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दुनिया का कोई और देश भी इस बौड़मपने से चल रहा है क्या ?

दुनिया का कोई और देश भी इस बौड़मपने से चल रहा है क्या ?


*दीपक कबीर*


मतलब आखिर हो क्या रहा है वो भी तब जीते जागते लोग आँधी के आमों की तरह टपा टप मर रहे हों..

आज हर आदमी दूसरे से यही कह रहा है 'पैनिक न हों , डरें नहीं ' ..मगर वो कैसे न डरे। मैं स्वीकार करता हूँ मैं खुद पैनिक हो गया था परसों जब डॉक्टर गुलेरिया का CT स्कैन वाला बयान वायरल हुआ।


गनीमत है कि मैं tv नही देखता तो डॉक्टर गुलेरिया को भी नही जानता सुनता था,  अभी 3-4 रोज़ पहले #ravish kumar की डॉक्टर साहब के फुरसतिया प्रवचनों पर सवाल करती पोस्ट पढ़ी थी तो कुछ अंदाज़ा हो गया था...

मगर जब हर ओर उनके बयान वायरल होने लगे और सुनने में ज़रा प्रो पब्लिक से लगे तो ध्यान चला ही गया कि CT स्कैन बहुत खतरनाक है, कैंसर कर देगा, 400 xray के बराबर है, 


मैं खुद अभी परिवार सहित पोज़ीटिव हूँ, देख रहा हूँ लोग निगेटिव होने और अस्पताल से लौटने के तीसरे चौथे दिन मरे जा रहे हैं, पोज़ीटिव लोगों को देखने को डॉक्टर तैयार नहीं, आपको पता नहीं आखिर स्टेरॉयड के बाद अब कौन सी दवा लेनी है, खून पतला करने की दवा कब तक ?? चेस्ट का इंफेक्शन कैसे खत्म होगा और कितने स्कैन कराने होंगे, कितने ब्लड टेस्ट , जबकि लखनऊ जैसे शहर की बड़ी से बड़ी पैथालॉजी में IL-6 टेस्ट की किट आधे महीने से उपलब्ध नहीं है। स्कैन न कराने की वजह सिर्फ कैसर नहीं बल्कि 5500/ का एक स्कैन है,परिवार के 6 मेंबर भी अगर दो दो करवाएं तो 70,000 रुपये, प्रति व्यक्ति 8000/ ब्लड टेस्ट,  एक आदमी की फेविफ्लू 5000 की पड़ रही है।


इन सबके बावजूद टप टप होती मौतों, ऑक्सीजन की तबाही, दवाओं की कालाबाज़ारी और RTPCR पर रोक तथा गड़बड़ियों के बीच मिडिल क्लास को यही राहत लगी थी कि हर बुखार - सिम्टम्स को कोविड मान के इलाज शुरू कर दे और बिना लेट किये हफ्ते भर में स्कैन करा लें, अगर इंफेक्शन दिखे तो सीधे स्टेरॉयड शुरू कर दे, ताकि वो बिना ऑक्सीजन के तड़पते हुये परिजन वाली स्थिति का सामना न करना पड़े।


खुद कई डॉक्टर्स से समझा और यही सबको समझा कर कोशिश थी कि लोगों की पहले ज़िन्दगी बचे, शुगर वुगर,कमज़ोरी वमज़ोरी  बाद में कण्ट्रोल की जाएगी।


अब मैं परेशान, साला कितनो को बेवज कैंसर करा दिया होगा, खुद भी पूरे परिवार को करवा डाला, अब आगे क्या किया जाय..,नये लोगों का लाइन ऑफ ट्रीटमेंट क्या होगा ??अगर अंदर अंदर इंफेक्शन हुआ और बाहर सिर्फ हल्का बुखार या अलाक्षणिक ..तो झम से आदमी निकल लेगा,5500 रुपये खर्च भी किये तो स्कैन की जगह कैंसर ले के आएगा।


एम्स के निदेशक डॉक्टर गुलेरिया ने जो पैनिक और गिल्ट फैलाया उसे उसके अगले दिन देश की रेडियो सोसायटी और उनके एक्सपर्ट ने बकवास साबित कर दिया कि ऐसा कुछ नहीं होता।


