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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -संक्रमण पहुँच गया है, टीका पहुँच जाये

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -संक्रमण पहुँच गया है, टीका पहुँच जाये

- सुभाष मिश्र
राष्ट्रीय पंचायतीराज दिवस पर जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ये कह रहे थे की कोरोना संक्रमण को गांवों तक किसी भी हालत में नहीं पहुंचने देना है, तब शायद वे देश के मौजूदा हालातों से उसी तरह नावाकिफ़़ थे जैसे आक्सीजन की कमी, अस्पतालों की कमी और वैक्सीन की कमी को लेकर। वरना उनका समूचा तंत्र जानता है की कोरोना अब गाँव-गाँव तक पहुँच चुका है। कोरोना ने हिमालय पर्वत पर चढऩे वाले हमारे पर्वतारोहियों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। अब तो वैराग्य के लिए हिमालय भी सुरक्षित नहीं रहा। उपचार के लिए गाँव शहरों की ओर देख रहे हैं, शहर महानगरों की ओर और महानगर असहाय से अपने आंकाओं की ओर। यह असहाय समय है जिसमें सहायता के लिए सब यहाँ वहाँ भटक रहे हैं। अस्पतालों में बेड, आक्सीजन, वेंटिलेटर किसी मृग मरीचिका की तरह हो गये हैं। इन्हे पाने की लालसा में बीमार व्यक्ति के परिवारजन यहाँ से वहाँ भटक रहे हैं।

कितना है बदनसीब जफ़ऱ दफ्ऩ के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू ए यार में।।

हिन्दुस्तान के अंतिम मुग़ल बादशाह जब रंगून में बैठकर ये शेर लिख रहे होंगे तब उन्हें नहीं पता रहा होगा की उनकी बेदिल दिल्ली के अस्पतालों में मरने के लिए एक बेड भी नसीब नहीं होगा।
फिलहाल गाँव से शहरों में इलाज कराने वे ही लोग आ पा रहे हैं जो अक्सर ट्रेन, बस या कभी-कभी प्लेन से यात्रा के लिए शहर आते हैं। ये तो गऩीमत है की हमारे देश की बहुत बड़ी आबादीया तो यात्रा भीरू है या उसके पास इतने संसाधन नहीं है की वह यात्रा कर सके। अभी भी गांव की बड़ी आबादी ने बहुत से शहरों को नहीं देखा है। उनका जीवन एक छोटे से दायरे में सिमटकर रह जाता है। उनके खेत-खलिहान और उनकी घर ज़्यादा से ज़्यादा चौक-चौपाल या धार्मिक और मांगलिक कारणों से उनकी थोड़ी बहुत यात्राएँ होती हैं। जब कभी किसी ख़ास त्यौहार विशेष पर ये अपने घर पहुँचने की यात्रा पर निकलते हैं तो ट्रेनों, बसों में पैर रखने को जगह नहीं मिलती। कई बार ये लगता है की यदि हमारी अधिकांश आबादी पर्यटन करने लगे, यात्रा पर निकल जाये, अस्पतालों में आकर जाँच कराने लगे, मॉल, सिनेमा-हॉल में पहुँच जाये तो हमारे मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर का क्या हाल होगा। कोरोना संक्रमण से उपजी थोड़ी सी महामारी इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। अभी जितने लोग अस्पताल में नहीं उससे ज़्यादा होम आईसोलेशन में है, और इससे भी कहीं ज़्यादा बड़ी संख्या उनकी हैं जिन्होंने अपनी जाँच ही नहीं कराई है। हमारे देश में आजादी के बाद बहुत से ताकतवर, पैसे और पहुंच वाले लोगो ने अच्छे  स्वास्थ्य, शिक्षा और बहुत से संसाघनो पर अपना कब्जा जमा रखा था। उन्होने उसे ही पर्याप्त मानकर सबके लिए समान शिक्षा, समान  स्वास्थ्य और अधोसंरचना के बारे में कभी नहीं सोचा।

दुष्यंत कुमार का एक शेर है -
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है
चलें यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।


प्रधानमंत्री मोदी ने गांवों तक कोरोना को रोकने और टीकाकरण अभियान में तेजी लाने के लिए लोगों से अपील की। उनकी इस अपील पर यदि हम गौर करें तो हमें सबसे पहले टीकों की उपलब्धता के बारे में बात करनी होगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायत प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए कहा है कि एक साल पहले जब हम पंचायती राज दिवस के लिए मिले थे, तब पूरा देश कोरोना से मुकाबला कर रहा था। तब मैंने आप सभी से आग्रह किया था कि आप कोरोना को गांव में पहुंचने से रोकने में अपनी भूमिका निभाएं। आप सभी ने बड़ी कुशलता से, ना सिर्फ कोरोना को गांवों में पहुंचने से रोका बल्कि गांव में जागरुकता पहुंचाने में भी बहुत अहम भूमिका निभाई। इस साल भी हमारे सामने चुनौती गांवों तक इस संक्रमण को पहुंचने से रोकने की है। हम सबको मिलकर कोरोना को गांव तक पहुंचने से रोकना ही होगा। पिछली बार सिर्फ बचाव कर रहे थे, इस बार हमारे पास वैक्सीन का सुरक्षा कवच भी है। इसलिए हमें सारी सावधानियों का पालन भी करना है और ये भी सुनिश्चित करना है कि गांव के हर एक व्यक्ति को वैक्सीन की दोनों डोज लगे। यहाँ सवाल यह है की दोनो डोज कब और कितने दिन में लगेगी।

