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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-जंगल के मोर ने नाचा सबने देखा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-जंगल के मोर ने नाचा सबने देखा


हमारे यहां कहावत है कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा। राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव के संदर्भ से जोड़ते हुए कहा जा सकता है कि जंगल के मोरों ने नाचा सबने देखा और खूब सराहा। दरअसल, जल-जंगल-जमीन के असली वारिस हमारी जनजातीय के वे लोग जो प्रकृति के नजदीक हैं। जो सुदूर जंगलों में नदी, पहाड़, झरनों और घने वनों के बीच रहते हैं, वे अपनी छोटी-छोटी खुशियों को भी सामूहिकता के साथ नाच गाकर मनाते हैं।

विनोद कुमार शुक्ल की आदिवासी जनजीवन और और उनके सुख-दुख से जुड़ी दो कविताएं यहां प्रसंगवश:
शहर से सोचता हूँ
कि जंगल क्या मेरी सोच से भी कट रहा है
जंगल में जंगल नहीं होंगे
तो कहाँ होंगे?
शहर की सड़कों के किनारे के पेड़ों में होंगे।
रात को सड़क के पेड़ों के नीचे
सोते हुए आदिवासी परिवार के सपने में
एक सल्फी का पेड़
और बस्तर की मैना आती है
पर नींद में स्वप्न देखते
उनकी आँखें फूट गई हैं।
परिवार का एक बूढ़ा है
और वह अभी भी देख सुन लेता है
पर स्वप्न देखते हुए आज
स्वप्न की एक सूखी टहनी से
उसकी आँख फूट गई।
कविता 2
जंगल के दिनभर के सन्नाटे में
महुआ टपकने की आवाज आती है
और शाम को हर टप ! के साथ
एक तारा अधिक दिखने लगता है
जैसे आकाश में तारा टपका है
फिर आकाश भर जाता है
जैसे जंगल भर जाता है
आदिवासी लड़की, लड़के, स्त्री जन
अपनी टोकनी लेकर महुआ बीनने
दिन निकलते ही उजाले के साथ-साथ
जंगल में फैल जाते हैं।।

रायपुर में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य समारोह में देश भर के 27 राज्यों के 6 केन्द्र शासित प्रदेशों और 7 देशों के एक हजार से अधिक कलाकारों ने ऐसे मंच पर अपनी प्रस्तुति दी है जो उनके लिए नया था। भव्य एलईडी लाईट, बड़ी-बड़ी स्क्रीन, बहुत से कैमरों और अंजान लोगों के बीच अपनी खुशियों के पलों को, जो वे अपने समाज, अपने आंगन, अपने घोटूल, अपनी देवगुड़ी के आसपास प्रकृति की गोद में चांद-तारों के प्रकाश और प्राकृतिक संसाधनों के बीच करते आये हैं, उसका सार्वजनिक प्रदर्शन किया।

दरअसल हमारे देश में बहुत सारी इवेंट कंपनियां सरकारी क्षेत्र के आयोजनों में सक्रिय है। वे आयोजनों का बजट आयोजक की मंशा देखकर तय करती हैं। चूंकि, उन्हें इवेंट से मतलब होता है इसलिए वे आयोजन की असली मंशा, उसकी आत्मा तक नहीं पहुंच पाती। वे समारोह की भव्यता पर ध्यान देते हैं। बहुत बार तात्कालिक रूप से आयोजकों की भी यही मंशा रहती है। आदिवासी नृत्य समारोह का आयोजन इस मामले में सराहनीय है कि इसके बहाने जनजातीय समूहों के लोगों को एक ऐसा मंच मिला जिसके जरिए वे देश-विदेश की आदिवासी संस्कृति, आदिवासी रीति-रिवाज, बोली, भाषा से परिचित हुए। इसे अजूबा और पिछड़ा समझने वाले कथित शहरी लोगों ने भी देखा कि बिना डिस्को बॉर में जाये, बिना किसी डांस टीचर से, किसी गुरू द्रोणाचार्य से ट्रेंड हुए भी ये एकलव्य तीर कमान भी चलाते हैं और संगीत की लय पर नाचते भी हैं।

