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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -तुम हवन बनकर पहले जलो तो सही

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -तुम हवन बनकर पहले जलो तो सही

-सुभाष मिश्र
सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का विरोध करने वाली कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कोरोना संकट के समय जरूरी खर्चों को देखते हुए नया रायपुर में 868 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले विधानसभा भवन, राजभवन, सीएम हाउस सहित बहुत से निर्माणों पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी जिन्हें भाजपा के आईटी सेल ने हल्के मजाक के पात्र रूप में प्रचारित कर रखा है, ने पश्चिम बंगाल चुनाव में रैलियां सभा करने की बजाय वर्जुअल सभा का निर्णय लिया था। ये दोनों ही निर्णयों ने देश के सामने एक मिसाल रखी। राहुल गांधी के इस कदम से सभी पार्टियों को अपने तौर तरीके बदलने पड़े।

मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है कि 'राम तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है। राम नाम से सत्ता में आने वाले को इन बातों से कोई लेना देना नहीं है। चाल-चरित्र-चेहरा अब पुरानी बात हो गई। सबके अपने-अपने ढोल अपने-अपने राग है, देश राग, झूठ राग के आगे नतमस्तक है। देश में खाने का रिवाज है परन्तु अपना खाना बताने का नहीं। कथनी और करनी से जुड़ी बातों को लेकर हमारे देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और भगत सिंह और उनके साथी से बड़ा उदाहरण कोई नहीं है जिन्हें जैसा कहा वैसा आचरण किया। गांधी जी के बारे में बहुत से किस्से कहानी प्रचलित है। जिसमें एक मां अपने बच्चे के मीठा खाने मना करने के लिए गांधी जी के पास ले गई। गांधी जी ने बच्चे को लेकर कुछ दिन बाद आने कहा। कुछ दिनों बाद मां गांधी जी के पास बच्चे को लेकर गई तो गांधी जी ने उसे ज्यादा मीठा नहीं खाने की समझाईश दी। गांधी जी की बात सुनकर बच्चे की मां ने कहा कि आप उस दिन भी तो ये बात कह सकते थे। गांधी जी ने कहा कि उस दिन तक मैं भी मीठा खाता था, तो बच्चे को कैसे मना करता। शुगर के बावजूद देश के नेता, ब्यूरोक्रेट भर-भर के मीठा खाएं और देश की जनता को करेला खाने की समझाईश दें, ऐस अच्छे दिन किसी को स्वीकार नहीं।

दरअसल हम जिस समाज जीवन में रहते हैं वह हिप्पोक्रेट है। उसकी कथनी करनी में जमीन-आसमान का फर्क है। छत्तीसगढ़ में आज जो भाजपा नई राजधानी में होने वाले निर्माणों का विरोध कर रही है, उसने पहले कांग्रेस शासन काल में भी नई राजधानी का विरोध किया था, पर जैसे ही सत्ता में आई बहुत सारे कारण बताकर पूरे 15 साल के कार्यकाल में अरबो रूपए के ऐसे-ऐसे निर्माण किये है जो मनुष्य भी उपस्थिति को तरस रहे हैं। छत्तीसगढ़ में शराब बंदी को लेकर जो नेता बयान दे रहे हैं, उन्होंने अपने कार्यकाल में शराब बंदी क्यों नहीं की? शराब की बिक्री को कोसने वाले सभी नेता जानते हैं कि शराब बिक्री से कितना राजस्व मिलता है। शराब, गुटका और बहुत सारी ऐसी चीजे जो समाज पर विपरीत प्रभाव डालती है, उससे कितने नेताओं, अफसरों, व्यापारियों के हित लाभ जुड़े हुए हैं? सरकार किसी भी पार्टी की हो, शराब लाबी, गुटखा लाबी सब जगह सक्रिय दिखाई देती है। आनलाईन शराब बिक्री पर शोर मचाने वाले नहीं जानते की कहां-कहां आफ लाईन कैसे-कैसे शराब मिल रही है। नशे के समूचे कारोबार पर कोई बात नहीं करना चाहता।

