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जैसे अमरूद की खुशबू ...

जैसे अमरूद की खुशबू  ...

मंगलेश डबराल   

ज्ञानरंजन. ज्ञान जी. ज्ञान भाई. एक पुराना ज़र्द पड़ता पोस्टकार्ड किसी  बेशकीमती धरोहर या तमगे की तरह अब भी मेरे पास है, जिसे ज्ञानरंजन ने सन १९७१ में मेरे घर काफलपानी के पते पर भेजा और फिर मेरे पिता ने मुझे दिल्ली रीडायरेक्ट  किया था क्योंकि मैं तब तक नौकरी की तलाश में दिल्ली आ गया था. फाउंटेन पेन  से लिखी हुई काली स्याही की वह कुछ वज़नदार इबारत कहती थी: ‘प्रिय भाई, मेरा आपसे कोई परिचय नहीं है, लेकिन ‘सारिका’ के नए अंक में आपकी कहानी ‘आया हुआ आदमी’ पढ़कर यह लिख रहा हूँ. मैंने हाल के वर्षों में ऐसी और कोई कहानी नहीं पढी. उसकी ऊपरी, भाषाई सतह पर एक क्रूरता दिखाई देती है, लेकिन उसके नीचे करुणा की धारा बहती है. आपको बधाई. आपका—ज्ञानरंजन.’   

   पोस्टकार्ड मिला तो यह यकीन करने में देर लगी कि यह ज्ञानरंजन का पत्र है, जिनकी भाषा का नशा हम लोगों पर छाया हुआ रहता है और जिनकी शैली की नक़ल हर कोई करना चाहता है. वह पोस्टकार्ड एक खिड़की था जहां से मैं ज्ञानरंजन से हाथ मिला सकता था या विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ की तर्ज़ पर कूद कर उस संसार में प्रवेश कर सकता था जहां ज्ञान रहते थे. उनकी धूमकेतु जेसी हैसियत थी और ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘अणिमा’ आदि पत्रिकाओं में कहानियों के साथ छपे उनके चित्र सम्मोहित करते थे जिनमें अनिवार्य तौर पर छोटी, चहरे से चिपकी हुई दाढी होती थी. हर छपी हुई तस्वीर में ज्ञानरंजन  कटी-छटी चहरे से लगभग चिपकी हुई दाढ़ी के साथ होते थे और उसके बिना उनके चहरे की कल्पना करना मुश्किल था.बाद में भी  उनकी दाढ़ी उसी तरह बनी रही जिसका आकार न कभी बड़ा हुआ न कभी छोटा. 

    नयी कहानी के बाद सन साठ के बाद की कहानी को एक नयी पीढ़ी का प्रस्थान-बिंदु और प्रस्थापना-परिवर्तन माना जाता था जिसके अगुआ  ज्ञानरंजन , दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया और काशीनाथ सिंह थे. यह मूर्तिभंजक पीढ़ी  तेज़ी से अपनी जड़ें फेंक रही थी और उसके विषय में कई तरह के किस्से और मिथक साहित्यिक हवा में तैरते हुए आते थे. मसलन यह कि ज्ञानरंजन इलाहाबाद के लेखकों के  मशहूर अड्डे काफी  हाउस  में लेखक मंडलियों से दूर रहते हैं, कुछ आवारागर्दों और अर्ध-बेरोजगारो से उनकी गहरी छनती है और उन्हें  साहित्य-चर्चा  में लीन रहने की बजाय उनके साथ  ताश खेलना ज्यादा पसंद है. (इसी तरह , दूधनाथ सिंह के बारे में यह प्रचलित था की वे हमेशा साहित्य के दिग्गजों को परेशान करने की चाल सोचते रहते हैं और रमेश बक्षी नहाते समय भी  टाई  पहने रहते हैं).

