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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- नेगेटिव खबरो से घबराये लोग

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- नेगेटिव खबरो से घबराये लोग

 सुभाष मिश्र

ऐसा नहीं था की दुनिया में इसके पहले महामारी नहीं आई। प्लेग से, इबोला से और ना जाने कितनी-कितनी बीमारी से लाखों लोग मरे पर तब शायद मौत का इतना खौफ नहीं था जितना आज है। संचार माध्यमो के जरिये और सोशल मीडिया के व्हाट्सप्प ग्रूप के जरिये और न्यूज चैनलों के जरिये सुबह से रात तक कोरोना से मरने या पॉजिटिव हुए लोगो की खबरें आ रही हैं। लॉकडाउन में घर में बैठा आदमी ऐसी सूचनाओं से घबरा रहा है। डॉक्टर भी लाख समझाईश दे रहे हैं पर उसका कोई खास असर नहीं हो रहा है। हाल ही में गंभीर मरीजों को डॉक्टर की सलाह पर दी जाने वाली रेमेडेसिविर इजेक्शन की कमी को लेकर फैलाई गई अफवाह का ये असर हुआ की जिन्हे इसकी जरूरत भी नहीं थी उन्होने भी इसे ब्लेक में खरीद कर रख लिया। जमाखोर, मुनाफाखोर और जनभावना को भडका कर उसका लाभ लेने वालों का सबसे बड़ा हथियार है झूठी खबरों को फैलाना ताकि अपना उल्लू सीधा कर सकें।
इस दौर में सहभागिता और संवाद की भूमिका दवा से कम नहीं है। किसी आपदाग्रस्त को दी गयी तनिक सी भी मदद उसके भीतर सकारात्मक एहसास को जीवित रखने में मददगार हो सकती है। सामुदायिक इच्छाशक्ति और उसकी सक्रिय अभिव्यक्ति संकटग्रस्त व्यक्ति और उसके मनोबल को ऊँचा उठाये रखती है। यह समाज के एकजुट होने और आपद्धर्म के निर्वाह के लिये कृत संकल्प होने का समय है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति या संस्था किसी मरीज़ के लिये इलाज या भोजन का प्रबंध करने के लिए नि:स्वार्थ सेवाभाव से सक्रिय हो तो समूचे समाज में सकारात्मक मानवीय ऊर्जा का संचार स्वाभाविक है। राज्य सत्ता की नाकामी पर सवाल उठाना जायज़ है, लेकिन तमाम खामियों के बावजूद हालात का मुकाबला करने में उसके प्रयत्नों का ईमानदार मूल्यांकन किया जाना और उसके मनोबल को बनाये रखना भी उतना ही आवश्यक है। महामारी के खिलाफ समाज की एक जुटता और संकल्प शक्ति मीडिया में भी दिखाई देनी चाहिए। यह अवसर है कि मुख्यधारा के मीडिया की प्राथमिकताओं से अलग सोशल मीडिया को समाज के प्रति जवाबदेही निभानी होगी। यह तभी होगा जब प्रत्येक सोशल मीडिया प्रयोक्ता के भीतर महामारी के खिलाफ एकजुट होने का भाव पैदा हो। अगर नो नेगेटिव न्यूज़ का अभियान चलाया जा रहा है, तो पॉजिटिव न्यूज़ भी प्रयोक्ताओं को ही साझा करने होंगे। ऐसे वक्त में वायरस और संक्रमण के निदान से सम्बंधित वैज्ञानिक सूचनाओं के प्रसार के साथ उससे उबर चुके लोगों की कहानियां अगर सोशल मीडिया पर प्रसारित होंगी तो निश्चय ही समाज के भीतर अवसाद और निराशा से लडऩे में मदद मिलेगी।
क्या हम जानते हैं की हमारी एक नेगेटिव सूचना, न्यूज़ मरीज की जान ले सकती है। यह सही है कि स्थिति कोरोना संक्रमण को लेकर अभी सामान्य नहीं है। हम अपने देश के कोरोना संक्रमितों की संख्या और इससे मरने वालों की संख्या मृत्यु दर एक से डेढ़ परसेंट के ऊपर नहीं है, इनमे भी बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें पहले से कोई गंभीर बीमारी है या जिन्होंने बहुत बाद में टेस्ट कराया उनकी स्थिति खराब हो रही है। लेकिन सोशल मीडिया पर लगातार निधन हुए व्यक्ति की फोटो, श्मशान घाट की तस्वीरें, मरने वालों की संख्या, हॉस्पिटल्स में जगह ना होने की बातें, सरकारों पर आरोप-प्रत्यारोप ने उन  मरीजों को दहशत में ला रखा है, जो अपने-अपने घरों में कमरों में अकेले सिर्फ मोबाइल के सहारे इस बीमारी से लड़ रहे हैं।
