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नक्सली लगातार वार्ता की पहल का प्रस्ताव देने के मायने क्या हो सकते हैं

नक्सली लगातार वार्ता की पहल का प्रस्ताव देने के मायने क्या हो सकते हैं

 जगदलपुर। बीजापुर के तर्रेम थाना क्षेत्र इलाके में हुई नक्सली मुठभेड़ के बाद केंद्रीय गृह मंत्री एवं मुख्यमंत्री के बस्तर प्रवास में कहीं गई बातें बहुत कुछ स्पष्ट कर देती है कि नक्सलवाद के सफाये के लिए सरकार ने संकल्प ले लिया है, जिससे नक्सली संगठनों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। इसे लेकर नक्सलियों के रणनीतिकारों में भी हड़कंप मचा हुआ है, कभी भी इस पर बड़ी कार्यवाही होने सहज अनुमान नक्सली भी लगा रहे हैं। अब नक्सलियों को अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराता नजर आ रहा है। जिसका असर नक्सलियों के द्वारा जारी किए गए विज्ञप्ति से स्पष्ट हो रहा है। जिसमें नक्सली मुठभेड़ के बाद वार्ता की पहल करते नजर आ रहे हैं। पहली बार यह देखने को मिल रहा है कि नक्सली शहीद जवानों के प्रति संवेदना व्यक्त कर रहे हैं। नक्सलियों के बदले-बदले सुर से यह स्पष्ट हो रहा है कि नक्सली संगठन आर्थिक और संगठनात्मक रूप से कमजोर हो चुका है। इसका एहसास नक्सलियों को अच्छी तरह से है। इसके अलावा सरकार के तेवर से भी नक्सली समझ रहे हैं की कुछ बड़ा होने वाला है।
     नक्सली लगातार वार्ता की पहल के लिए राग अलाप रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार अपनी बात पर अडिग है। सरकार का नक्सलियों को स्पष्ट कहना है कि नक्सली जब तक हथियार नहीं छोड़ते हैं, तब तक कोई बात नहीं होगी इससे ऐसा नहीं लगता है कि नक्सलियों के द्वारा वार्ता के लिए लगातार किए जा रहे पहल से नक्सलियों के साथ सरकार की कोई वार्ता हो सकती है, यह कोरी कल्पना लगती है।
    विदित हो कि इससे पहले रमन सिंह की सरकार के दौरान भी नक्सलियों से वार्ता के लिए स्वामी अग्निवेश के माध्यम से पहल की गई थी। तब भी तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने नक्सलियों से हथियार छोडऩे के बाद ही कोई वार्ता होगी के सरकार की स्पष्ट नीति को सामने रखा था, जिसके बाद कोई वार्ता नहीं हुई। वर्तमान भूपेश बघेल की सरकार का भी यही कहना है कि जब तक नक्सली हथियार नहीं छोड़ेंगे तब तक कोई वार्ता नहीं होगी। नक्सली और सरकार के मध्य वार्ता तभी हो सकती है, जब सरकार या नक्सली दोनो में से किसी एक को झुकना पड़ेगा। तब तक शांति वार्ता की परिकल्पना करना बेमानी है।
     नक्सली भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बगैर हथियार छोड़े सरकार से वार्ता नहीं हो सकती बावजूद इसके नक्सलियों के द्वारा लगातार शांति वार्ता की बात करना और मौजूदा हालात में नक्सलियों के तेवर बदलने से ऐसा लग रहा है, कि नक्सलियों को आने वाले दिनों में बड़ी कार्यवाही का अनुमान लग गया है। नक्सलियों के सुर बदलने का प्रमाण इससे भी मिलता है कि जिस सामाजिक कार्यकर्ता शुभ्रांशु चौधरी के संगठन को नक्सली पहले आड़े हाथ लेकर सरकार का एजेंट तक बता दिया, लेकिन अब नक्सली के बदले सुर शुभ्रांशु चौधरी को भी वार्ता के लिए अनुकूल वातावरण बनाने का प्रस्ताव देने लगे हैं।
एक तरफ नक्सलियों के बदले-बदले सुर और वार्ता की बेचैनी देखी जा रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार की स्पष्ट नीति जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री का बस्तर दौरा और उनका यहां आकर स्पष्ट संदेश की नक्सल समस्या के समूल उन्मूलन तक लड़ाई जारी रहेगी और इसमें हम विजयी होंगे, यह कहा जाना नक्सली संगठनों में बेचैनी बढ़ा रहा है। नक्सली संगठन के हितैषी छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लेकर राजधानी दिल्ली तक बैठे हुए हैं। जिनसे भी नक्सलियों को कुछ बड़ी कार्यवाही होने का संकेत मिलता दिख रहा है। जिसके बाद नक्सली वार्ता के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, और वह भी जब मुठभेड़ के बाद नक्सली अपने आप को इतने ताकतवर बताने की जगह वार्ता का प्रस्ताव देना कुछ बड़ा होने का स्पष्ट संकेत है।
नक्सलियों के द्वारा बंधक बनाकर रखे गए कोबरा बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह छोडऩे की बात कर रहे नक्सलियों के द्वारा सरकार पर मध्यस्थ बनाए जाने की शर्त के साथ वार्ता के लिए दबाव बनाया जाना जी यही प्रदर्शित करता है, कि सरकार इस पर कोई बड़ी कार्यवाही कर सकती है जिसका एहसास नक्सलियों को उनके आंकाओं से मिल चुका है।
बस्तर आईजी सुंदरराज ने बताया कि जवान की रिहाई के लिए प्रयास किए जा रहे हैं और हम इसके लिए ऑपरेशन प्लान कर रहे हैं, जल्द ही जवान को नक्सलियों के कब्जे से रिहा करवा लिया जाएगा।