   सन १९७७ में जब मैं दैनिक ‘अमृत प्रभात’  में काम करने इलाहांबाद गया तो ज्ञान भाई अपने  जीवन की सर्वश्रेष्ठ   कहानियां लिखने (जो अपने समय की भी सर्वश्रेष्ठ कहानियां बनीं) और खासी हलचल मचाने के बाद जबलपुर जा चुके थे. लेकिन वे लगभग हर एक या दो महीने में इलाहाबाद आते रहते. इलाहाबाद उनके भीतर इस तरह बसा हुआ था जैसे अमरुद के  भीतर और पोर-पोर में उसकी खुशबू बसी होती है जिसे फल से अलग करना असंभव है ( इलाहाबाद के बड़े-बड़े अमरूदों में यह कुछ ज्यादा ही होती है). वे अमरूदों की तरह अपने  शहर को भी जैसे चुराकर साथ ले गए थे. जब वे इलाहाबाद में नहीं होते थे, इलाहाबाद उनकी कल्पना में मंडराता  रहता था. दरअसल, ‘अमरुद का पेड़‘ से लेकर  आख़िरी  रचना ‘अनुभव’ तक यह शहर उनकी हर कहानी में है  भले ही उसका नाम कहीं न लिया गया हो और वह जबलपुर आश्चर्यजनक रूप से  लगभग अनुपस्थित है जहां उनके जीवन का ज्यादातर हिस्सा बीता. यह कुछ इस तरह है जैसे इतालवी लेखक इतालो काल्वीनो की कृति ‘ न दिखने वाले शहर’ में जब मार्को पोलो लम्बी यात्राओं से लौट कर  कुब्ला खान के दरबार में आता है  तो अपने सफर के विभिन्न शहरों—स्मृतियों का शहर, नींद  का शहर, भूमिगत शहर,  अनिर्मित शहर, बिना नक्शे का शहर, आदि-- के वर्णन सुनाता  है. अंत में  कुब्ला खान  उससे कहता है कि तुमने बहुत से शहरों का ज़िक्र तो किया लेकिन वेनिस के बारे में कुछ नहीं बताया. मार्को पोलो  जवाब देता है, ‘हुज़ूर, ये सभी शहर वेनिस के भीतर ही हैं!’ ज्ञानरंजन की कहानियों में इलाहाबाद वेनिस की तरह है. उनसे कोई पूछता तो वे गाब्रिएल  गार्सीया मार्कस की तरह कह सकते थे कि मैं अमरुद की खुशबू से ही अपने शहर को अभिव्यक्त कर सकता हूँ!

   बहरहाल, ज्ञान भाई जब भी इलाहाबाद आते, उनकी शामें और कभी-कभी दोपहरें भी हमारे साथ बीततीं. हमारे यानी वीरेन डंगवाल, मैं, कभी नीलाभ, जबलपुर से इलाहाबाद आये मनोहर नायक और अभिनेता-गायक विश्वमोहन बडोला की सांगत  में, जो तब ‘नार्दर्न  इंडिया पत्रिका’ में समाचार सम्पादक थे और मुझे सहयोगी हिंदी अखबार ‘अमृत प्रभात’ में ले गए थे. वीरेन विश्वविद्यालय  का एक सुस्त किस्म का शोध-छात्र था और हम एक ही घर में संयुक्त रूप से रहते थे. इलाहाबाद में हम साहित्यिक पुरोधाओं से दूर बेगाने से फिरते थे और  सिविल लाइन्स में नीलाभ के प्रकाशन में बैठते या कभी-कभी  बड़े चर्च की मुंडेरों पर मद्यपान भी करते. उन दिनों कवि-आलोचक, परिमल के सक्रीय सदस्य और अंगेजी के प्रोफ़ेसर विजयदेव नारायण सिंह की बहुत धाक थी. एक दिन उन्होंने मुझे इशारे से बुलाया और कहा,’ भई, आप कतराते क्यों रहते हैं? मैंने अभी एक पत्रिका में आपकी कवितायें पढ़ी हैं—ट्रेन में सात कविताएं’. फिर उन्होंने मेरी तुलना शमशेर के युवा दिनों से की तो मैं झेंप गया और सर नीचा किये मुस्कुराता रहा. इलाहाबाद की मशहूर परिमल मंडली  बिखर चुकी थी   और प्रगतिशील लेखकों और उनके बीच के द्वंद्व  भी सिर्फ खुमारी की तरह बच रहे थे.. वीरेन और मैं बुज़ुर्ग हो चुके परिमलियों और प्रगतिशीलों के सामने असहज और बच्चे ही बने  रहे. लेकिन जब ज्ञानरंजन आते तो इलाहाबाद हमारे लिए अत्यंत सुगम, सरपट और जीवंत हो उठता. अक्सर शामों को हम लोग कॉफ़ी हाउस  के इर्द-गिर्द या नीलाभ प्रकाशन में या उसके सामने सड़क की पटरी पर बैठे रहते जहां कोई नीम के पेड़ों से गिरी हुई पत्तियों की ढेरियों को सुलगा देता और उनसे उठता हुआ मंद, कसेला और मादक धुंआ नथुनों में भरता रहता. तब इलाहाबाद का सिविल लाइन्स  आज की तरह भद्दा, इमारतों से दबा हुआ और घुटन-भरा नहीं बल्कि उन्मुक्त था. कहते हैं, अंग्रेजों ने इस शहर को बसाने, उसकी सडकों को समान्तर बनाने में करीब चार सौ गाँवों को उजाड़ दिया था ताकि वे एक सुन्दर  सुनियोजित शहर का मज़ा ले सकें  सकें. पास में ही वह बड़ा सा पथरीला चर्च था जो अक्सर सुनसान रहता था और अपनी चट्टानी खामोशी और भव्यता  के साथ सिविल लाइन्स को एक रहस्यमयता देता था.

