(हिन्दी दिवस पर विशेष) प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-यह हिन्दी का स्यापा करने का समय नहीं है

(हिन्दी दिवस पर विशेष) प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-यह हिन्दी का स्यापा करने का समय नहीं है


हिन्दी संपर्क भाषा है और उसे सभी जगह अंग्रेजी के बदले संपर्क भाषा होना चाहिए। हमारे देश में बहुसंख्यक आबादी या तो हिन्दी बोलती है या समझती है। बाजार ने हिन्दी के उपभोक्ता की ताकत को समझकर अपने सारे उत्पाद, तकनीक में हिन्दी को शामिल किया है। हिन्दी की ताकत हिंदी के वैश्विक बाजार में दिखाई देती है। बड़े से बड़े अंग्रेजी के मीडिया हाउस ने अपनी बात ज्यादातर लोगों तक पहुंचाने के लिए न केवल हिन्दी का सहारा लिया है बल्कि अब वे क्षेत्रीय भाषाओं में भी अपने एप, विज्ञापन, मुद्रण कर रहे हैं। यह सही है कि बहुत सारा आधुनिक ज्ञान अंग्रेजी के माध्यम से हम तक आता है। हम चाहकर भी इस पर प्रतिबंध या रोक नहीं लगा सकते। संविधान में अंग्रेजी को एक भारतीय भाषा के रुप में मान्यता है। हम जो भाषा बोलते हैं, वह मिश्रित होती है, जिसमें हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का समावेश होता है। हमारे युवाओं की बोलचाल में अब हिन्दी और अंग्रेजी के स्थान पर हिंगलिश का प्रयोग ज्यादा होने लगा है।

कभी रघुवीर सहाय ने हिंदी को राज्य और समाज से उपेक्षित होने के कारण या अंग्रेज़ी की तुलना में दोयम दर्जे की हैसियत के कारण दुहाजू की बीवी कहा था। यह आंकलन गलत भी नहीं था तब आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के नाम भी किसी ने नहीं सुना था। न ही आज की तरह बाज़ार का विस्तार विभिन्न राष्ट्रों की सीमाओं का अतिक्रमण कर विश्वव्यापी स्वरूप ग्रहण कर पाया था लेकिन आज वैश्विक बाजार निर्मित हो जाने के बाद हिंदी की स्थिति वही नहीं रही है। हिंदी भाषी क्षेत्र के विशाल जनसंख्या में निर्मित विशाल बाजार उसे एक नई तरह की भाषा के रूप में ढाल रहा है। बाजार ने उसे नई शक्ति दी है। चाहे वस्तुओं के क्रय-विक्रय के लिए विज्ञापन के रूप में हो या सूचनाओं के प्रसार के लिये दिन-रात अथक बजबजाते और अनर्गल बड़बड़ाते समाचार चैनलों के रूप में, हिंदी की ज़रूरत और मांग बढ़ी है। बड़ी-बड़ी कंपनियां हिंदी की ताकत के आगे नतमस्तक हैं व उनके कमाने-खाने का नया क्षेत्र है। हिंदी को लेकर आज होने वाली चर्चाओं में इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन क्या आज हिंदी को लेकर हम सचमुच गर्व करने की स्थिति में हैं? क्या स्वयं हिंदी भाषी जनता के भीतर अपनी भाषा के प्रति यह गर्व बोध विद्यमान है?

