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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -विकास हुआ है तो धर्म के मसले क्यों छेड़ते हो... ?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -विकास हुआ है तो धर्म के मसले क्यों छेड़ते हो... ?

-सुभाष मिश्र
ये हमारा आज का सीधा सवाल है कि अगर आपने पांच साल तक जनता की सेवा की है, विकास की गंगा बहाई है तो फिर चुनाव मैदान में क्यों जाति, धर्म, मंदिर के नाम पर वोट मांगते हो। यूपी की चुनावी पिच पर ज्यादातर गेंदबाजी धर्म, मंदिर, हिंदू-मुस्लिम के नाम की हो रही है, एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या आज का पढ़ा-लिखा मतदाता भी इन बातों से प्रभावित होता है? एक तरफ तो कहा जा रहा है कि यूपी की योगी सरकार ने विकास के बहुत काम किए हैं, अपराध पर काबू पाया है। इसके अलावा उनके पक्ष में बहुत सी बातें की जा रही है लेकिन सभाओं में भाजपा किन मुद्दों को उछाल रही है वो देखने वाली बात है। अभी चुनाव के तारीखों का ऐलान होना बाकी है लेकिन भाषणों में जिन्ना, लादेन, पाकिस्तान, हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद के मुद्दों पर ज्यादा फोकस नजर आ रहा है ये तो मजबूरी है। कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रकोप की वजह से चुनावी सभाएं करनी पड़ रही है। वरना इन सभाओं के माध्यम से पता नहीं हमारे नेतागण क्या-क्या, अनाप-शनाप वैमनस्यता पैदा करने वाली बातें फैलाते। आजकल नेताओं के बयान, वैमनस्यता की बातें सोशल मीडिया के जरिए किसी एजेंडे के तहत सुबह से फैलाई जाती है। चुनाव आते ही एक दूसरे पर हमले तेज होने लगते हैं। एक दूसरे पर चरित्र हनन करना, तरह-तरह के मीम और अधूरे या तोड़-मरोड़कर इतिहास को पेश कर लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की जाती है।

उत्तर प्रदेश ही नहीं देश में अब ज्यादातर चुनाव ऐसे मुद्दों पर होते हैं जिनका विकास और सुशासन से लेना देना नहीं होता। एक तरफ भाजपा का दावा है कि यूपी में हमारे सामने कोई नहीं है लेकिन कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी की भरमार हो रही है। आखिर एक्सीडेंटल हिंदू जैसे बयानों की जरूरत क्यों पड़ रही है। हाल ही में अमेठी में सीएम योगी ने राहुल गांधी के लिए इस अपशब्द का इस्तेमाल किया। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि एक तरफ तो आप कांग्रेस को रेस में ही नहीं मानते, एक तरफ आप विकास और सुशासन का दावा करते हो तो फिर आप को कांग्रेस के नेता पर व्यक्तिगत बयान देने की क्या जरूरत पड़ जाती है। दरअसल, इस मजबूरी को अब समझना होगा कि आपका वोट किस दिशा में जा रहा है और किन मुद्दों पर मत दिए जा रहे हैं। इस बार राम मंदिर उतना बड़ा मुद्दा नहीं है तो मथुरा और काशी की बात कही जा रही है। इसी तरह सपा नेता अखिलेश यादव को पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को महान और गांधी-नेहरू के समकक्ष बताने की क्या मजबूरी थी। उनके ऐसा कहते ही विपक्ष उन पर पिल पड़ा। ओवैसी ने अखिलेश के इस बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि जिन्ना भारतीय मुसलमानों का नेता नहीं है, अखिलेश को इतिहास की जानकारी नहीं है।

देश की सबसे बड़ी आबादी उत्तरप्रदेश में निवास करती है, कह सकते हैं कि यूपी का विकास करने से देश का विकास होगा, लेकिन बेरोजगारी, अपराध, महंंगाई जैसे मामलों में ये प्रदेश अभी भी फिसड्डी ही है। जिस प्रदेश से देश के प्रधानमंत्री चुनकर आते हैं, उस प्रदेश का लगातार बीमारू राज्य की लिस्ट में शामिल रहना और इस पर सवाल नहीं पूछा जाना किस तरह की जागरुकता है या फिर सवाल पूछने वाले की आवाज दबा दी जा रही है।

19 मार्च 2017 को जब योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तब यूपी की बेरोजगारी दर सिर्फ 2.4 प्रतिशत थी, जो कि नवंबर 2021 में 4.8 प्रतिशत हो गई है, यानी दोगुनी है। अगर सिर्फ शिक्षक भर्ती की बात करें तो बिहार के बाद सबसे ज्यादा शिक्षकों के खाली पद यूपी में हैं। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, करीब 2 लाख 17 हजार पद खाली हैं, लेकिन इन्हें भरने के लिए वर्तमान सरकार ने एक भर्ती नहीं निकाली। कुछ भर्तियों के लिए विज्ञापन निकाले भी जाते हैं तो परीक्षा नहीं हो पाती, परीक्षा हो जाती है तो नतीजे नहीं आते। ग्राम विकास अधिकारी के पद पर भर्ती होने के बाद रद्द करना पड़ जाता है। ऐसे में युवाओं के बीच बेरोजगारी का मुद्दा क्यों नहीं बन पा रहा है। आखिर कैसा मैनेजमेंट है ये जो असल मुद्दों से जनता को भटका रहा है।

