breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती

सुभाष मिश्र
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के साथ ही सबसे ज्यादा लोगों की उत्सुकता जिस राज्य पर थी, वह था पश्चिम बंगाल। यहां भाजपा ने अबकी बार दो सौ पार का नारा देकर जिस धुंआधार तरीके से अपनी पूरी ताकत झोंककर चुनाव लड़ा था, जो हाइप बनाई थी, उससे बहुत से लोग ये मानने लगे थे कि तीसरी बार ममता दीदी आऊट हो जायेगी। ममता बैनर्जी ने खेला हौबे के अपने स्लोगन के साथ बंगाली अस्मिता, स्थानीयता और भाजपा द्वारा आजमाए जा रहे धार्मिक दावों का चंडी पाठ करके जवाब दिया, उससे मुकाबला बहुत रोचक बन गया था। चुनाव में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी लगातार कोरोना संक्रमण की अनदेखी करके पश्चिम बंगाल में बिना मास्क के दीदी ओ दीदी कह रहे थे, यह उपहासात्मक तरीके से बंगाल की महिलाओं को अपना अपमान लगा। यही वजह है कि यहां की महिलाओं ने पूरी तरह से भाजपा को नरेन्द्र मोदी, अमित शाह को खारिज किया। 294 सीटों वाली विधानसभा में ममता बैनर्जी ने 216 सीटों के साथ नंदीग्राम से हार के जो जीत दर्ज की है, उसके अपने मायने हैं। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व की हार, उनके गैर जिम्मेदाराना पूर्ण रवैये और उनकी जोड़-तोड़ की राजनीति को करारा जवाब है। पश्चिम बंगाल के लोगों ने बता दिया है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। पश्चिम बंगाल के साथ जिन तीन राज्यों के चुनाव हुए उनमें तीन राज्यों में अमूमन यथास्थिति कायम रही। तमिलनाडु और पुडुचेरी में सत्ता परिवर्तन हुआ। सबसे दिलचस्प नतीजा केरल में देखने में आया जहां पिछले कई दशकों से चला आ रहा सत्ता में बदलाव का सिलसिला टूटा और पहली बार कोई दल दुबारा उस पर काबिज हुआ। इस दृष्टि से केरल में माकपा की यह कामयाबी ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है लेकिन माकपा या यह प्रदर्शन अप्रत्याशित नहीं है। दरअसल, माकपा सरकार ने जिस प्रतिबद्धता, दूरदर्शिता और जन सरोकारों के जुड़ाव के साथ दो महामारी और बाढ़ से जूझने में कामयाबी हासिल की, उससे जनता के भीतर उसके प्रति विश्वास कायम हुआ। माकपा की चुनावी विजय को इसी नज़रिये से देखा जाना चाहिए लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव की ओर देश  ज़्यादा एकाग्र था। दरअसल, पिछले सात वर्षों से केंद्रीय सत्ता पर काबिज दक्षिणपंथी विचारधारा की राजनीतिक विजय उन इलाकों में भी मुमकिन हुई जहां उसका प्रभाव बिल्कुल नहीं था। असम और त्रिपुरा सहित उत्तर-पूर्व के राज्यों में पैर फैलाने के बाद भाजपा की नजऱ पश्चिम बंगाल पर थी, जहां 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे अप्रत्याशित सफलता मिली। उससे आगे बढ़कर इस बार वह हिंदुत्व की विचारधारा और अकूत चुनावी संसाधनों के साथ प्रदेश की सत्ता हासिल करने के लिए कूद पड़ी थी। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के जिस हथियार से असम और त्रिपुरा में उसे विजय मिली थी, उसका पश्चिम बंगाल में भी उसने इस्तेमाल किया। बहुत हद तक उसे इसमें सफलता भी मिली। नतीजा यह है कि वह कम-से-कम तृणमूल के विपक्ष की भूमिका तो वाममोर्चे से छीन ली लेकिन हिंदुत्व की आक्रामक राजनीति का सामना यहां बंगाली अस्मिता से हुआ। ममता बैनर्जी ने दरअसल बंगाली अस्मिता को और ज़्यादा राजनीतिक धार दी। यूँ कहें कि आक्रामक हिंदुत्व का मुकाबला आक्रामक क्षेत्रीय अस्मिता से था। दोनों पक्षों को एक-दूसरे की ताकत का भी अनुमान था। इसलिए दोनों ने एक-दूसरे के वैचारिक इलाके में दखल देने की कोशिश भी की। ममता बनर्जी जहां नन्दीग्राम में चंडीपाठ कर अपने हिन्दू और ब्राह्मण होने का इशारा करती दिखाई दीं, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रवींद्रनाथ टैगोर की विरासत से अपनी विचारधारा को जोडऩे के लिये उनकी छबि में अपने को ढालने के नाट्य से भी परहेज नहीं किया। ये दोनों वोटरों को लुभाने की तरकीबें थीं। इसलिए एक-दूसरे के इलाके में घुसकर प्रतिपक्षी को ललकारने के इस खेल के बाद दोनों अपने इलाकों में लौट गए। इसके बाद घमासान प्रचार का आक्रामक दौर शुरू हुआ, जहां अति नाटकीयता ही आखिरी हथियार रह गयी थी जिसका भरपूर इस्तेमाल दोनों पक्षों ने किया।

