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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - शिक्षा पर कोरोना का कहर न परीक्षा, न प्रवेश, फीस अलग से

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - शिक्षा पर कोरोना का कहर न परीक्षा, न प्रवेश, फीस अलग से

इस समय देश में कोरोना का कहर बढ़ता ही जा रहा है जिसकी वजह से सबसे ज्यादा नुकसान स्कूल, कॉलेज में पढऩे वाले विद्यार्थियों, परफार्मिंग आर्ट से जुड़े लोगों का हो रहा है। जब ऐहतियात के साथ मॉल, होटल, रेस्टोरेंट और बाकी जगहें, बाजार सब खोल दिए गए हैं, वहीं स्कूल-कॉलेज कब खुलेंगे कोई नहीं जानता। शिक्षा पर कोरोना का कहर इस कदर हावी है कि ना परीक्षा हो पा रही है, ना ही नये शिक्षा सत्र में छात्रों का प्रवेश हो पा रहा है। बच्चों से स्कूल फीस जरूर ली जा रही है। शासन ने कुछ जगहों पर आदेश जारी कर फिलहाल स्कूल फीस नहीं लेने के लिए रोक लगाई है, किंतु स्कूल प्रशासन का कहना है कि हम शिक्षकों को, स्टॉफ के अन्य खर्चों को कहां से भरेंगे। सरकार स्कूलों और अभिभावकों के बीच किस तरह के सेतु या मददगार की भूमिका निभाए, इसका कहीं भी निर्वाह नहीं किया जा रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले नागेन्द्र दुबे ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि प्राइवेट स्कूल संचालक भी इसी समाज के हैं, इसी समाज से पालक भी हैं जो अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजते हंै। ऐसे पालक भी हंै जो किसी खास स्कूल में दाखिला दिलवाने के लिए बड़े-बड़े मंत्री और अफसरों से सिफारिश भी करवाते रहते हैं। जिस तरह से प्राइवेट स्कूल की फीस को लेकर पूरे प्रदेश में या कहें पूरे देश में एक भ्रम की स्थिति बनी हुई है, उसके लिए सरकार को आगे आकर स्पष्ट दिशा-निर्देश देने की आवश्यकता है। पूरे देश में विभिन्न प्रकार के व्यापार और व्यापार से जुड़े हुए लोगों के लिए सरकार आगे आ रही है, उस स्थिति में स्कूल संचालकों को भी सरकार की तरफ से स्पष्ट दिशा-निर्देश के साथ-साथ यह भी बताना चाहिए कि स्कूल से जुड़े हुए कर्मचारियों का वेतन और अन्य खर्चे स्कूल संचालक किस तरह से तय करें। कुछ राजनीतिक पकड़ रखने वाले पालक जिस तरह से राजनीति करते हैं पहली फुर्सत में उन्हें अपने बच्चों को किसी भी प्राइवेट स्कूल में ना पढ़ाने का संकल्प पत्र जरूर देना चाहिए। सरकार के पास यह एक अवसर भी है कि प्राइवेट स्कूलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश फीस को लेकर, कर्मचारियों को लेकर एवं अन्य प्रकार के जो भी स्कूलों की बुराइयां समाज में प्रचलित है, सभी के लिए कड़े नियम-कानून बना देने चाहिए।

कोई नहीं जानता कि देश कोरोना के खतरे से निकलकर कब सामान्य जि़ंदगी में आएगा, ऐसे में अब सरकार के सामने ये चुनौती है कि वो स्कूल के इन छात्रों को कैसे साथ लेकर चलेगी। भारत में स्कूल जाने वाले करीब 26 करोड़ छात्र हैं। ज़ाहिर है, ऑनलाइन क्लासेस के ज़रिए शहरों में स्कूलों के नए एकेडमिक सेशन शुरू हो गए हैं, जबकि आर्थिक रूप से कमज़ोर और ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले छात्र इस मामले में कहीं पीछे छूट गए हंै। कनेक्टिविटी के साथ ही लैपटॉप, टेबलेट जैसे उपकरणों के अभाव में वो ऑनलाइन पढ़ाई में कहीं पीछे छूट गए हैं।