‘पहल’ सिर्फ एक पत्रिका के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘पुस्तक’ के रूप में शुरू हुई. उसका नीति-वाक्य था: ‘इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक’. अर्थात वह एक अलग किस्म की पत्रिका थी. उसमें छपने का अर्थ था गंभीर, प्रगतिशील और जन-सरोकारों के प्रति सजग लेखन के संसार का  प्रवेश पत्र हासिल करना. एक लम्बे समय तक ‘पहल’ में प्रकाशित होने वाली कवितायें उनके रचनाकारों को गर्वोन्नत  किये रहीं..एक उदाहरण सन १९७८ में ‘इस नवान्न में’ शीर्षक से प्रकाशित ‘पहल’ का वह अंक है जिसमें हिंदी, मराठी, पंजाबी और बांगला के बहुत से कवियों की उत्कृष्ट रचनाएं पहली बार प्रकाशित हुईं और जो इतने वर्ष बाद भी समकालीन कविता का बेहतरीन चयन माना जाता है. वीरेन डंगवाल की ‘रामसिंह’, असद जैदी की ‘बहनें’, अरुण कमल की ‘उर्वर प्रदेश’, वेणुगोपाल की ‘हवाएं चुप नहीं रहतीं’, आलोकधन्वा की ‘कपडे के  जूते’ आदि सामने आयीं और जल्दी ही बहुत चर्चा का विषय बन गयीं. नक्सलवाद से प्रभावित पंजाबी और बांगला  कवि नवारुण भट्टाचार्य, कमलेश सेन, सुरजीत पातर, अमरजीत चन्दन, लाल सिंह दिल और  मराठी के दलित और प्रगतिशील कवि नारायण सुर्वे, नामदेव ढसाल आदि  की कविताओं के अनुवाद भी पहली बार आये.  यह सुरुचिपूर्ण अंक बहुत लगाव से और एक किताब जैसी सज्जा के साथ प्रकाशित किया गया था और बाद में वह एक स्वतंत्र पुस्तक भी बना. अंक की प्रक्रिया यह थी कि ज्ञानरंजन जबलपुर से रचनाओं की खेप भेजते और नीलाभ, वीरेन और मैं उसकी साज-सज्जा, लेआउट , प्रूफ आदि का काम देखते. ज्ञान भाई का सम्पादन अचूक और बारीक था: ज़रा सा देर होने पर वे हम लोगों को डांट  भी पिलाते और हम बुरा माने बगैर उनकी बात को शिरोधार्य करते. उनका करिश्मा ही ऐसा था. डांट और करिश्मे की यह रवायत आज भी जारी है. 