'देश में स्वतंत्रता आंदोलन और सत्ता का पर्याय रही कांग्रेस जिसे भाजपा पूरे देश से मुक्त करना चाहती है उस कांग्रेस के अपकर्ष के बारे में महात्मा गांधी ने कहा था कि च्च्जब कांग्रेस में विवेक और नौतिक प्रभाव का स्थान गुंडागर्दी ले लेगी तो उसकी स्वाभाविक मृत्यु हो जाएगी, जो ठीक भी होगा। कांग्रेस में फैली गंदगी को दूर करने के लिए केवल संकल्प की आवश्यकता है। लेकिन अगर कांग्रेस समितियों के अध्यक्ष उदासीन अथवा अकर्मण्य रहे तो भ्रष्टाचार से निपटना संभव नहीं होगा। जब नमक में से उसका जायका जाता रहेगा तो नमक में जायका कहां से आएगा।
सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी ने लिखा है कि - कांग्रेस गांधी के व्यक्तित्व से गांधी पर रंगीन फिल्म बन जाने की करूण कथा है। कांग्रेस एक हिमालय है। ऊंचे सिद्धांतों में वह जमता है, निजी स्वार्थों में पिघलता है।
एक कविता की चंद लाईने है -
फूंक डालूंगी मैं भावनाओं का नगर
मुझको प्यारी है साजन विरह की डगर
तुम हवन बनकर पहले जलो तो सही

जिस खांटी घरेलू महिला से हम सारे जीवन भर ममता, त्याग, बलिदान और कर्तव्य परायणता और मूल्यों की अपेक्षा करते हैं क्या पितृ सत्तात्मक समाज में हम स्वयं उस तरह के मूल्यों का निर्वाह कर पाते हैं। हमारे देश में महिलाओं की क्या स्थिति है यह किसी से छिपी नहीं है।
हमारे देश की तमाम राजनैतिक पार्टिंयॉं ,चुनाव में भाग लेने वालों से लेकर चुनाव कराने वाले सभी जानते हैं कि चुनाव आयोग द्वारा तय व्यय सीमा से कहीं बहुत ज्यादा पैसे चुनाव में खर्च होते हैं। चुनाव के लिए ये चंदा कैसे और कहां से आता है, उसके बावजूद वे सब राजनीति में सुचिता की बात करते हैं। जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी उड़ीसा के सूखा प्रभावित कालाहांडी में 1985 में दौरे के समय यह कहा कि सरकार जब एक रूपया खर्च करती है तो लोगों तब 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। दरअसल राजीव गांधी अपनी इस टिप्पणी के जरिये व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे। उनका मानना था कि भ्रष्टाचार ग्रास रूट लेवल पर है जिसे दिल्ली में बैठकर दूर नहीं किया जा सकता। राजीव गांधी के इस बात का सबसे ज्यादा मजाक मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी ने अनेक अवसर पर उड़ाया। ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा कहने वाले नरेंद्र मोदी देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कितना अंकुश लगा पाये हैं, वे खुद और पूरा देश जानता है। देश में पहले से ज्यादा भ्रष्टाचार फैला हुआ है जिस पर किसी एक पार्टी या नेता का एकाधिकार नहीं है। भ्रष्टाचार के हमाम में सब नंगे है, पर अपने भाषणों, वक्तव्यों में ये सभी राजनीति में सुचिता की बातें करते हैं।

भारतीय राजनीतिज्ञों की विश्वसनीयता पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। पार्टियों के घोषणापत्रों में किये गये वादो से लेकर चुनाव सभाओं में की गई घोषणाओं पर। मौजूदा प्रधानमंत्री अपने झूठेवादो, बड़बोलेपन, गलत-सलत बयान बाजी को लेकर सर्वाधिक चर्चा में रहते हैं। लोग उनसे हर नागरिक के बैंक खाते में 15-15 लाख रुपये जमा होने से लेकर विदेशों से आने वाले काला धन और अच्छे दिन आने वाले है के वादे के बारे में पूछते हैं। जवाब जय-जय सिया राम।