का मतलब है आगे की योजना का निर्धारण. इसका अर्थ है तमाम वाक्यों, पैराग्राफों से गुजरने वाले एक अंदरूनी तालमेल की रचना. पारिभाषिक तौर पर देखें तो ठीक यही चीज है जो सीटीआरएल नहीं कर सकता है. वो ट्विस्ट को देखता तो है लेकिन वही जो सबसे सुलभ हो- प्लॉट का नहीं बल्कि भाषा का."

डिजिटल गीतकार और साहित्यिक विद्वान हानेस बायोर के मुताबिक मानव की अंतर्निहित योग्यताओं के पैमाने पर एआई का प्रदर्शन कैसा रहता है, यह जांचने के बजाय शायद हमें उस नए सौंदर्यबोध को खंगालना चाहिए जो यह पेश करता है.  

वे केलमन के एआई प्रयोग के आलोचक हैं. बायोर का कहना है, "मुझे लगता है कि केलमन एआई के साथ वास्तविक रूप से नहीं जुड़े. सौंदर्यबोध के लिहाज से तो बिल्कुल ही नहीं. उन्हें यह नहीं सूझा कि मशीन के साथ आपको अलग ढंग से साहित्य लिखना होता है, बल्कि एक अलग ही साहित्य लिखना होता है."

बायोर का कहना है कि सीटीआरएल का इस्तेमाल 'केलमन के रोबोट' की तरह किया गया, लेखक की तरह जिसका झुकाव भी साहित्यिक यथार्थवाद की ओर था.

बायोर प्रायोगिक और अतियथार्थवादी लेखन में एआई की सामर्थ्य को रेखांकित करते हैं. वो ऐलीसन पैरिश को कोट करते हुए यह कहते हैं. ऐलीसन पैरिश अमेरिका के न्यूयार्क के एक कवि और प्रोग्रामर हैं जिन्होंने एल्गोरिदम को मौजूद शब्दों के बीच से ही नए शब्दों को गढ़ने या खोजने में लगा दिया है. मिसाल के लिए 'नॉर्थ', 'ईस्ट' और 'वेस्ट' बन जाते हैं 'ईयुर्थ' या 'वोएर्थ'.

बायोर मानते है कि इस तरह की गैरपारंपरिक पद्धितां कलात्मक कार्यों के लिए ज्यादा उपयोगी हैं, "ठीक है, मेटाफर हो या मजाक इनमें वो उतने अच्छे नहीं होते हैं. लेकिन मैं नहीं जानता कि उसकी जरूरत भी है या नहीं. यह देखना ज्यादा दिलचस्प है कि उनका हुनर किसमें हैं और उससे किस किस्म का साहित्य निकल सकता है."