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आल इज़ वेल , टाइम विल टेल

आल इज़ वेल , टाइम विल टेल

ध्रुव शुक्ल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केवल आलोचना करना और काँग्रेस के अस्तित्व को नकारने की व्यर्थ बयानबाज़ियाँ बेकार साबित होंगी अगर हम विश्व व्यापार और टेक्नालाजी के गठबंधन पर गंभीरता से विचार नहीं करेंगे। 

हमारे देश के करीब ढाई-तीन हजार राजनीतिक दल  हिंदू,मुसलमान, दलित आदि वोट बैंक की बहस में उलझकर यह क्यों नहीं देख पा रहे होंगे कि भारत में विश्व बाज़ार के आगमन की तैयारी काँग्रेस के पन्द्रह बरस के कार्यकाल में मनमोहन सिंह ने की है। पहले पाँच साल वित्त मंत्री और दस साल प्रधान मंत्री के रूप में उनने भारत के जीवन का आँगन और संसाधन विश्व व्यापार के लिए खोले। 

पीएम नरेन्द्र मोदी इसी लिपे हुए आँगन में धन और टेक्नालाजी से लैस विश्व बाज़ार के देवताओं का खुला आवाहन कर रहे हैं। काँग्रेस की विश्व व्यापार संगठन से  भारत के लिए जो सहमति बनी थी वही आज की भारत सरकार आगे बढ़ा रही है। दूर दक्षिण में वामपंथी भी यही कर रहे हैं । बचे-खुचे राज्यों में शासन करती काँग्रेस भी यही कर रही है।

विश्व बाज़ार को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि राजनीतिक दलों के वोट बैंक का क्या होगा। यह तो राजनीतिक दल जाने। बाज़ार को अपनी समृद्धि की चिंता है। जो दल बाज़ार की चिंताएँ दूर करे वही उसकी मदद पाकर सत्ता पाये।

टेक्नालाजी और बाज़ार देश की राजनीति पर अपनी नीतियाँ आरोपित करके विश्व जीवन की प्रणालियों को बदलना चाहेंगे। भारत में गंगा-जमुनी संगम पर मीडिया में फिज़ूल की  हिंदू-मुसलमान बहस जारी है, जो सिर्फ वोट पालिटिक्स का हिस्सा है। राजनीतिक दलों को छिपे हुए वैश्विक मक़सद को पहचानने में भी देर नहीं लगनी चाहिए जिस पर काँग्रेस और भाजपा एकमत हैं। अब तो कोरोना काल में इस मक़सद की नयी संभावनाएँ भी तलाशी जा रही हैं।

लोकतंत्र में राजनीतिक विकल्प तो होने ही चाहिए। पर अगर काँग्रेस सँभलने में देर भी कर दे तो चिंता की कोई बात नहीं, भाजपा  का काँग्रेस में रूपांतरण हो गया है। 

काँग्रेस भारत की विश्व आर्थिक नीतियों का तेल से भरा वही दीया है जिसमें अब भाजपा की जीवन जोत जलने  का रास्ता दीर्घकाल तक खुल चुका है।