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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सिद्ध करो कि तुम कौन हो ?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सिद्ध करो कि तुम कौन हो ?


संत कबीर लाख कहें कि

जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान,

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।


इस समय आपसे आपका ज्ञान, आपकी मेहनत, आपका हुनर कोई नहीं पूछेगा। इस समय आपको अपने आपको सच्चा भारतीय, देशभक्त सिद्घ करने की जरुरत है। यदि आप किसान हैं तो पहले खेत जोतते हुए अपनी फोटो और वीडियो लाईये। वरना आप खलिस्तानी, अर्बन नक्सलाईट कहलाने के लिए तैयार रहिए। अब हमारे देश में किसान को साबित करना है कि वह किसान है। नागरिक को ये साबित करना है कि वह नागरिक है। छात्र को ये साबित करना है कि वह छात्र है। प्रोफेसर को साबित करना है कि वह प्रोफेसर है। पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और अर्थशास्त्री सबको अपना वजूद साबित करना है क्योंकि सबके वजूद पर सवाल है जो भी इस समय के स्वर में स्वर नहीं मिलायेगा, वह संदेहास्पद करार दिया जायेगा।

कवि राजेश जोशी के शब्दों में कहें तो-

जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएंगे
कठघरे में खड़े कर दिये जाएंगे
जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएंगे।
बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो
उनकी कमीज से ज्यादा सफेद
कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएंगे।
धकेल दिये जाएंगे कला की दुनिया से बाहर
जो चारण नहीं होंगे
जो गुण नहीं गाएंगे, मारे जाएंगे।।
धर्म की ध्वजा उठाने जो नहीं जाएंगे जुलूस में
गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिये जाएंगे।
सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी होना
जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएंगे।।


जिस महिला साामाजिक कार्यकर्ता ने अपना जीवन आदिवासियों की सेवा में गुजार दिया, आज उसे ये साबित करना है कि वह नक्सल आतंकी नहीं है। यह नया भारत है जहां पर आपको साबित करना है कि आप और आपके बाप दादा यहीं पैदा हुए थे। आपकी नागरिकता इसी बात से तय होगी। यदि आप केन्द्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं अपना हक मांग रहे हैं तो पहले साबित कीजिए कि आप किसान हैं, जो लोग आपसे ऐसी मांग कर रहे हैं उन्हें आपसे प्रमाण चाहिए। उन्हें लगता है कि यदि वाकई किसान हैं तो फिर सड़क पर बैठकर आंदोलन क्यों कर रहे हैं? जाइए अपने-अपने खेतों में और राष्ट्रहित में उत्पादन बढ़ाने में योगदान दीजिए। कड़ाके की ठंड में सरकार की नजर में आंदोलन पर बैठे लोग असली किसान नहीं हैं। सरकार जिन्हें मान्यता देकर बात कर रही है दरअसल वही असली किसान है, किसान संगठन है। ये बात सिर्फ वाट्सअप विश्वविद्यालय साबित कर सकता है कि किसकी सच्चाई क्या है? वाट्सअप विश्वविद्यालय दुनिया का अकेला फोरेंसिक लैब है और यहां के छात्र दुनिया के अकेले विशेषज्ञ। वे ही तय करेंगे कि कौन असली कौन नकली। रोज सुबह ये नये-नये तर्क, बहस और आधी-अधूरी जानकारी, आंकड़ों
से आपको भ्रमाकर बताते हैं कि आपको क्या करना है, किसे अपना बाकी सबविरोधी पार्टी टुकड़े-टुकड़े गैंग और राष्ट्र विरोधी ताकतों से मिले हुए हैं। यदि गलती से आप मुसलमान हैं तो फिर आपको ज्यादा सतर्क होकर अपनी बात कहनी होगी। कहीं जुबान फिसली या आपने अपने मन की बात कहने का साहस किया तो आप सौ फीसदी पाकिस्तान समर्थक हो जायेंगे। आपको सोशल मीडिया के विसिल ओवर चैन से बैठने नही देंगे।
जय जवान जय किसान का नारा बुलंद करने वाले लोगों को अपने घरों में आने वाले दूध, सब्जी की चिंता ज्यादा है। बजाय कड़कड़ाती ठंड में ठिठुरते बैठे किसानों की। बहुत से लोगों को लगता है कि ये लोग जिनमें सरदार किसानों की संस्था अधिक है सरकार की बात समझ नहीं पा रहे हैं। विरोधियों के बहकावे में आकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

