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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः किसी पुरानी बखरी में

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः किसी पुरानी बखरी में


जीने-मरने वालों की बस्ती में

जीने-मरने वाले पैदा होते हैं

एक-दूसरे में जीवन को बोते हैं

एक-दूसरे के मरने पर रोते हैं


वे नये-नये पत्तों-से होते हैं

वे नये-नये फूलों से होते हैं

वे नये-नये शूलों-से होते हैं

वे नयी-नयी भूलों-से होते हैं


किसी पुरानी बखरी में

नये ज़माने वाले होते हैं

किसी नयी नगरी में

खूब पुराने वाले होते हैं


कई नसीबों वाले होते हैं

कई मसीहों वाले होते हैं

कई रक़ीबों वाले होते हैं

कई हबीबों वाले होते हैं


अपनी-अपनी काया से

अपना-अपना परिचय देते

कहीं दूर से उन्हें

बदलने वाले पैदा होते हैं


जो चलते उन के साथ

उन में अपनापन बोते हैं

फिर भले अकेले में रोते हैं