देश के विभाजन को इतना लंबा अरसा हो गया, हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं किन्तु देश के नेताओं की जुबान पर कभी जिन्ना-कभी गांधी और कभी हिन्दू-मुसलमान जाने का नाम ही नहीं लेता। हम देख रहे हैं कि जैसे-जैसे 5 राज्यों के चुनाव की तारीखें नजदीक आ रही हैं, वैसे-वैसे भड़काऊ बयानबाजी भी तेज हो गई है। कभी धर्म संसद में महात्मा गांधी और मुसलमानों से जुड़ी विवादित बातें कहीं जा रही हैं, तो कोई मुसलमानों को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह दे रहा है।
अभी हाल ही में रायपुर में आयोजित धर्म संसद में कालीचरण महाराज ने महात्मा गांधी की हत्या के लिए नाथूराम गोडसे को नमन किया। बंटवारे के लिए गांधी को अपशब्द कहे। इससे पहले हरिद्वार की धर्म संसद में दिए गए विवादित बयानों के वीडियो जमकर वायरल हुए। दुनियाभर में इन बयानों की निंदा हुई। बीजेपी युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद तेजस्वी सूर्या ने उडुपी के श्री कृष्ण मठ में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, हजारों सालों से कभी जबरन और कभी धोखे से, कभी डर दिखाकर तो कभी लालच देकर हिंदुओं को अपने धर्म से निकाला जाता रहा। इस विसंगति को दूर करने का एक ही उपाय है जो लोग सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक कारणों से अपने मातृधर्म को छोड़कर जा चुके हैं। उन्हें हिंदू धर्म में वापस लाया जाए।

अलीगढ़ के एआईएमआईएम पार्टी के जिलाध्यक्ष गुफरान नूर का एक वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में गुफरान कह रहे थे, हमें कम बच्चे करने को कहा जाता है। जब तक बच्चे न होंगे तब तक कैसे हम राज करेंगे? कैसे ओवैसी साहब प्रधानमंत्री बनेंगे? हमें डराया जा रहा है। ये शरियत के खिलाफ है। असदुद्दीन ओवैसी का एक वीडियो वायरल हुआ था। इसमें वो कानपुर में एक रैली के दौरान पुलिस को धमकाते हुए कह रहे थे, ध्यान रखो कि हमेशा योगी सीएम नहीं रहेंगे, मोदी पीएम नहीं रहेंगे। हम मुसलमान वक्त से मजबूर जरूर हैं लेकिन कोई इसको भूलेगा नहीं। जब योगी मठ में चले जाएंगे, मोदी पहाड़ों में रहने जाएंगे तब तुम्हें (पुलिस) कौन बचाएगा। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने हरदोई में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मोहम्मद अली जिन्ना की तुलना महात्मा गांधी और सरदार पटेल से कर दी।  

असदुद्दीन ओवैसी पर पलटवार करते हुए सी टी रवि ने कहा कि देश में जब तक हिंदू बहुसंख्यक रहने वाले हैं, तमाम छोटी जातियां सुरक्षित रहेंगी लेकिन जब आप अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया जैसे देशों की बात करते हैं, तब ये नहीं कहा जा सकता। इन देशों में जब कोई बहुसंख्यक बन जाता है, तब वो लोग सिर्फ शरियत की बात करते हैं।   

1962 से लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि शिक्षा में असमानता, आमदनी या रोजगार जैसे मुद्दों का चुनाव के दौरान मामूली असर रहता है। एक रिसर्च के मुताबिक मतदाता अपना वोट किसे देंगे, यह तय करने में मूलभूत समस्याओं की कोई खास भूमिका नहीं होती है।  
हमारे देश के संविधान में भड़काऊ बयानबाजी को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। आईपीसी की धारा 153ए के तहत माहौल बिगाडऩा या दो समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना अपराध है। इसके तहत बोलकर, लिखकर या इशारों से धार्मिक, भाषायी या जातियों और समुदायों के बीच सौहार्द्र बिगाडऩा या शत्रुता, घृणा या वैमनस्य की भावना पैदा करना अपराध है, ऐसे मामलों में 3 साल कैद की सजा का प्रावधान है।

भारत के संविधान में यह प्रावधान है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी या दल, धर्म या जाति विशेष का नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में यदि कोई राजनीतिक दल या पार्टी किसी विशेष धर्म या जाति को लुभाने की कोशिश करती है, तो चुनाव आयोग को उस राजनीतिक दल की मान्यता समाप्त कर देनी चाहिए। हम देखते हंै कि चुनाव आयोग जैसी संस्था बहुत से मामले में मूकदर्शक बनी बहुत सारा तमाशा देखती है या सत्ता पक्ष की ओर से होने वाले इशारों की प्रतीक्षा करती है। देश में कोरोना की तीसरी लहर आ चुकी है किन्तु चुनाव आयोग यह कहकर पल्ला झाड़ रहा है कि अभी चुनाव आचार संहिता लागू नहीं हुई है। इसलिए यह काम राज्य सरकार को करना चाहिए।
प्रसंगवश अदम गोंडवी के दो चुनिंदा शेर
हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडि़ए
अपनी कुरसी के लिए जज़्बात को मत छेडि़ए।
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ्ऩ है जो बात, अब उस बात को मत छेडि़ए
छेडि़ए इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ़
दोस्त मेरे मजहबी नग़मात को मत छेडि़ए।।