आज का समय भ्रम का, संदेह का समय है। प्रजातांत्रिक हथियारों को लेकर आज जिस तरह सेदुराग्रह का माहौल है, शायद पहले कभी रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर पहले की काफी बंदिशें लगी, आपातकाल लागू कर सेंसरशिप के जरिए आवाम की आवाज दबाने की कोशिशें हुई किंतु वे सब आज की तुलना में कम ही थी। पूंजी और मीडिया के जरिए ऐसा माहौल रचा जा रहा है जहां कुछ लोगों के लिए सब कुछ की आजादी है और बाकी लोग का बोला लिखा गैर संवैधानिक।

हमारे देश में आजादी के समय की सांप्रदायिक दंगे हुए उसके बाद की भिवंडी, मेरठ और बहुत सीजगहों पर दंगे हुए किंतु आकस्मिक कारणों से हुए थे। आज के दंगे प्रायोजित और पूर्व नियोजित है, जिसमें प्रभावशाली लोगों की सहभागिता दिखलाई पड़ती है। राजनीति का बदला परिदृश्य इस बात का गवाह है कि देश में बड़ी संख्या में जातिगत और संप्रदाय के अनुसार ध्रुवीकरण हुआ है।
आज हर स्तर पर प्रमाणीकरण की जरुरत पड़ रही है। आप क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं क्यासोचते हैं यह सबकी संदेह के दायरे में है। आज सत्ता प्रतिष्ठानों और उनसे जुड़े व्यक्तियों केखिलाफ बोलने वाला हर व्यक्ति राष्ट्रद्रोही है। अभिव्यक्ति की आजादी को अलग-अलग तरीकों से बाधित करने की कोशिशें जारी हैं।

जहां तक बात नये कृषि कानूनों को लेकर हो रहे किसान आंदोलन की है तो यहां लगता है सरकार ने किसानों की ताकत को कम आंका। पिछले कई आंदोलनों को फेल करने या गुमराह करने के दंभ से भरे नेताओं से किसानों की ताकत का अंदाजा लगाने में चूक हो गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस राजनीतिक विचारधारा से आते हैं वहां मध्यवर्गीय हिंदू वहां उनसे गहराई से जुड़ा हुआ है। तीनों कृषि कानूनों को जिस तरह विरोध हो रहा है, उससे भाजपा का मध्यवर्गीय वोट बैंक उसके फैसलों के साथ नहीं है। सरकार और उसके कृषि मंत्री लाख कहे कि यह कानून लोगों को निहित स्वार्थों के चंगुल से मुक्त करके उन्हें समृद्घि की राह पर ले जाएगा। लोग उनकी इस पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। किसानों के अब तक के सबसे बड़े आंदोलन ने यथास्थिति और निहित स्वार्थों के खात्मे को उनके वादों को गलत सबित किया है। इसके पहले नोटबंदी अनुच्छेद 370 को रद्द किया जाना या डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर व्यवस्था को लेकर जो वाहवाही बटोरी गई थी वह भी अब अच्छे दिन आयेंगे के नारों की तरह अपनी हकीकत में सामने आ रही है।