भारत की मौजूदा आबादी 139 करोड़ है जिनमें से सक्रिय आबादी को यदि 100 करोड़ मान लिया जाए तो हमें देश की पूरी आबादी को वैक्सीन की दोनो खुराक लगाने के लिए कम से कम 200 करोड़ वैक्सीन लगेगी। अभी तक हमारे देश में 13.83 करोड़ लोगो को वैक्सीन लगे हैं जिसमें से 7.49 करोड़ लोगो को पहला डोज और 6.34 करोड़ लोगो को दूसरा डोज लगा है। एक मई से 18 साल से उपर वालों को सरकारी और प्रायवेट अस्पतालों में वैक्सीन का टीका लगाया जायेगा। अभी तक जितने लोगो को वैक्सीन लगा है वह हमारे देश की जनसंख्या का संख्या 8.5 प्रतिशत है।

अभी हमारे देश में दो देशी कंपनी टीके का उत्पादन कर रही है। अभी हाल ही में हमने रूस के स्पुतनिक टीके को मंजूरी दी है। फिलहाल वैक्सीन का उत्पादन बढ़ नहीं रहा है, जिसकी वजह अमेरिका द्वारा कुछ ऐसी चीजों के निर्यात पर रोक लगा दी है जो वैक्सीन बनाने के लिए ज़रूरी हैं। सीरम इंस्टिट्यूट के अदार पूनावाला ने खुद, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को टैग करके ट्विटर पर मांग की है कि, यह बैन हटाया जाए।
टीकाकरण को लेकर हमारी नीति स्पष्ट नहीं रही। जब टीकाकरण शुरू हुआ तो सबसे पहले देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, विपक्ष के नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री सहित सभी ऐस आईकॉन जो सिनेमा, खेल और विभिन्न क्षेत्रो से हैं और जिनका प्रभाव लोगों के बीच है उन्हे टीका लगवाना था। यदि ऐसा होता तो टीके को लेकर शुरू में जो भ्रम फैला और कई लाख टीके बेकार गये, वह नहीं होता। टीकाकरण को लेकर कोई स्पष्ट प्लानिंग नहीं होने का नतीजा यह हुआ की हमने कभी 60 साल से उपर तो कभी 45 साल से उपर और अब 18 साल से उपर को टीका लगाने का निर्णय लिया। टीके की अवधि को लेकर भी हमारे यहां भ्रम की स्थिति बनी रही। पहले दोवैक्सीन लगाने के बीच गैप का पीरियड 4 सप्ताह रखा, उसके बाद इसे बढ़ाकर 6 से 8 सप्ताह किया गया। अब इसे तीन माह तक करने की बात की जा रही है। इसके पक्ष में अलग-अलग तर्क दिये जा रहे हैं। वैक्सीन कंपनियों द्वारा केन्द्र, राज्य और प्रायवेट अस्पतालों को अलग-अलग दर पर दिये जा रहे टीके को लेकर भी प्रधानमंत्री की बैठक में मुद्दा उठ चुका है। भारत में 600 रुपये प्रति खुराक पर, 1 मई से निजी अस्पतालों में कोविशिल्ड के साथ टीका लगाने वाले भारतीय ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और एस्ट्राजेने का द्वारा विकसित इस वैक्सीन के लिए दुनिया में सबसे अधिक कीमत का भुगतान करना होगा।

पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा था कि यह फर्म 150 रुपये प्रति डोस के मूल्य पर भी लाभ कमा रही है। अब वे अपनी बातों से पलट गए हैं। वे कह रहे हैं की यह दर सिर्फ पहले शिपमेंट के लिए थी, अब 1,000 रुपये प्रति डोज़ की दर रहेगी। हमने केवल भारत सरकार को पहले 100 मिलियन डोज़ के लिए 200 रुपये की विशेष कीमत दी है और, बाद में हम निजी बाजारों में 1,000 रुपये में बेचेंगे।
अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा प्रांरभ की गई प्रधानमंत्री सड़क योजना को धन्यवाद जिसके कारण बहुत सारे गांवों तक अब आवाजाही आसान हो गई है वरना बरसात में गांवों तक पहुंचना आसान नहीं था। इसके बाद राजीव गांधी ने महात्मा गांधी रोजगार गारंटी जैसी क्रांतिकारी योजना लाई जिसने बहुत हद तक गांव से होने वाला पलायन रूका और गांव में नये इन्फ्रास्टेक्चर बने। इस योजना और बहुत सारी अन्य योजनाओं के चलते पंचायती राज व्यवस्था के प्रतिनिधियों को पैसे कमाने और हेराफेरी करने के अवसर मिले।

कोरोना काल में शहर से आये प्रवासी मजदूरों के लिए और गांव में आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में मनरेगा ने अहम भूमिका निभाई। यही वजह है की छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के मुख्यमंत्री ने एक बार पंचायत प्रतिनिधियों से इस विषम परिस्थिति में भी मनरेगा के काम चालू रखने कहा है ताकि लोगों का मनोबल बना रहे। गाँव अपने अपने तरीक़ों से कोरोना संक्रमण से निपट रहे हैं। आनेवाले समय में इन्हें भी आसानी से जल्दी टीका नसीब हो इसके लिए सही रणनीति बने नहीं तो हमेशा की तरह ये भी अन्त्योदय की सूची के हितग्राही बने रहेंगें।