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जाते हुए साल, ये बुझता हुआ दिल धड़कता तो है मुस्कुराता नहीं

जाते हुए साल, ये बुझता हुआ दिल धड़कता तो है मुस्कुराता नहीं

 मोहसिन नक़वी
कई साल गुज़रे
कई साल बीते
शब-ओ-रोज़ की गर्दिशों का तसलसुल
दिल-ओ-जान में सांसों की परतें उल्टे हुए
ज़लज़लों की तरह हांफ़ता है

चटख़्ते हुए ख़्वाब
आंखों की नाज़ुक रगें छीलते हैं
मगर मैं इक साल की गोद में जागती सुब्ह को
बे-करां चाहतों से अटी ज़िंदगी की दुआ दे कर
अब तक वही जुस्तुजू का सफ़र कर रहा हूं

गुज़रता हुआ साल जैसा भी गुज़रा
मगर साल के आख़िरी दिन
निहायत कठिन हैं
मिरे मिलने वालो

नए साल की मुस्कुराती हुई सुब्ह गर हाथ आए
तो मिलना
कि जाते हुए साल की साअतों में
ये बुझता हुआ दिल
धड़कता तो है मुस्कुराता नहीं
दिसम्बर मुझे रास आता नहीं