लेकिन इस पूरे खेला में जनता ने अपना पक्ष सतर्कता से चुन लिया था। एक तरफ बंगाली अस्मिता एकजुट होकर अपने सोनार बांग्ला को बचाने कटिबद्ध हुई, वहीं दूसरी तरफ जनता के एक बड़े तबके में हिन्दू चेतना के उभार के लिये सक्रिय ताकतों को भी कामयाबी मिली। बंगाल में भाजपा की यह सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता यह है कि उसका एक सशक्त जनाधार कायम हो चुका है। उसे बाहरी पार्टी बताया गया, लेकिन उस पर भरोसा करने वाले मतदाताओं की संख्या कम नहीं है। बंगाल के चुनाव परिणाम को एक अर्थ में साम्प्रदायिक विचारधारा पर बांग्ला आत्मगौरव की विजय के रूप में देखा जाना चाहिये, लेकिन एक भिन्न परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसमें भाजपा की धार्मिक अस्मिता पर टिकी राजनीति की आंशिक सफलता भी दिखाई देती है। बेशक भाजपा ने जिस पैमाने पर संसाधन झोंके थे, उसके पीछे बंगाल विजय की महत्वाकांक्षा सक्रिय थी। वह भले पूरी न हुई हो, लेकिन बंगाल से उसने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे और आफत के दिनों में एकजुट हो चुके दो पुराने प्रतिद्वंद्वियों यानी वामपंथियों और कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने में कामयाबी ज़रूर हासिल की है। इस बार कांग्रेस और वामपंथ दोनों अपने पारम्परिक गढ़ में अगर ज़मीन खो चुके हैं तो इसलिए कि उसे भाजपा ने हथिया लिया है। तृणमूल कांग्रेस को मिली कामयाबी और कांग्रेस-वामपंथ गठबंधन की नाकामी के पीछे मुस्लिम एकजुटता भी एक कारक है। जो हिंदुत्ववादी पार्टी के भय से कांग्रेस या वामदलों को छोड़कर ममता बनर्जी के साथ हो लिया। इसमें भी भाजपा की कामयाबी को ढूंढा जा सकता है।
बंगाल में यह चुनाव दरअसल धर्मनिरपेक्ष राजनीति के अवसान और क्षेत्रीय अस्मिता तथा साम्प्रदायिक अस्मिता के उभार की ओर संकेत करता है।

भाजपा में चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह कह रहे थे कि इलेक्शन इमोशन पर लड़ा जाता है। वे भूल गए कि ये इमोशन उनके साथ नहीं बल्कि ममता बैनर्जी के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ था। बहुत सारे सोशल मीडिया ग्रुप पर आज यह मैसेज आ रहा था कि भाजपा+आरएसएस+चुनाव आयोग+ सीबीआई+ ईसी+ प्रधानमंत्री+ गृहमंत्री+ सभी सेंट्रल एजेंसी+ आज तक+ रिपब्लिक+ एबीपी न्यूज़ +इंडिया टीवी+ न्यूज़ नेशन+ दैनिक जागरण+ आदि गोदी मीडिया, ये सब मिलकर भी एक महिला को हरा नहीं पाए।