छात्र अपने भविष्य को लेकर संशय में है कि क्या होगा? कोरोना से जब आधी दुनिया प्रभावित है तो शिक्षा का क्षेत्र कैसे अछूता रह जाता। इस कोरोना का खामियाजा न केवल स्कूल या कॉलेज की शिक्षा पर अपितु इसका असर प्रतियोगी परीक्षाओं पर भी पड़ रहा है। परीक्षाओं के लिए आवेदन मंगाए जा रहे हैं, लेकिन परीक्षा कब होगी इसका पता नहीं। छात्र असमंजस की स्थिति में है। शिक्षा विभाग के पास कोई बैकअप प्लान नहीं है।

विश्व बैंक की शिक्षा टीम के अनुसार, कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी से शिक्षा के नतीजे बेहद खराब आने का खतरा उत्पन्न हो गया है। उसने कहा है कि कोई आक्रामक नीति नहीं अपनाई गई, तो इसका बच्चों तथा युवाओं के शिक्षण और स्वास्थ्य पर बहुत जल्द बुरा प्रभाव होगा। विश्व बैंक के विशेषज्ञों ने कहा है कि महामारी से पहले भी दुनिया शिक्षा के संकट से गुजर रही थी और सतत विकास लक्ष्य 4 के लक्ष्यों को हासिल करने के रास्ते से पहले ही भटक गई थी। सतत विकास लक्ष्य 4 के तहत सभी देश अन्य महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के अलावा इसके लिए प्रतिबद्धता जताते हैं कि सभी बालिका एवं बालक मुफ्त, एक समान और गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पूरी करें। विश्व बैंक शिक्षा क्षेत्र में महामारी के प्रभाव को कम करने के लिए दिशा-निर्देशों के साथ-साथ नीतिगत सुझाव देने के लिए संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों के साथ काम कर रहा है। कोविड-19 पैनडेमिक : शॉक्स टू एजुकेशन एंड पॉलिसी रिस्पांसेस शीर्षक वाली एक रिपोर्ट में कहा गया है, महामारी से पहले, 25.8 करोड़ बच्चे तथा प्राथमिक और माध्यमिक-स्कूली आयु के युवा स्कूल से बाहर थे। निम्न स्कूली शिक्षा का मतलब है कि स्कूल में कई ऐसे थे जो बहुत कम सीखते थे। सबसे खराब बात यह है कि संकट का समान रूप से वितरण नहीं था। सबसे वंचित बच्चे और युवाओं की स्कूली शिक्षा तक पहुंच बहुत खराब थी, स्कूली शिक्षा छोडऩे की दर अधिक थी।

कोरोना महामारी का शिक्षा पर पहले से ही गहरा प्रभाव पड़ा है क्योंकि दुनिया में लगभग सभी जगह स्कूल बंद हैं, यह हमारे जीवनकाल में सभी शिक्षा प्रणालियों के लिए सबसे बड़ा झटका है। स्वास्थ्य आपात स्थिति के एक गहरे वैश्विक मंदी में तब्दील हो जाने पर यह क्षति और गंभीर हो जाएगी।

पूरे देश में लॉकडाउन होने की वजह से बहुत से माता-पिता बच्चों की पढ़ाई में कई तरह की परेशानी से जूझ रहे हैं लेकिन एक सर्वे के मुताबिक हर पांच में से दो माता-पिता के पास बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस के लिए जरुरी सेटअप या सामान ही नहीं है। लोकल सर्कल नाम की एक संस्था के हालिया सर्वे में 203 जि़लों के 23 हज़ार लोगों ने हिस्सा लिया था। जिनमें से 43 फीसदी लोगों ने कहा कि बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस के लिए उनके पास कम्प्यूटर, टेबलेट, प्रिंटर, राउटर जैसी चीज़ें नहीं है। वहीं आर्थिक रूप से कमज़ोर स्कूली बच्चों की परेशानी इससे बिल्कुल अलग है। लैपटॉप, टेबलेट जैसे उपकरणों के अभाव में वो ऑनलाइन पढ़ाई में कहीं पीछे छूटते दिख रहे हैं।

