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II सत्य, भ्रम और अवसाद के बीच हम II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र विश्लेषण कर रहे हैं कि कारोना.काल में सरकार का अविश्वसनीय होना, लोकतंत्र के लिए ठीक नही'

II सत्य, भ्रम और अवसाद के बीच हम II  प्रधान संपादक सुभाष मिश्र विश्लेषण कर रहे हैं कि कारोना.काल में सरकार का अविश्वसनीय होना, लोकतंत्र के लिए ठीक नही'

सुभाष मिश्र

सरकार उसकी बनती है, जो लोकसभा, विधानसभा में बहुमत के आधार पर निर्वाचित होता है, विश्वास—मत हासिल करता है। कई बार यह विश्वास मत जनमत की भावना के विपरीत दल—बदल कराकर, खरीद—फरोख्त, साम-दाम-दंड-भेद से भी हासिल किया जाता है। हमारे यहां कहावत है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस। सरकार किसी की भी हो, उसका विश्वसनीय होना जरूरी है। ऐसा क्यों है कि तमाम उदारवादी निर्णयों, घोषणाओं और जनहित के हित में लिए गये फैसलों पर लोग सहज विश्वास नहीं करते। जिन दिनों सोशल मीडिया सक्रिय नहीं था और लोगों के पास रेडियो और अखबार ही संचार के माध्यम थे तब बहुत से लोग किसी बड़ी आपदा, दंगे आदि के समय सरकारी एजेंसी की खबरों की बजाय, बीबीसी की खबरों पर ज्यादा विश्वास करते थे। किसी घटना, दुर्घटना में सरकार की ओर से जारी आंकड़ों पर भरोसा नहीं करके, यहां—वहां से प्राप्त आंकड़ों, जानकारी पर उनका विश्वास ज्यादा होता था।

मौजूदा हालात में देश के प्रधानमंत्री ने 22 मार्च को रात 8 बजे टीवी से लाइव—टेलीकास्ट में पूरे देश में 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की। फिर रेडियो से मन की बात के जरिये इसे दोहराया परंतु देश के बहुत से नागरिकों को ऐसा क्यों लग रहा है कि ये 'लॉकडाउन लंबा चलेगा। ऐसा क्या हुआ कि समर्थ लोगों ने अपने-अपने घरों में 6-6 माह की रसद इकट्ठी कर ली। भारत सरकार के कैबिनेट सचिव को आज इस बात की बकायदा जानकारी देनी पड़ी कि यह लॉकडाउन बढ़ाने की कोई योजना नहीं है। कोरोना वायरस संकट के कारण लगाया गया 21 दिन का लाकडाउन 14 अप्रैल को खत्म हो जायेगा। जब लाकडाउन के कारण अधिकांश लोग अपने अपने घरों में बंद हैं तो फिर ये अफवाह कौन फैला रहा है।

सरकार को हेल्थ बुलेटिन जारी करके स्वास्थ्य विभाग की ओर से यह बताना था। उसे सफाई देने की बजाय कहना चाहिए कि यह विश्वव्यापी महामारी है। सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है, धैर्य बनाएं रखें। कोरोना की स्थिति को देखकर आगे निर्णय लिया जायेगा। आप आज कैसे कह सकते हैं कि 14 अप्रैल को पूरी तरह से लाकडाउन खत्म हो जायेगा। आपने तो दूसरे देशों की भयावह स्थिति बताकर लाकडाउन किया है। उन देशों में दो-तीन माह का लाकडाउन रहा है। फिर आप घबराकर अचानक अपने आपको दोषमुक्त बताकर, लोगों के पैनिक होने के डर से ऐसा क्यों कह रहे हैं कि ये 21 दिन में खत्म हो जायेगा। कहीं इसके पीछे लॉकडाउन के बावजूद मजदूरों की भयावह घर—वापसी तो नही?

वे कौन लोग या कारण हैं जिनकी वजह से सरकार के निर्णय पर लोगों को संदेह हो रहा है। सरकार और सरकारी मशीनरी द्वारा लॉगडाउन के बाद उपजी आपाधापी को रोकने जो निर्णय लिए, उनमें तीन माह का राशन, तीन माह का पास, तीन माह की पेंशन, तीन माह की राहत जैसे बहुत से कदम थे। साथ ही अन्य देशों के उदाहरण देकर हमारे देश में कोरोना संक्रमण से बचने के उपाय बनाए जा रहे हैं। लॉकडाउन के बावजूद वहां तो दो-तीन माह का लॉगडाउन रहा। लोगों को यह लगना स्वाभाविक था कि अब आनन फानन में 21 दिन का लॉगडाउन है, बाद में इसे बढ़ाया जा सकता है।