   ज्ञानरंजन क्लासिकी ढंग के सम्पादक हैं. उन्हें देखकर पुराने संपादकों महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर  विद्यार्थी और खुद ज्ञानरंजन के पिता और उर्दू की महान शायरी को हिंदी में उपलब्ध कराने वाले  विद्वान रामनाथ सुमन की शैली की कल्पना की जा सकती है. पुराने और मानवतापूर्ण उद्देश्यों से जुड़े संपादको की तरह ज्ञानरंजन भी ‘पहल’ की रचनाएं मंगाने, चयन, रचनाओं पर टिप्पणियाँ लिखने  और सम्पादन करने   से लेकर उसके अंकों के पैकेट तैयार करने , उन्हें सुतली से बांधने  और पते लिखने का काम अपने हाथ से करते रहे और जहां तक संभव हो, आज इस उम्र में भी करते हैं. इस तरह इस काम से एक पुराने किस्म की पवित्रता, एक महती उद्देश्य के प्रति समर्पण की भावना भी जुडी होती है. ‘पहल’ रचनाओं के साथ सम्पादकीय टिप्पणियों के लिए भी मशहूर रही है और कई दूसरी पत्रिकाओं ने उन तेज़, कसी हुई और कई बार ‘मूल्य-निर्णय’ करती टिप्पणियों की नक़ल करने की कोशिश की. ज्ञान किसी अच्छी रचना का कितनी दूर तक पीछा कर सकते हैं, इसका एक ही उदाहरण काफी होगा: ‘पहल’ के इसी अंक के लिए जब आलोकधन्वा ने कई आश्वासनों के बाद भी कविता नहीं भेजी तो ज्ञान और वीरेन डंगवाल को लेकर पटना गए और आलोक की डायरी को छान कर एक लम्बी कविता ले आये. आलोक कहता रहा कि कविता अधूरी है, पूरी करके भेजूंगा, लेकिन ज्ञान नहीं माने और वह कविता ‘कपडे के जूते’ आज आलोक की बेहतरीन कविताओं में गिनी जाती है.

    ज्ञान भाई ने कुल २५  कहानियोँ के बाद  लिखना क्यों बंद कर दिया? शायद ही कोई साहित्यकर्मी होगा जिसके दिमाग में यह सवाल न उठा हो. बहुत से लोग अब भी उम्मीद करते हैं कि वे  फिर से लिखना शुरू कर देंगे. लेकिन क्या उनके न लिखने की वजह यह थी कि वे ‘पहल’ के संपादन में इस क़दर लिप्त हो गए थे कि कहानी उनकी प्रमुखता नहीं रही? क्या वे इतनी जल्दी चुक गए थे या उन्हें यह यकीन हो गया था कि वे २५ प्रतिमान निर्मित कर चुके हैं जिनके बूते हमेशा प्रासंगिक बने रहेंगे?  कुछ अतिरंजना के बावजूद, यह सही है कि ‘अमरुद का पेड़’, ‘फेंस के इधर और उधर’, ‘पिता’, ‘संबध ’, ‘शेष होते हुए’, ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’ और ‘अनुभव’ से आगे की कहानी हिंदी में लिखी नहीं गयी है और इसीलिये ज्ञान का कथा-संसार अब भी जगमगाता हुआ दिखाई देता है, लेकिन यह भी सच है कि वे खुद   अपनी कहानियों की भाषा और संरचना को तोड़ने, उसके पार जाने  में असमर्थ रहे हैं. पूछने पर ज्ञान कोई ठोस कारण नहीं बताते. एक बार उन्होंने कहा, ’मैं कागज़ के छोटे-छोटे पुर्जों पर  कुछ वाक्य लिखता जाता हूँ, उन्हें जमा करता जाता हूँ और कभी समय मिलने पर उनसे कहानी लिख देता हूँ और मुझे विश्वास नहीं होता कि मैंने कहानी लिख दी है. मेरे पास ऐसे बहुत से पुर्जे  जमा हैं और एक आधा-अधूरा उपन्यास भी है. संभव है कभी कुछ बन जाए.’