यह ठीक है कि हिंदी बाजार की भाषा है लेकिन वह भारत की राष्ट्रभाषा अब भी नहीं बन सकी है। कम से कम भारतीय संविधान उसे यह दर्जा आज तक नहीं दे पाया है। आज भी वह उच्च शिक्षा, न्याय और कानून, प्रशासन, ज्ञान-विज्ञान आदि की वर्चस्वशाली भाषा नहीं बन सकी है। इसके पीछे साफ़ तौर पर हमारे शासक वर्ग की कुटिल चालों और उसकी बदनीयत से इनकार नहीं किया जा सकता। मौजूदा राजनीतिक निज़ाम हिंदी का हिमायती नजऱ आता है लेकिन उसने भी उन तमाम क्षेत्रों में जहां अंग्रेज़ी का एकाधिकार बना हुआ है, उचित स्थान दिलाने के लिये कोई ठोस प्रयत्न अब तक नहीं किया है। उच्च शिक्षा के माध्यम और उच्च अदालतों की भाषा के रूप में हिंदी को स्थापित करने की दिशा में जब तक ठोस कदम न उठाया जाए, हिंदी वहीं की वहीं रहेगी। केंद्र शासन की नई शिक्षा नीति में भी इस दिशा में कारगर उपाय नहीं सुझाया जा सका है। हिंदी की इतनी तरक़्क़ी हुई है कि बाज़ार उसे नजऱअंदाज नहीं कर पाया है। लेकिन बाजार भी उसे महज़ विज्ञापन की भाषा बनाकर छोड़ देता है। अपना माल बेचने के लिये कारपोरेट जगत उसका इस्तेमाल करता है। हिंदी का लक्ष्य बाजार की भाषा बन जाना नहीं हो सकता। मूलत: वह जनता की आशा, आकांक्षाओं और उसके संघर्ष की भाषा है, उसके पीछे स्वाधीनता संग्राम का गौरवशाली इतिहास है जिसे भूलकर आज उसका कारपोरेटीकरण किया जा रहा है। यह हिंदी की नियति बन चुकी है और इसे लेकर हिंदी दिवस पर मीडिया-विलाप के अलावा कुछ नहीं होने वाला है। यह एक तरह का वार्षिक कर्मकांड बन चुका है।

दुर्भाग्य से हिंदी को लेकर स्वयं हिंदी भाषी जनता के बीच एक अजीब सी आत्महीनता की मानसिक ग्रन्थि है। यहां अंग्रेज़ी को विद्वता और उत्कृष्टता का पर्याय स्वत: मान लिया गया है। यह बौद्घिक-सांस्कृतिक गुलामी में मुतमईन है। इस मानसिकता की हिंदी भाषी जनता के आसान शिकार के लिये ही कॉरपोरेट हिंदी का उपयोग करता है। दिलचस्प है कि कामयाबी की मन्जि़लों तक पहुंचने के लिये यही जनता अंग्रेज़ी की सीढ़ी की तरफ देखती है। इस अंतर्विरोध को खत्म करने का कोई उपाय फिलहाल कहीं नजऱ नहीं आता। आज हिंदी का सर्वोपरि कार्यभार उसे विचार और सभ्यता चिंतन की भाषा बनाना है। हिंदी के बौद्धिकों ने इस दिशा में आरम्भिक प्रयास ज़रूर किये हैं लेकिन उनके कार्यों को यथोचित सम्मान देने में भी कोताही हुई है। फिलहाल, गर्व का तो नहीं लेकिन सन्तोष का विषय हो सकता है कि हिंदी की ताकत हिंदी के वैश्विक बाजार में दिखाई दी है। हिंदी फिल्मों, उसके इलेक्ट्रॉनिक सूचना तन्त्र और विज्ञापन संसार पर अगर कुछ गर्व करने लायक हो तो किया जाए अन्यथा गुलामी इतनी गहराइयों में दाखिल हो चुकी है कि हिंदी में जनता अब सांस भी नहीं लेना चाहती।

देश में तमाम अंग्रेजी स्कूलों के खुलने और हिन्दी की खाने वाले और अंग्रेजी में गाने वाले हमारे फिल्मी सितारों और क्रिकेट खिलाडिय़ों के प्रभामंडल के बावजूद आज समूचे बाजार में हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं की अपनी पूछपरख है। हमारा क्षेत्रीय सिनेमा अब करोड़ों रुपये का व्यापार कर रहा है। आज जब कोरोना संक्रमण के कारण सिनेमा हाल बंद, पीवीआर बंद है, ऐसे में घर में बैठे लोग अपने टीवी पर, मोबाइल पर जो विदेशी वेबसीरिज फिल्म देख रहे हैं, उनके सब टाइटिल अनुवाद हिन्दी में उपलब्ध है। अंग्रेजी और अन्य भाषा की फिल्में हिन्दी में अनुवादित होकर बेहतर व्यवसाय कर रही हैं।