मतलब दोनो टॉप लोग अपने अपने पसंदीदा मीडिया चैनल, प्रेसन्यूज़ और सोशल मीडिया में छाये हैं और देश में ये जो सिस्टम है इसे फ़िक़्र ही नहीं कि तय करे भाई फलाने सही हैं फलाने गलत।


और अगर इतने बड़े पैमाने पर कोई गलत है तो अफवाह फैलाने पर सस्पेंड करो, अरेस्ट करो, डिग्री कैंसल करो, मतलब जो चाहे बोल दो...और लाखो करोड़ो पैनिक होकर ढेर हो जायें।


कोई कह रहा है गायत्री मंत्र से कोरोना ठीक करने का बाकायदा एम्स को ठेका दिया गया था, कोई कह रहा गायों के लिये थर्मल स्कैनर और ऑक्सीजन सपोर्ट का इंतज़ाम हो रहा है..


यही नहीं..कहीं पता चल रहा कि ऑक्सीजन सिलेंडर बनाने के कारखाने तो खूद सरकारी आदेश से बंद पड़े हैं कहीं अमरीका के पत्रकार जब अपने यहां मदद का सवाल पूछ रहा है तो पता चल रहा है सारी विदेशी मदद बंदरगाहों पर फंसी है कि यही नही पता कौन सा विभाग उसे कैसे यूज़ करेगा..


अजीब बेशर्म सहनशक्ति है हमारी, आखिर तक आते आते बस हँसने -व्यंग्य करने लगते हैं..,भूल जाते हैं कि हर चूक पर किसी घर मे कोई जीता जागता इंसान मर रहा है, उसका पूरा जीवन ,परिवार ,सपने ,पूंजी इन बेवकूफाना खिलवाडो में खत्म हो जा रहा है.


मध्यवर्ग का जब ये हाल है तो मज़दूर वर्ग,गांव, कम पढ़े लिखे या गरीबों का सोचिये..बुखार की गोली खा के मर जा रहे हैं क्योंकि इससे आगे न जानते हैं न अफोर्ड कर सकते हैं...

क्या सरकारें, प्रधान मंत्री,मंत्रिमंडल, लाखों विभाग, सिस्टम,कर्मचारी ,राज्य मुख्यमंत्री ,उनके सिस्टम ,सूचना,प्रसार, पोलिटिकल पार्टीज़,उनके तंत्र, संगठन...ये सब हवा था ? है ??


मरने वालों में सिर्फ जनता नहीं हर पार्टी ,विचारधारा के लोग हैं , खुद भाजपा के लोगों को अपनी सरकार और सिस्टम पर भरोसा नहीं है..हर सक्षम इंसान ने यूं ही नहीं अपने सिलेंडर और दवाओं का (इलाज के पैसों का भी) जुगाड़ कर रखने की कोशिश की है...


अपनी राजनैतिक मोह -चिढ़ या मजबूरियों को हटा के बताइये...क्या आप संतुष्ट हैं ?? क्या आपको कहीं कोई गड़बड़ नही नज़र आती ??


क्या एक ही वक़्त में डॉक्टर गुलेरिया और रेडियोलोजिस्ट असोसिएशन दोनो के बयान जनता में आधिकारिक रूप से जाने चाहिये कि जनता का जिस पर भरोसा है उसे खुद मान ले..


सही गलत जैसा कुछ नहीं होता ,

सबका अपना अपना नजरिया होता है ..

क्या लोगों की ज़िंदगी से जुड़े विज्ञान और मेडिकल साइंस में भी ???

क्या आकस्मिक और बेवजह की इन हज़ारों मौतों का कहीं कोई ऑडिट होगा ? किसी मंत्री, किसी विभाग ,किसी व्यक्ति की कभी कोई ज़िम्मेदारी तय होगी ?

क्या यही हमारा सिस्टम और विकास है जो अखबारों,चैनल और लाखों फ्लेक्स के विज्ञापनों के अलावा हमे कभी कहीं नहीं दिखता ??

और क्या यही हमारी निजी आज़ाद मीडिया का हासिल है कि कहीं कोई सवाल.. कोई गुस्सा नहीं उभरता।