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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-पार्टी कार्यकर्ता, प्रवक्ता में तब्दील होते मीडिया के लोग

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-पार्टी कार्यकर्ता, प्रवक्ता में तब्दील होते मीडिया के लोग


 रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद मीडिया और राजनैतिक क्षेत्र में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। बहुत से मीडिया हाउस और पत्रकार जो अर्नब की एकतरफा पत्रकारिता और तौर तरीकों से नाखुश थे, उन्होंने इस कार्यवाही का तटस्थता दिखते हुए भी समर्थन किया है, वहीं दूसरी ओर भाजपा और उससे जुड़ी लॉबी के लोगों ने इसे पत्रकारिता पर हमला करार किया है। पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है, उसकी हालत भी बाकी तीन स्तंभों की तरह होती जा रही है। हमारे बाकी तीन स्तंभ जिनमें कार्यपालिका और विधायिका से जुड़े लोग अपने लाभ के लिए अपनी वैचारिकता, निष्पक्षता और ईमानदारी को किनारे रखकर आचरण करते दिखते हैं। वहीं आजकल न्यायपालिका के फैसलों पर भी प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं। प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ की वजह से हमारी प्रजातांत्रिक संस्थाएं धीरे-धीरे अविश्वसनीय होती जा रही है। इस संकट के समय में सत्ता और उससे जुड़े प्रतिष्ठान, हित समूहों द्वारा अलग-अलग तरीके से प्रतिरोध स्वर को दबाने की कोशिश करते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें किसी भी तरीके का इस्तेमाल क्यों ना करना पड़े। बहुत बार अपने छोटे-छोटे लाभ, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और जल्दी प्रसिद्घि के फेर में बहुत से ऐसे लोग भी आ जाते हैं जिन पर प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा और संतुलन को बनाए रखने की जवाबदारी है। यह विश्वसनीयता के संकट का समय है। यह बड़बोलेपन और जरुरी मुद्दे से भटकाव का समय भी है। जो चिल्ला-चिल्लाकर पूछते हैं कि भारत जानना चाहता है, दरअसल उनका भारत और उनकी जनता बहुत ही चुनिंदा है।

ऐसा माना जाता है कि पत्रकार को निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन आज पत्रकार अलग-अलग खेमों, दलों में इधर के सालों में बंटकर रह गए हैं। एक पत्रकार को निष्पक्ष होना चाहिए, निष्पक्षता ही पत्रकारिता की पहचान हैं। अपने मीडिया समूह या अपनी वैचारिकता या किसी भी स्तर तक व्यक्तिगत लाभ के लिए जाने को तैयार हैं।

मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी को 53 वर्षीय इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नायक को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में बुधवार सुबह गिरफ्तार किया। यह गिरफ्तारी 2018 के एक मामले में हुई है। वर्ष 2018 के मई महीने में इंटीरियर डिजायनर अन्वय नाइक औऱ उनकी मां कुमुद नाईक ने अलीबाग के अपने घर में खुदकुशी की थी। मरने के पहले अन्वय ने खुदकुशी नोट छोड़ा था, जिसमें उन्होंने अपनी मौत के लिए 3 लोगों को जिम्मेदार ठहराया गया था। इनमे एक नाम अर्नब गोस्वामी का भी था। आरोप था कि अर्नब ने दफ़्तर का काम करवाने के बाद उनके 83 लाख नहीं दिए गए। अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर महाराष्ट्र सरकार में शामिल कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना ने स्वागत किया है, वहीं बीजेपी इसे तानाशाही बता रही है। आरोप है कि सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत को अर्नब ने मुद्दा बनाकर मुंबई पुलिस और ठाकरे सरकार को घेरना शुरू किया था। इसलिए बदले की भावना से सरकार ये कार्रवाई कर रही है।
प्रकाश जावड़ेकर ने गिरफ्तारी की खबर आने के बाद एक ट्वीट में कहा, हम महाराष्ट्र में प्रेस की स्वतंत्रता पर हुए इस हमले की आलोचना करते हैं। प्रेस का साथ बर्ताव करने का यह कोई तरीका नहीं है, इससे हमें इमरजेंसी के दिनों की याद आ रही है, जब प्रेस से ऐसा बर्ताव किया जाता था। इसके पहले अर्नब गोस्वामी ने अपने चैनल पर चीख-चीखकर महाराष्ट्र सरकार को बहुत से मामलों में घेरने की कोशिश की थी। बाद में उनका चैनल टीआरपी के हेरफेर में फंसा था, जिसके लिए वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और पुलिस कमिश्नर को सरेआम अपने चैनल पर कोसते रहते हैं। अर्नब गोस्वामी की पत्रकारिता के तौर तरीकों को लेकर इस समय मीडिया जगत में बहुत हो हल्ला और आलोचना होती रही है।
न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी की मुंबई में हुई गिरफ्तारी के तरीके की निन्दा की और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से यह सुनिश्चित करने की अपील की कि पत्रकार के साथ उचित व्यवहार हो तथा सत्ता की शक्ति का दुरुपयोग बदला लेने के लिए न किया जाए। एनबीए ने यह भी कहा कि यद्यपि वह गोस्वामी की ''पत्रकारिता शैलीÓÓ से सहमत नहीं है। अर्नब की गिरफ्तारी के बाद महाराष्ट्र सरकार भारतीय जनता पार्टी और विपक्षियों के निशाने पर है।  बीजेपी नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों ने इस कार्रवाई की तुलना साल 1975 में तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी और उस दौरान पत्रकारों के खिलाफ हुई एकतरफा कार्रवाई से की है।  