रायपुर में आयोजित इस तीन दिवसीय आदिवासी नृत्य समारोह का शुभारंभ करते हुए आदिवासी बाहुल्य राज्य झारखंड के आदिवासी समाज के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सही ही कहा कि जल-जंगल-जमीन जनजातीय समाज की आत्मा है। खेत-खलिहान, पशुधन और वनोपज इनकी संपत्ति है। छत्तीसगढ़ में आदिवासी वर्ग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए किये जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए उन्होंने जो कहा वह जमीनी सच्चाई है। हेमंत सोरेन के शब्दों में जब तक गांव समृद्घ नहीं होंगे, तब तक शहर, प्रदेश और देश समृद्घ नहीं होगा। जब हम गांव की बात करते हैं तो हमें किसान और खेतिहर मजदूरों की बात भी करनी होगी। छत्तीसगढ़ ने किसानों का ऋण माफ करके उन्हें राजीव न्याय योजना के अंतर्गत समर्थन मूल्य से अधिक पर धान खरीदकर, गोबर खरीदकर आर्थिक संबल दिया है, वहीं खेतिहर मजदूरों को भी आर्थिक सहयोग किया है।

देश की वन संपदा और जनजातीय क्षेत्र का सबसे समृद्घ राज्य छत्तीसगढ़ जिसने पिछले साल से आदिवासी नृत्य महोत्सव की शुरुआत की है, वहां पर जनजातियां और 5 विशेष पिछड़ी जनजातियां निवास करती हैं। छत्तीसगढ़ की कुल आबादी का एक तिहाई आदिवासी वर्ग है जिनके बीच बहुत सारी जनजातीय विशेषताएं हैं, उसकी अपनी-अपनी पहचान बोली, उत्सव और देवी-देवता हैं। छत्तीसगढ़ की राजनीति भी आदिवासी समीकरण के ईर्द-गिर्द ही घुमती है। छत्तीसगढ़ का बस्तर और सरगुजा संभाग यह तय करता है कि छत्तीसगढ़ में कौन काबिज होगा। यही वजह है कि नृत्य महोत्सव के बहाने हो रहे इतने बड़े आदिवासी समागम को लेकर सियासी बयानबाजियों का दौर भी प्रारंभ हो गया है। भाजपा को लगता है कि यह एक पब्लिसिटी स्टंट है जिस पर सरकार दस से बीस करोड़ रुपए खर्च कर रही है। भाजपा का कहना है कि आदिवासी अपने हक की लड़ाई के सैकड़ों मील पैदल चलकर आ रहे हैं। वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और आदिवासी नृत्य महोत्सव के सूत्रधार भूपेश बघेल कहते हैं कि भाजपा नहीं चाहती है कि आदिवासी जंगल से बाहर निकलें। भाजपा नेताओं की मानसिकता ही है कि आदिवासी अभी भी लंगोट पहन रहे।

छत्तीसगढ़ में 2023 में विधानसभा चुनाव है। भाजपा ने पिछले चुनाव में आदिवासी क्षेत्र से अपना जनाधार खोया है। यहां की अधिकांश विधानसभा सीटें कांग्रेस के पास है। भाजपा इस समय आदिवासी क्षेत्र पर फोकस कर रही है। बस्तर से चिंतन शिविर की शुरुआत वाली भाजपा टी.एस. सिंहदेव के कथित असंतोष के जरिए दूसरे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र सरगुजा में अपनी पकड़ बनाना चाहती है। इस समय प्रदेश में धर्मांतरण का मुद्दा भी गरमाया हुआ है। सरगुजा के कुछ जिलों में इसाई मिशनरियों का अच्छा काम है, समाज जीवन में अच्छी पकड़ है। धर्मांतरण के नाम पर हिन्दू वोटों की भावनाएं भुनाई जा सकती है। तमाम राजनीतिक कवायद और अलग-अलग प्राधिकरणों के गठन के बाद भी अभी तक छठवीं अनुसूची की अनुशंसाएं आदिवासी क्षेत्र में लागू नहीं हो पाई है।

राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य समारोह के जरिए छत्तीसगढ़ ने पूरे देश में अपनी विशिष्ट पहचान जो कि उसकी जनजातीय और ग्रामीण परिवेश वाली पहचान है, उसे विस्तारित किया है। एक नये राज्य के रुप में छत्तीसगढ़ में जो कुछ नवाचार, विकास हो रहा है उसे राज्योत्सव की प्रदर्शनी के साथ जोड़कर सोशल और इलेक्ट्रानिक मीडिया व नृत्य समारोह में आये एक हजार से अधिक प्रतिनिधियों के माध्यम से दूर-दूर तक पहुंचाने में सफलता मिली है। भविष्य के आयोजन में आदिवासी जनजीवन से जुड़े कला मर्मज्ञों और जानकारों से विचार-विमर्श करके यह आयोजन होगा तो निश्चित ही इसकी गरिमा और प्रस्तुति में चार-चांद लगेंगे।