दरअसल मीडिया में जो रूटिन में है, वह खबर नहीं है। स्कूल, अस्पताल, सरकारी दफ्तर अच्छे से चल रहे हैं तो यह खबर नहीं है। मीडिया कहेगा ये तो उनका काम है, पर हां यदि वहां कोई एक डॉक्टर, एक टीचर, कुछ अधिकारी-कर्मचारी कुछ गलत कर रहे हैं तो वह खबर है। यही वजह है की हमारे आसपास जो भी सकारात्मक हो रहा है वह खबर नहीं है। हां यदि कुछ भी नेगेटिव है तो वह जरूर चर्चा में है, खबर में है। कोरोना संक्रमण के इस क्रिटिकल टाईम में एक नेगेटिव न्यूज़ मरीजों का ब्लड प्रेशर लगातार बढ़ा रही है और दहशत में नार्मल होते हुए भी वह अपनी स्थिति को गंभीर समझ अपनी हालत बिगाड़ रहे हैं। कुछ लोग आने वाली नकारात्मक खबरों से घबराकर
सोशल मीडिया पर नो नेगेटिव न्यूज़ अभियान चलाने की बात कर रहे है।
ऐसा नहीं था की अखबार या अन्य माध्यमों सब सकारात्मक खबरे ही दिखाते रहे हैं, किन्तु जब से सोशल मीडिया आया है तब से एडिटर नामक संस्था लुप्त हो गई है। किसी भी तरह का वीडियो, फोटाग्राफ सूचनाएं पोस्ट करने की आजादी है। समाचार पत्रो की तो अपनी एक मर्यादा हुआ करती थी, कभी हद तक टीवी चैनलो ने भी इसे निभाया, किन्तु अब गोदी मीडिया के इस दौर में अपने-अपने आकाओं को खुश करने या तो दिनभर उनके गुणगान और विपक्षियों की छबि धूमिल करने वाली खबरे दिखाई जा रही हैं। दूसरी तरह रेप पीडि़ता के फोटो, वीडियो से लेकर ऐसी बहुत सी खबरे पोस्ट हो रही हैं, दिख रही है जो पहले मीडिया की आचार संहिता के अनुसार वर्जित थी।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बधेल ने संकट के समय अफवाह फैलाना बंद करें की अपील के साथ कहा है की छत्तीसगढ़ में कोरोना की जांच, वैक्सीनेशन का काम बहुत अच्छी तरह से चल रहा है पर सोशल मीडिया के जरिये गलत जानकारी दी जा रही है।
सोशल मीडिया के जरिये झूठी खबरें डालकर माहौल को तनावपूर्ण बनाने की यूं तो बहुत सी कोशिशे जारी हैं, ऐसी ही एक घटना चंबा मेडिकल कॉलेज की फोटो डालकर अफवाह फैला दी कि अस्पताल में कोरोना का संदिग्ध मरीज लाया गया है। इसलिए कोई भी लोग घरों से बाहर न निकलें।
इससे लोगों में दहशत का माहौल बन गया। इसके चलते मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेशगुलेरी को सोशल मीडिया पर मेसेज डालना पड़ा कि मेडिकल कॉलेज में कोरोना का कोई संदिग्ध मरीज नहीं आया है।
बे्रंकिग न्यूज, टीआरपी या लाईक, सब्क्राईबर, फालोअर के चक्कर में ऐसा कुछ दिखाया जा रहा है जो एक स्वस्थ समाज के लिए ठीक नहीं है। एक ओर जो सच बोलने की कोशिश करते है, गलत का विरोध करते हैं, उन्हे किसी भी तरह से डराने, धमकाने का काम होता है, उनके विरोध को राष्ट्र भक्ति के साथ जोड़कर उन्हे देशद्रोही तक करार दे दिया जाता है। दूसरी ओर वार रूम के जरिये दिनभर फेक और झूठी खबरों को सोशल मीडिया के जरिये फैलाने का काम जारी है। इस सूचना समर में यह तय कर पाना मुश्किल है की कौन सी खबर, सूचना के पीछे क्या छिपा है।