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मड़ईः किस्सा-कहिनी के नंदावत परंपरा...

मड़ईः किस्सा-कहिनी के नंदावत परंपरा...

 सुशील भोले

हमन जब लइका राहन त अपन महतारी के मुंह ले एक ले बढ़के एक किस्सा कहिनी सुनन. मोला सुरता हे, हमर महतारी जब रायपुर ले हमर गाँव नगरगांव जावय, त पारा भर के माईलोगिन मन वोकर जगा जुरिवा जावंय. रोज संझा हमर घर के चौंरा म पारा भर के माईलोगिन मन के संगे-संग अउ कतकों लइका अउ सियान जुरिया जावंत, तहांले एक ले बढ़के  एक कहानी के दौर चलय.

हमूं मनला ताज्जुब लागय, काबर के हमर महतारी पढ़ई लिखई के नांव निरक्षर रिहिस, फेर किसम किसम के कहिनी अउ लोकगीत मन के खदान रहिस. रोज नवा कहानी सुनावय. परब अउ संस्कार ले संबंधित लोकगीत घलो सुनावंय.

रायपुर म घलो ए परंपरा चलय. कमरछठ अउ अगहन बिरस्पत जइसन परब म तो हमर पारा के महराज ह हमर घर नरियर धर के आवय, अउ महतारी ल सगरी ठउर म आके कहिनी सुनाय बर अरजी करय.

पहिली हर घर म अइसन नजारा देखब आ जावय. घर के सियान सियानीन मन अपन नाती नतनीन मनला किसम किसम के कहिनी सुनावत रहंय. फेर अब ये परंपरा कोनो कोनो घर म भले दिख जावत होही, फेर जादा करके ए परंपरा ह लगभग नंदाइच गे हे.

एकर सबले बड़े कारण तो मनोरंजन के नवा नवा साधन के आविष्कार आय, फेर समाज ले विलुप्त होवत संयुक्त परिवार के परंपरा ह घलो एकर बड़का कारण आय. संयुक्त परिवार म लइका मन अपन घर के सियान मन ले किस्सा कहिनी के संगे संग अपन परंपरा अउ संस्कार ल घलो सीख जावत रहिन हें, जे ह एकल परिवार के चलागन ले नंदावत जावत हे.

मैं ह इहाँ के मूल संस्कृति ऊपर सरलग बुता करत हंव. हमर मूल संस्कृति अउ परंपरा के धीरे धीरे नंदई अउ बिगड़ई म घलो इही संयुक्त परिवार के बिखरई ह घलो एक बड़का कारण के रूप म दिखथे. काबर के हम अपन पुरखा मनले अपन संस्कृति परंपरा ल तो सीखेच नइ पावत हवन, तेकर सेती दूसर मन के देखिक देखा उंकर मन के परंपरा अउ संस्कृति ल अपना लेथन.