इस समय मीडिया में एक शब्द सर्वाधिक चलन में है जिसे गोदी मीडिया कहा जाता है। मीडिया के जरिये इस समय जितनी साम्प्रदायिकता, जातियता और धार्मिकता, अंधविश्वास, हिंसा, नग्नता फैलती जा रही है, उतनी लोगों को पहले देखने को नहीं मिली। मीडिया का चरित्र पूंजी आधारित चरित्र हो गया है। फिल्म एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद से अपने बयानों के लिए चर्चा में आई अभिनेत्री कंगना रानौत ने ट्वीट करके अपने वीडियो में कहा है कि मैं महाराष्ट्र सरकार से यह कहना चाहती हूं कि आज मुंबई पुलिस ने अर्नब गोस्वामी को उनके घर में जाकर मारा है, उनके बाल नोचे हैं। उन पर हमला किया है।  

ऐसा कहा जाता है कि आजादी के समय पत्रकारिता मिशन थी, लेकिन अब यह व्यवसाय का रूप ले चुका है। सत्ता का अपना एक चरित्र होता है, कमियां और खामियों को उजागर करने का काम पत्रकारिता के माध्यम से होता है। पत्रकारिता को निर्भीक एवं निष्पक्षता के साथ होना चाहिए। पत्रकारिता को जनता से जुड़े जरुरी मुद्दे उठाना चाहिए। पत्रकारों को ग्रामीणों व किसानों की आवाज को प्रमुखता से उठाया जाना चाहिए। पत्रकार को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए बल्कि दिखना भी चाहिए।

निष्पक्ष या तटस्थ पत्रकारिता का मतलब तथ्य और सत्य के साथ खड़े होना है। इसे जनपक्षधरता भी कहा जाता है। पत्रकार सिर्फ डाकिया नहीं होता कि जो इधर की सूचना या जानकारी को लेकर अपने पत्र-पत्रिका, समाचार चैनल, वेबसाइट इत्यादि के जरिए दूसरी तरफ पहुंचा दे। उसकी यह भी जवाबदारी है कि वह तथ्यों और अनुभव, समझदारी के साथ सारी बातों की पड़ताल कर अपनी खबर दे।  यह सूचना समर का समय है, इस समय खबरों की बाढ़ सी आई हुई है। सोशल मीडिया के इस दौर में खबरों, घटनाओं के खुलासे और मुद्दों पर विमर्श पर बड़े मीडिया समूहों का एकाधिकार खत्म होता जा रहा है। हाल ही सत्ता प्रतिष्ठान को अखरने वाली कई खबरें जिन्हें कथित मुख्यधारा के मीडिया ने छापने या दिखाने की हिम्मत नहीं दिखाई, लेकिन बाद में इंटरनेट मीडिया में सामने आने के बाद उसे सामने लाना उसकी मजबूरी हो गई।    
पत्रकारिता को लेकर समय-समय पर जो महत्पूर्ण कोटेशन, बातें कही गई है

उनमें 'पत्रकारिता वह चीज है जो लोकतंत्र को चलाए रखने के लिए जरूरी है। -वाल्टर क्रोनकाइट
पत्रकारिता में आपकी जान जा सकती है। लेकिन जब तक आप इसमें है यह आपको जिंदा रखेगी-होरैस ग्रीले
मेरा अब भी मानना है कि यदि आपका लक्ष्य दुनिया बदलना है तो पत्रकारिता इसके लिए एक फौरी अल्पकालीन औजार है।-टॉप स्टोपर्ड
खबर वह होती है जिसे कोई दबाना चाहता है। बाकी सब विज्ञापन है। मकसद तय करना दम की बात है। मायने यह रखता है कि हम क्या छापते हैं और क्या नहीं छापते-कैथरीन ग्राहम
लोकतंत्र की सफलता या विफलता उसकी पत्रकारिता पर निर्भर करती है। -स्कॉट पेली
पत्रकारिता में हम लोकप्रियता बटोरने नहीं आते। हमारा काम है सत्य की तलाश करना और जवाब पाने के लिए शासकों के ऊपर दबाव डालना।-हेलेन थॉमस