पश्चिम बंगाल में भाजपा को चुनाव जीतने के लिए राजभवन ने विपक्ष के नेता की तरह काम किया। केंद्र सरकार ने अपनी एजेंसियों के माध्यम से ममता बैनर्जी को उनके भतीजे अभिषेक बैनर्जी के नाम से, चिटफंड कंपनियों, कोयला घोटाला आदि के नाम से घेरने की पूरी कोशिश की। चुनाव प्रचार के लिए जहां 18 बार स्वयं प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी गये। उनसें कई ज्यादा बार गृहमंत्री अमित शाह। इसके अलावा राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय दो साल से वहां कैंप किये बैठे थे। चुनाव के समय बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश से बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ताओं की फौज इक्कठा की गई। पश्चिम बंगाल के लोगों को बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम पर डराते हुए कहा गया की वो तुम्हारे घरों में घुसकर कब्जा कर लेंगे। युवाओं को सपने दिखाकर रोजगार दिलाने का आश्वासन दिया गया और उन्हें मुफ्त में टीकाकरण की बात कही गई। जय श्रीराम के नारे के साथ हिन्दू अस्मिता को जगाने, धार्मिक आधार पर वोटो का ध्रुवीकरण करने जैसी बातें भी हुई। टीएमसी से नाराज या महत्वाकांक्षी नेताओं को तोड़कर उन्हें भाजपा में शामिल कर टिकिट दिये गये।

जोड़-तोड़ में माहिर भाजपा जिसने पिछले कुछ सालों में जोड़-तोड़ की राजनीति को नैतिक और पार्टी का अंदरुनी झगड़ा बताकर विधायकों से उम्मीदें दिखाकर उन्हें लाभ के पद दिलाकर या दलबदल करके बहुमत की अनदेखी करते हुए अपनी सरकारें बनाई तो लोगों को लगा कि यदि पश्चिम बंगाल में भी 200 से कम सीटें आई तो आगे जोड़-तोड़ करके अपनी सरकार बना लेगी।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम बता रहे हैं कि पैर में फ्रैक्चर और ट्राईसायकल पर बैठकर फुटबॉल फेंकते हुए ममता बैनर्जी ने जैसा कहा था की खेला होबे, वैसा खेला हो गया। ममता बैनर्जी तीसरी बार आसानी से सत्ता पर काबिज हो गई हैं। भाजपा ने यह चुनाव बिना मुख्यमंत्री के चेहरे यानी एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर लड़ा था। वहीं, टीएमसी का चेहरा ममता बैनर्जी थीं। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या 2024 के लिए ममता विपक्ष का चेहरा बन सकती है। अपनी इस हैट्रिक के साथ ही ममता बैनर्जी विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा बन गई हैं।

विपक्ष में फिलहाल ममता बैनर्जी जैसा कोई जुझारू और लड़ाका नेता नहीं है जो भाजपा को उसी की रणनीति और औजारों से मात दे सके। ममता बैनर्जी ने ये कर दिखाया है। विपक्ष के नेतृत्व में चेहरे की तलाश करें राष्ट्रीय स्तर पर नजर डालें तो बहुत ही निराशाजनक माहौल है। पहला नाम राहुल गांधी का आता है। राहुल गांधी के नाम कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है। वे दो कदम आगे जाते हैं, तो चार कदम पीछे। राहुल गांधी के अलावा सपा प्रमुख अखिलेश यादव, बीएसपी प्रमुख मायावती, जेडीएस के अगुवा एचडी कुमारस्वामी, वामदल के सीताराम येचुरी समेत तमाम नेताओं में से कोई भी क्षत्रप नहीं है, जो बीजेपी के सामने अपनी ताकत दिखा पाया हो। केवल ममता बनर्जी ही हैं। पीएम मोदी की ललकार का मुस्तैदी से जबाब देती रही हैं। ममता बनर्जी ने धारा 370 से लेकर एनआरसी, सीबीआई की राज्यों में कार्रवाई, मां दुर्गा मूर्ति विसर्जन, जयश्री राम का नारा आदि तमाम मुद्दों में बीजेपी को खुलकर जवाब दिया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में खेला कर दिया है।