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ये भी आपातकाल ही है.. रातोंरात शव को जला देना या बलात्कार पीड़िता के परिवार से ना मिलने देना भयावह दौर है

ये भी आपातकाल ही है.. रातोंरात शव को जला देना या बलात्कार पीड़िता के परिवार से ना मिलने देना भयावह दौर है

पूर्व भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के एक​ टिवट ने केन्द्र सरकार की नीतियों पर प्रश्नचिहन खड़ा कर दिया है. उन्होंने अपने टिवट में कहा कि मोदी सरकार के पैदा किए हालात आपातकाल से भी खराब हैं. इसके बाद सिन्हा के समर्थन में अनेक बुद्धिजीवी उतर आए. मोदी सरकार के फैसलों पर प्रश्नचिहन भी उठाए जा रहे हैं. सिन्हा ने आगे कहा कि देश की जनता मोदी सरकार के कार्यों की वजह से असुरक्षित महसूस कर रही है और सरकार ने लोकतंत्र के मंदिर को ‘नष्ट’ कर दिया है. सिन्हा ने आरोप लगाया, ‘मोदी सरकार ने जो हालात पैदा किए हैं, वो इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल से भी बुरे हैं.'

संसद के बजट सत्र में कोई कामकाज नहीं होने का जिक्र करते हुए सिन्हा ने दावा किया कि मोदी सरकार संसद को सुचारू तरीके से नहीं चलने देना चाहती थी क्योंकि वह विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव का सामना नहीं करना चाहती थी. सिन्हा की इस टिप्पणी के बाद मोदी सरकार की जमकर आलोचना हो रही है. सिन्हा के समर्थन में कई बुद्धिजीवी खड़े हो गए.

दुष्यंत कुमार का एक शेर : ये मत कहो की बादलों में कोहरा घना है ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.

आपातकाल के समय कहा गया यह शेर आज के समय भी मौजूं है। आपातकाल के समय तो लोगों को पता था कि उन्हें किसलिए गिरफ्तार किया जा रहा है पर आज तो लोग ये भी नही जान नही पा रहे हैं कि उन्हें किस जुर्म में फंसा दिया जाये। आज के हालात आपातकाल से भी बदतर दिखलाई देते हैं. आत्मनिर्भर भारत की दुहाई देने वाली सरकार कोई अपने उपर आने वाली आपदा को अवसर में तब्दील कर ऐसा कुछ कर रही है कि लोग अपनी जुबॉं सिल लें, चुप रहें और कहें कि सरकार जो भी कर रही है, वो सबसे अच्छा है।

'रातोंरात शव को जला देना या बलात्कार पीड़िता के परिवार से ना मिलने देना आपातकाल ही तो है'


दिल्ली दंगों में सामाजिक कार्यकर्ता तो दूर योगेंद्र यादव से लेकर सीताराम येचुरी जी तक को लपेटते हैं, पर फिर भी ये आपातकाल का दौर नहीं है! भीमा कोरेगांव केस के नाम पर बुद्धिजीवियों के साथ जो हो रहा, फिर भी ये आपातकाल का दौर नहीं है! यूपी में राहुल गांधी तक प्रवेश नहीं कर सकते पर ये आपातकाल का दौर नहीं है! एक के बाद एक किसान विरोधी-श्रम विरोधी कानून आते जा रहे हड़ताल प्रदर्शन धरने पर रोक लगाई जा रही पर ये आपातकाल का दौर नहीं है!

क्या 1977, 1998, 2014, 2019 से लेकर अब तक क्या वाकई लोकतंत्र का दौर है? 2014 से 2020 छोड़िये, हर दिन आप खुद एक लोकतन्त्र का एक नया मज़ा और नया अनुभव ले रहे हैं. 1977 की ही बात कर लें. 1977 में दिल्ली-मुंबई मीडिया मालिक तब भी नागपुर के सामने घुटने टेके हुए थे, यहाँ तक कि इनके मुखपत्र का प्रकाशन ही नहीं प्रचार-प्रसार भी देश का सबसे बड़ा अखबार करता था. उस दौरान जब प्रेस का गला घोंटा जा रहा था तब कथाकार कमलेश्वर ने चंद्रशेखर से सवाल किया था, 'क्या आपातकाल के बाद ये हिंदूवादी आपातकाल जारी रहेगा और लेखक पत्रकारों की ये साज़िश-भरी हत्याओं का सिलसिला चलता रहेगा ? इसका चंद्र शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया था.

कमलेश्वर ने यह भी लिखा है कि दूसरी आज़ादी के जनक, लोकनायक, लोकतंत्र के संस्थापक-संरक्षक को इस बारे में पत्र दिया गया तो उन्होंने पत्र लेने से ही इंकार करवा दिया था और एक गहरा शून्य व्याप्त था. ख़ैर..! इन सब बातों को भूलकर अगर किसान विरोधी क़ानून के जवाब में छत्तीसगढ़ की सरकार किसानों को बचाने नया कानून लाती है, देश में पहली बार पत्रकार सुरक्षा कानून बनाकर लागू ही करने वाली है, वो सरकार जनतंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन है. बीजेपी सरकार के दौर में विख़्यात वामपंथियों पर दर्ज़ हत्या के केस को भूपेश सरकार बनते ही वापिस लेती है तो ऐसे लोग लोकतंत्र के सबसे बड़े दुश्मन हैं, ठीक है न तात!
 
हे तात, आप भी रामनामी टाइप मंजीरे बजायेंगे उम्मीद न थी. उम्मीद तो ये थी आप सीताराम की तरह बोलते!
'काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' शर्म तुम को मगर नहीं आती'