     ज्ञानरंजन की भाषा का जादू उनकी सम्पादकीय टिप्पणियों और उन संस्मरणों, आलेखों और बातचीतों में भी झांकता है जिनका एक बड़ा हिस्सा ‘कबाडखाना’ में संकलित है. उन्हीं में इलाहाबाद का खाका—‘तारामंडल के नीचे एक आवारागर्द’-- भी है जो शायद किसी शहर पर लिखे हुए सबसे अधिक मर्मभेदी और रोमांचक व्यक्ति-चित्रों में गिना जाएगा: ‘हमने असंख्य बार शहर की परिक्रमा की. चप्पे-चप्पे को पददलित किया. और हम कभी ऊबे नहीं, कभी हमारा मन भरा नहीं. जिस तरह रोटी-दाल खाते-खाते हम कभी ऊबते नहीं. कई बार दिन और रात हमारी परिक्रमाओं के इतने सुनसान होते थे कि हमें अपने पदचाप सुनने के अलावा कोई ध्वनि तंग नहीं करती थी. इस तरह हमने अपने युवावस्था में अपने शहर को, सब कुछ छोड़छाड़ कर केवल प्यार किया. ऐसी दुकानें थीं, ऐसे ढाबे, ऐसे गुमटियाँ थीं, ऐसे रेस्तराँ जिनमें हमें उपभोक्ता नहीं स्वामी समझा जाता था. ऐसे-ऐसे घर थे जहाँ हम मेहमान नहीं घर के सदस्य थे. चूँकि हम हर समय शहर में उपस्थित रहते थे इसलिए हमसे अधिक विश्वसनीय कोई नहीं था. ऐसा भ्रम हो सकता था कि हमारी जेबों में मजे के पैसे हैं पर वास्तविकता यह थी कि हमारी जेबों की सिलाई ही उखड़ी हुई थी.’ 

    कहानियों के ज्ञानरंजन विन्यास में तोड़फोड़ करती  हुई, कसी हुई और छलाँग लेती हुई और बड़ी विडंबनाओं का वस्तुपरक,  काव्यात्मक संक्षिप्ति के साथ बखान करती भाषा के करिश्माई हैं. यहाँ विभिन्न  कहानियों से लिए हुए कुछ अंश गौरतलब हो सकते हैं : ‘यह एक दुखद और हैरतभरा अनुभव था कि स्‍थानों से निकलते हुए लगा कि उन्‍हें चीरना पड़ रहा है.’,’मुझे शक हो रहा था कि जरूर शहर पर कोई साया पड़ गया है और पट-परिवर्तन हो गया है.’, ‘मैं अपनी अशांति को किसी दार्शनिक भाले से नहीं भेदना चाहता था.’ ‘यह सड़क बहुत प्रकृतिपूर्ण थी, कोई फ़ौजी इधर से नहीं गुज़रता था.’ ‘’‘मैंने महफिल में दो दर्जन से अधिक शेर सुना दिये. शेर न मालूम कहाँ से चींटों की तरह एक के बाद एक निकले चले आ रहे थे.’ ‘साहित्य उसे बवासीर की तरह परेशान  करता था’, ‘छत्ते की तरह नशा शरीर में छना हुआ था और शरीर  वृक्ष की तरह बिना गिरे झूम रहा था.’, ‘दिमाग में कोई अज्ञात और गुपचुप तरीका चल रहा थ.’, ‘उन्होंने मनोहर को उस ऊंचाई तक पंहुचा दिया जहां ज़िंदगी बेयरा की तरह उसके कटोरे में शोरबा परोस रही थी.’ ‘वह चली गयी. उसने  सुधा को पहले पोर्च में, फिर लॉन से बाहर और अंत में सड़क की पटरी  पर देखा.’ निश्चय ही यह आमफहम  कथा-भाषा नहीं है और उसकी अन्तः--प्रेरणाएं और संक्षिप्तता कविता से आयी  हैं. अगर यह कहा जाए कि ज्ञानरंजन कहानी में कविता लिखते हैं तो अतिरंजना नहीं होगी. क्या यह भाषा ज्ञानरंजन को किसी विरासत में मिली या या उन्होंने इसे अर्जित किया है? शायद नहीं. यह उनकी ईजाद की हुई भाषा है. जैसे कोई कीमियागर नीम-अँधेरी प्रयोगशाला में बैठ कर विभिन्न रसायनों को आजमाता है  है और पाता है कि अचानक एक नया रसायन प्रकट हो गया है. ज्ञानरंजन  का गद्य इसी तरह का ‘यूरेका!’ गद्य है जो अपनी दीप्ति से चमत्कृत करता है और बहुत कम शब्दों में एक पूरा संसार समेट लेता है. क्या इसका  कारण यह है कि ज्ञान कविता के एक सघन पाठक हैं? आज के ज़्यादातर कहानीकारों को कविता से विरक्ति और कई बार अरुचि भी है. राजेन्द्र यादव का कविता-विरोध  तो बहुचचित रहा है. लेकिन ज्ञानरंजन के लिए वह एक  ज़रूरी खुराक है. फेदेरीको गार्सिया लोर्का, नाजिम हिकमत, पाब्लो नेरूदा, निकानोर पार्रा, मीरोस्लाव होलुब  आदि उनके प्रिय कवि रहे हैं, और खुद उनके शब्दों में, ‘कहानी लिखने का मूड बनाने के लिए मैं अक्सर जोर-जोर से  कविता पढ़ना शुरू कर देता हूँ.’ बहुत से लोगों ने उन्हें ठाकुर प्रसाद सिंह का एक मार्मिक  गीत भी गाते सुना होगा जो लोक-संवेदना से प्रेरित है: ‘पर्वत के पार से बजाते तुम बांसुरी/ पांच जोड़ बांसुरी/ वंशी-स्वर उमड़-घुमड़ रो रहा/ मन उठ चलने को हो रहा/ धीरज की गाँठ खुली लो लेकिन/ आधे अंचरा पर पिय सो रहा.’ 