किसानों के मुद्दे पर आज भाजपा के सिवाय कोई भी बड़ी राजनीतिक पार्टी इन कृषि सुधारों कासमर्थन नहीं कर रही है। भाजपा के सहयोगी दल और आरएसएस का अपना किसान संगठन विरोध प्रदर्शनों का खुला समर्थन कर रहा है। हरियाणा में भाजपा की सहयोगी जननायक जनतापार्टी (जेजेपी) के विधायक उसे विरोध प्रर्दशनों में शामिल होने का निरंतर दबाव डाल रहे हैं।  पंजाब में अकाली दल ने पहले ही किनारा कर लिया है।
देश में बढ़ रही वैमनस्यता और हिंसात्मक गतिविधियां जिनमें भीड़ द्वारा लोगों की पीट-पीटकरहत्या कर दिए जाने की घटनाएं शामिल हैं, के लिए केन्द्र सरकार एक नया कानून बनाने के लिएबाध्य किया। पिछले एक साल में नौ राज्यों में करीब 40 लोगों की हत्या भीड़ द्वारा पीट-पीटकर किए जाने के बाद यह कदम उठाया गया है। गृह मंत्रालय ने भीड़ हत्या की घटनाओं पर लगामलगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को कानून बनानेको लेकर निर्देश जारी किया था।

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में बनी सीनियर नौकरशाहों की समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। कोर्ट ने कहा था कि वह हर जिले में पुलिस अधीक्षक स्तर के एक अधिकारी की नियुक्ति करें, खुफिया सूचना जुटाने के लिए एक विशेष कार्य बल बनाएं और सोशल मीडिया में चल रही चीजों पर पैनी नजर रखें ताकि बच्चा चोरी या मवेशी तस्करी के संदेह में भीड़ की ओर से किए जाने वाले हमले रोके जा सके।

एक स्वतंत्र रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से गो-हत्या के शक में भीड़ द्वारा हमले की 87 घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें 34 लोग की मौत हुई और 158 लोग गंभीर रूप से घायल हुए।

सरकार के स्तर पर जो लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर लोगों पर प्रकरण दर्ज कर रहे हैं उन्हे अभिव्यक्ति की आजादी और देशद्रोह में फर्क करना सीखना होगा। देशभक्ति और भीड़तंत्र में फर्क करना ज्यादाआवश्यक है! अभी के समय में इन दोनों को मिक्स कर दिया गया है।

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने लव जिहाद के खिलाफ अध्यादेश जारी कर दिया है।  बाकी सरकारें भी संविधान की मूल भावना के खिलाफ कानून लाने जा रहे हैं। हमारे देश में स्पेश्यल मेरिज एक्ट यह अनुमति देता है कि शादी करने वाले वर और वधु अपने-अपने धर्म कोबदले बिना भी शादी कर सकते हैं। इसीलिए जो भी वर या वधू अपना धर्म बदलेंगे, उन्हें बदलने सेकैसे रोका जा सकता है और जो नहीं बदलना चाहेंगे, उन्हें भी शादी करने से कैसे रोका जाएगा ? क्या यह कानून घर वापसी याने शुद्धि करने वालों पर भी लागू होगा ?  

धारा 124 ए औपनिवेशिक विरासत का एक अवशेष है जो एक लोकतंत्रिक व्यवस्था के लिएसर्वथा  अनुपयुक्त है। यह भाषण और अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है। इस समय बहुतसी जगहों पर राजद्रोह कानून का दुरुपयोग राजनीतिक असंतोष को सताने के लिए एक उपकरण के रूप में किया जा रहा है।  

2014 और 2016 के बीच वर्ष के लिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी किए गए आंकड़े आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए कानून की अयोग्यता को दर्शाते हैं। अपराधों के खिलाफ राज्य शीर्षक के तहत रिपोर्ट में देशद्रोह के लिए कुल 179 गिरफ्तारियां हैं। हालांकि, 70 प्रतिशत से अधिक मामलों में पुलिस द्वारा कोई चार्जशीट दायर नहीं की गई थी और इस समय अवधि केदौरान केवल दो ही दोषी थे। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना वाले इस देश में जहां सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया का जयघोष होता है वहां पर कदम-कदम पर संकीर्णता, संदेह अलगाव और भाईचारे को ठेस पहुंचाकर कुछ हासिल नहीं होगा। हम विराट से लघु ही साबित होंगे।