कोरोना को लेकर हम अपने देश के संदर्भ में उत्पन्न हालातों को देखें तो अभी हमारे यहां अमेरिका, स्पेन, इटली, ईरान और चीन जैसे हालात पैदा नहीं हुए हैं, किन्तु सुरक्षात्मक उपाय के तहत लिए जा रहे ऐहतियात और कार्यवाही को देखकर लोगों के मन में ये डर बैठ गया है कि यदि हम घर से बाहर निकले या किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आये तो हमारा और हमारे परिवार का बचना मुश्किल है।
तमाम तरह की विविधता वाले हमारे देश में अलग-अलग राजनीतिक दल और उससे जुड़े नेता, दिनभर एक—दूसरे को लेकर इस तरह की बयानबाजी अविश्वास की बातें कहते हैं जिन्हें सुनकर जनता के मन में संशय होना स्वाभाविक है। केंद्र और राज्यों को मिलने वाली राशि की बंदरबांट नेता, व्यापारी व अफसरों में जाती जनता देखती है।

सांसद, विधायक निधि से होने वाले कार्यों में कमीशनखोरी देखती है और उन सारी बातों को देखती है। जनता का विश्वास समूचे तंत्र से कम होता है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और तमाम नेताओं की समझाईश और जान जोखिम के खतरे के बाद लॉगडाउन तोड़कर लोगों का सड़क पर निकलना, पूरे सिस्टम के प्रति जनता की अविश्वसनीयता को ही दर्शाता है। कोरोना के प्रभाव के चलते अमेरिका सहित बहुत से देशों के नेताओं ने बेल-आउट पैकेजों की ताबड़तोड़ घोषणाएं की। हमारे देश में भी बहुत राहत की घोषणा हुई पर घोषणाओं के बावजूद आम आदमी इन पर बहुत ज्यादा विश्वास करने को तैयार नहीं है। ऐसा क्यों हुआ, मुझे लगता है कि इसकी एक बड़ी वजह उस आमआदमी का भोगा हुआ यथार्थ है। उसने पहले देखा है कि अकाल के समय, महामारी के समय और चुनाव के समय उसके नाम पर दी जाने वाली रियायतों, घोषणाओं का जमीनी स्तर पर, क्रियान्वयन के स्तर पर क्या हश्र होता है।

'दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम' कहावत के बावजूद जब यह सरकारी रियायती दाना गरीबों के घर पहुंचने के बजाय सही पते के अभाव में सेठों के गोदामों में पहुंच जाता है और बाद में जिसकी कालाबाजारी होती है तो गरीब कैसे विश्वास करे? जब मध्यान्ह भोजन का अनाज, दलिया, गरीबों के नाम पर मिलने वाली सब्सिडी संपन्न लोग हड़प जाते हैं, जब किसानों को खेती के नाम पर मिलने वाला उन्नत बीज घटिया निकलता है या उन्हें मिलता ही नहीं है, जब अस्पतालों से जरूरी दवाएं गायब हो जाती हैं तो ऐसे में लोग सरकार और सरकारी महकमे पर अचानक क्यों विश्वास करने लगे हैं। यह दरअसल विश्वसनीयता का संकट है।

सरकार को जनता का विश्वास हासिल करने के लिए इस संकट के समय जनता को यह अहसास देना होगा कि सरकार उनके साथ है। यह भरोसा सरकारी मशीनरी में व्याप्त भ्रष्टाचार और काहिली को दूर करने से होगा। काम कठिन है लेकिन संकट भी बड़ा है। सरकार के सामने चुनौती है तो जनता का भरोसा हासिल करने का अवसर भी है। ऐसा भी नहीं है कि समूचा सरकारी तंत्र ऐसा ही है। जब निजी क्षैत्र के अधिकांश लोग घर बैठ गये हैं तब आज भी ऐसी आपात स्थिति में सरकारी तंत्र ही अपनी जान जोखिम में डालकर, स्वास्थ्यगत सेवाओं से लेकर कानून व्यवस्था और सभी आवश्यक बुनियादी सेवाओं को जारी रखे हुए है। जगह-जगह अपने-अपने तरीके से लोगों की मदद भी कर रहा है। जरूरत है इस आपात और अकल्पनीय स्थिति में पूरे तंत्र को एक बार विचार करने की। जनता का विश्वास हासिल करने की ताकि वो अफवाहों पर ध्यान न दे।