       ज्ञानरंजन  की कला के सिलसिले में एक तुलना शायद मौजूं होगी: उनकी ट्रेड मार्क बन चुकी  कहानी ‘घंटा’ एक कस्बे में एक सम्पन्न किस्म के छद्म बौद्धिक डॉन कुंदन सरकार और उसके द्वारा बनाए जाने वाले ‘चेला-समुदाय’  की कहानी है. आवारा लोगों के अड्डे पेट्रोला का निवासी कथा-नायक कुछ दिन उसकी ऐयाशी के फेर में फंस कर आखिरकार विद्रोह कर बैठता है और अपमानित होकर वापस पेट्रोला में लौट आता है. दूधनाथ सिंह का  लघु-उपन्यास ‘नमो अन्धकारम’ भी लगभग इसी कथा-भूमि पर बुना गया है, लेकिन ज्ञान १०-१२ पन्नों की कहानी में जिस विद्रूप यथार्थ और छूंछे प्रतिरोध की प्रतिष्ठा करते हैं और उसे जो समकालीन सामजिक आयाम देते हैं, वह  दूधनाथ सिंह की रचना करीब ९० पन्नों में भी  नहीं कर पाती. ज्ञान की कहानी वर्णित यथार्थ के परे चली जाती है, लेकिन दूधनाथ का उपन्यास उसी यथार्थ में घिसटता रहता है, उपन्यास के नामों को सर्वनाम में तब्दील नहीं कर पाता. दोनों लेखकों की  रचनाएं  समाज के वासतविक चरित्रों से प्रेरित रही होंगी , लेकिन ज्ञान के यहाँ उन्हें कहानी से बाहर वासतविक संसार में व्यक्ति रूप में पहचानना कठिन है जबकि दूधनाथ अपने चरित्रों को अतिक्रमित नहीं कर पाते.

   ‘अतिक्रमण’ शायद ज्ञानरंजन की रचना प्रक्रिया को बतलाने  के लिए सही शब्द है. वे यथार्थ के अतिक्रमणों के रचनाकार हैं. और इसीलिये भोगे हुए यथार्थ को ‘भोग हुआ’ नहीं रहने देते, बल्कि उसका कायांतरण कर देते हैं, उसे अपने समय के एक विचार, एक चिंतन और सत्य में बदल देते हैं. कहां जाता है कि महान रूसी लेखक लेव तोल्स्तोय की कोई कृति ऐसी नहीं है जो वास्तविक चरित्रों पर आधारित न हो, लेकिन वे सब इस कदर रूपांतरित हो गए हैं कि उन्हें भाषा से बाहर पहचाना नहीं जा सकता.. यहाँ तोल्स्तोय से तुलना करना मकसद  नहीं है, सिर्फ उस कीमियागरी की ओर संकेत  करना है जहां बड़े लेखक एक समान धरातल पर मिलते हैं. उनकी कहानियों की पहली किताब ‘सपना नहीं’  के शुरू में अल्लामा इकबाल का एक शेर उद्धृत किया गया था जो रचना के लिए अतिक्रमण की बुनियादी शर्त की ओर संकेत करता था: 

‘तू बचा-बचा के न रख इसे, तिरा  आइना है वो आइना

कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़तर है निगाहे-आइनासाज़ में.’  