कोरोना महामारी के चलते देश में लॉकडाउन होने से पूर्व ही देश-प्रदेश में सबसे पहले शिक्षण संस्थान को बंद कर दिया गया। यह सुरक्षा के नजरिए से सरकार का एक सराहनीय कदम था, क्योंकि इन संस्थानों में अत्यधिक भीड़ या कहा जाए तो विद्यार्थियों की संख्या अधिक रहती है। इस कारण अगर कोई व्यक्ति संक्रमित होता तो उस पूरी संस्था के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता था। ऑनलाइन शिक्षा विकल्प को अपनाने के सिवाय इस समय कोई अन्य विकल्प शिक्षा विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। साथ में ही बात अगर कालेज विद्यार्थियों की शिक्षा की करें तो इनका भविष्य कोरोना के चलते अधर में अटक गया है। वर्तमान की परिस्थितियों को देखकर परीक्षाएं करवाना संभव नहीं लग रहा है तथा छात्रों की स्वास्थ्य रक्षा हेतु यह आवश्यक भी है।

सीबीएसई ने कहा है कि विशेष योजना के तहत 15 जुलाई तक 10वीं और 12वीं के रिज़ल्ट घोषित किए जाएंगे। यदि इसके तहत प्राप्त नंबर से कोई छात्र संतुष्ट नहीं होता है, तो बाद में उसे परीक्षा में बैठने का मौका दिया जाएगा। हालांकि इस परीक्षा की तारीख अभी निर्धारित नहीं की गई है।

कोरोना काल में सीबीएसई, एनसीईआरटी और सीजी बोर्ड के द्वारा जो पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है, वह परिस्थितियों के अनुसार होगा, जिसे सीबीएसई और सीजी बोर्ड के द्वारा स्वयं प्रमाणित, अधिसूचित किया जाएगा और उसी पाठ्यक्रम के अनुसार परीक्षाएं भी ली जाएगी। फिर सीबीएसई स्कूलों और सीजी बोर्ड के स्कूलों के द्वारा नर्सरी से लेकर कक्षा बारहवीं के बच्चों को जो कोर्स कराया जा रहा है, उसका कोई औचित्य नहीं है। इतना ही नहीं राज्य सरकार के द्वारा प्राईवेट स्कूलों में फीस निर्धारित करने के लिए कमेटी का गठन किया गया है। यह कमेटी इस शिक्षा सत्र में जो फीस निर्धारित करेगी, वही पालकों को देना अनिवार्य है। इसके बाद प्राईवेट स्कूलों के द्वारा जो फीस की मांग की जा रही है उसका कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। कुल मिलाकर शिक्षा के क्षेत्र में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। माता-पिता डरे हुए हैं कि अपने बच्चों को कोरोना संक्रमण से कैसे बचाये। स्कूल प्रबंधन स्कूल नहीं खुल पाने को लेकर जैसे-तैसे ऑनलाईन पढ़ाई करवाकर औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। माता-पिता बच्चों के नाम ना कटे इसलिए मजबूरी में स्कूल फीस के रूप में मांगी जा रही सभी तरह की फीस रो-रो कर भर रहे हैं। शिक्षण सामग्री के व्यवयाय से जुड़े लोग खून का घूंट पीकर अपनी पाठ्यपुस्तकों को रद्दी होते देख रहे हैं। सरकार केवल एडवाईजरी जारी कर रही है। न्यायालय भी इस मामले में ज्यादा कुछ मार्गदर्शन नहीं दे पा रही है। कोरोना है कि कम होने का नाम नहीं ले रहा है। लगता है ये सारा शिक्षा सत्र कोरोना की भेंट चढ़ जायेगा।