देश की कुछ महत्वपूर्ण हिन्दी की पत्रिकाएं जरुर बंद हुई हैं, किंतु उससे कहीं अधिक समाचार-पत्र, लघु पत्रिकाएं, वेबपोर्टल हिन्दी में आ गए हैं। जब हम हिन्दी की बात करते हुए इसके राष्ट्रभाषा होने पर गर्व करते हैं तो हमें हिन्दी भाषा के अलावा अपनी अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी रुचि दिखानी चाहिए। हमारे देश में साहित्य में सर्वश्रेष्ठ समझे जाने वाला ज्ञानपीठ पुरस्कार भी ज्यादातर हिन्दी से बाहर के लेखकों को मिला है। हमारी अन्य भाषाओं में भी बेहतर साहित्य, सिनेमा रचा जा रहा है।

कुछ लोगों को इस बात पर बेहद नाराजगी होती है कि जब हिन्दी के कलाकार अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए आते हैं तो अपना इंटरव्यू अंग्रेजी में देते हैं, ये वो लोग एक क्लास दिखने के लिए ऐसा करते हैं। बहुत बार लोगों को लगता है कि अंग्रेजी में बात करके लो एलिड क्लास में शामिल हो जाते हैं। नई पीढ़ी के जो हीरो, हिरोइन, कलाकार, क्रिकेटियर जिस वर्ग से आते हैं, वहां ज्यादातर घरों में हिन्दी का प्रचलन नहीं है या फिर वे ग्लैमर और चकाचौंध के चक्कर में अपने आपको अंग्रेजीदा बताने लगते हैं। वैसे अब धीरे-धीरे लोगों को ये बात समझ में आने लगी है कि केवल भाषा के जरिये रोजगार हासिल नहीं किया जा सकता। जब तक आपके पास आम भाषा के साथ-साथ हुनर नहीं होगा, आप बहुत काम के नहीं हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि अंब अंग्रेजी बोलने समझने वालों  की भी बाजार में अच्छी खासी भीड़ हो चली है। हिन्दी मीडिया में एंकर और अन्य लोगों द्वारा बोली जाने वाली या समाचार पत्रों में लिखी जाने वाली भाषा को लेकर भी कुछ लोगों को अच्छी खासी नाराजगी होती है। ऐसे लोगों को लगता है कि मीडिया भाषा को भ्रष्ट कर रहा है। दरअसल, हिन्दी मीडिया को भी अपनी व्यवसायिक कार्यकुशलता, विश्वसनीयता लानी होगी। अपने लिए सूचना के देसी स्त्रोत विकसित करने होंगे। केवल अंग्रेजी से अनुवाद के भरोसे काम नहीं चलेगा।

हमें यह समझना होगा कि भाषा मात्र अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं संस्कृति की परिवाहक भी है संस्कृति जो कि कला-साहित्य आचार-विचार से पोषित होती है। हिन्दी दिवस पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो वेब सीरीज अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन कर उभर रहा है। इसकी पकड़ गहरी होती जा रही है और घर के हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित कर रहा है। कहा जाता है कि किसी राष्ट्र को समाप्त करना है तो उसकी संस्कृति और भाषा को समाप्त कर दो, राष्ट्र स्वत: ही नष्ट हो जाएगा। राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। राष्ट्र के गौरव का यह तकाजा है कि उसकी अपनी एक राष्ट्र भाषा हो। कोई भी देश अपनी राष्ट्रीय भावनाओं को अपनी भाषा में ही अच्छी तरह व्यक्त कर सकता है। भारत में अनेक उन्नत और समृद्ध भाषाएं हैं किंतु हिंदी सबसे अधिक व्यापक क्षेत्र में और सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है।

भारतीय संसद ने देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया। संसार में चीनी तथा अंग्रेजी के बाद हिंदी सबसे विशाल जनसमूह की भाषा है। हमें यह भी समझना होगा कि प्रादेशिक भाषाएँ तथा राष्ट्रभाषा हिंदी दोनों एक-दूसरे की पूरक तथा सहोदरा हैं। एक-दूसरे के सहयोग से वे अधिक समृद्ध होंगी। हमारे देश के नेताओं, विद्वानों ने हिन्दी की महत्ता को लेकर अलग विचार किए हैं। डॉ. फादर कामिल बुल्के ने कहा है कि संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा कि निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है कि है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी। माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा है कि हिन्दी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। महात्मा गांधी ने कहा है कि हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।