     एक और कहानी  ‘बहिर्गमन’ के  बारे में एक धुंधला सा अनुमान है कि वह वास्तविक जीवन के दो  चरित्रों से अनुप्रेरित है, लेकिन कहानी उन चरित्रों को लांघ जाती है और अपने समय की  प्रतिनिधि,  उसे  परिभाषित करती हुई दो  प्रवृत्तियाँ  बन  जाती है. ‘अनुभव’ कहानी में हम एक शांत, मासूम और बेफिक्र शहर का  कायांतरण देखते हैं जहां आधुनिकता  के साथ अपराध, हत्या और रसातल का प्रवेश हो चूका है और पुराने दोस्त हत्यारे तक बन चुके हैं, कथा नायक हैरानी और हताशा  के साथ घूमता है और अंत में कुम्हारों के एक गरीब टोले से गुज़रता हुआ खुद को तमाचे  मारने लगता है. समाज के अमानुषिक होने की यह भीषण कथा ज्ञानरंजन की रचना प्रक्रिया का वह बिंदु भी पेश करती है जहां से एक अगली उड़ान, एक ‘टेकऑफ’ को संभव होना था: ‘मैं बीच सड़क पर बैठ गया. यह सब देखकर मुझ पर भीषण असर हुआ था. आज मेरा सीना यह सब देखकर भरभरा उठा. मैं रोज देखता था पर आज जैसे मेरा काबू नष्‍ट हो गया. मैंने पाया कि मैं सिसकने लगा हूँ और मेरी तबियत फूट-फूट कर रोने की हो रही है. मैं अपना नाम लेकर अपने को पुकार रहा था. 'थू है तुम्‍हारी जिंदगी को, तुम पत्‍थर हो गये हो. ये देखो, ये असली शहर है, असली हिंदुस्‍तान, इनके लिए तुम्‍हारा दिल हमेशा क्‍यों नहीं रोता है.' फिर मैंने खड़े होकर अपने गालों पर तमाचे मारने शुरू कर दिये. जब मैं तमाचे जड़ रहा था तभी सोये हुए व्‍यक्‍तियों में से एक पलकें मलता हुआ उठा और पूछने लगा, 'क्‍या बात है बाबूजी.’ वह मोहन कुम्‍हार था.  मैंने उससे कहा, 'कुछ नहीं, कुछ नहीं. सो जाओ मोहन, मेरे पेट में बड़े जोर से शूल उठा था, इसलिए बैठ गया था. अब ठीक है.'

   इस कहानी के बाद ज्ञानरंजन  कोई नयी कहानी नहीं लिख सके. क्या इसलिए कि कथा नायक जिस विद्रूप और अमानुषिकता का सामना करता है, वह एक विचलित करने वाला ऐसा परिदृश्य है,  ऐसी हताशा, जिसे अतिक्रमित करके ही आगे की, किसी दूसरे यथार्थ की, कुम्हार टोले में बसने वाले ‘असली हिंदुस्तान’ की कथा लिखी जा सकती थी. लेकिन ज्ञानरंजन  शायद यह सोच कर दूसरे रास्ते की तरफ मुड गए कि इस तरह उस भयावहता का सामूहिक स्तर पर प्रतिकार  किया जा सकेगा. और वह रास्ता था—‘पहल’ के सम्पादन और प्रकाशन का. ‘एक महादेश की वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक’ को प्रस्तुत करने का प्रयास, जो शायद जल्दी ही अपने १२५  अंकों के पार कर लेगा. अमीन!

(मंगलेश डबराल की फेसबुक वाल से साभार)