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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-भारतीय पत्रकारिता महोत्सव के मायने

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-भारतीय पत्रकारिता महोत्सव के मायने


मिनी बाम्बे, गाड़ी अड्डा, होल्करो की नगरी के रूप में अपनी पहचान रखने वाला इंदौर शहर भारतीय पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। जब बहुत सारी जगहों पर प्रेस क्लब कैरम अड्डो, दारू खानो और पत्रकारिता से इतर बहुत सारी गतिविधियों के लिए अपनी पहचान बना चुके हैं तब स्टेट प्रेस क्लब इंदौर अपने पुरखों को याद करने तीन दिवसीय भारतीय पत्रकारिता महोत्सव आयोजित कर रहा है, यह प्रशंसनीय और अनुकरणीय है। यह पत्रकारिता का भी कोरोना काल है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत सारे वायरस काली, नीली, मटमैली पूंजी और सत्ता की ताकत के साथ मौजूद है। जिस तरह खराब मुद्रा, अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है, उसी तरह बहुत सारी ताकतें गंभीर मीडिया से जुड़े गंभीर लोगों को हाशिये पर लाने में लगी है। सोशल मीडिया के जरिये इस हमले को और अधिक धारदार बनाया जा रहा है। 

जब हमें अंधेरे में कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है तो हम अपनी स्मृतियों की ओर लौटते है। हमारी स्मृतियों के संसार में हमे कुछ चमकदार रौशनी बिखेरते लोग दिखाई देते है, जो हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह महोत्सव एक तरह का मंथन शिविर भी है, जहाँ पर देशभर के पत्रकार एकत्र होकर उन सवालो से रूबरू होगें जिनको लेकर वे बेहद परेशान रहते है। मीडिया की लक्ष्मण रेखा क्या होनी चाहिए। टूटता भरोसा, बढ़ता गुस्सा के जरिये वे अपने ही कामो की आम आलोचना करेगें। महिलाओ से जुड़े मुद्दे, मीडिया शिक्षा, कोरोनाकाल और सोशल मीडिया जैसे बहुत से सवाल होगें, जिसके जवाब मिल बैठकर निकाले जायेगें। 

भारतीय इतिहास में यह दौर जितना राजनीतिक विडंबना और विपदाओं के लिए याद किया जाएगा, उतना ही मीडिया की गिरावट के लिए भी याद किया जाएगा। अपवाद छोड़ दिया जाए तो मीडिया की विश्वसनीयता सिर्फ संदिग्ध ही नहीं हुई है, बल्कि गुम भी हो चुकी है। जब एक आम आदमी भी कहने लगे कि फला चैनल देखने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि वह बिक चुका है, तो यह स्थिति मीडिया के लिए ना सिर्फ शर्मनाक है, बल्कि संपूर्ण मीडिया जगत के लिए अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए सोचने का एक अवसर भी मुहैया करा रही है। इस समय जब गोदी मीडिया कहा जाता है तो मीडिया के ईमानदार लोगों को बेहद शर्म महसूस होती है। यह शर्म ही उनकी बची हुई ईमानदारी का प्रमाण है। यह समय ईमानदारी को खत्म करने और हिम्मत को तोडऩे का है।

इस महोत्सव को पत्रकारिता के जिन महापुरुषों को समर्पित किया गया है वे तमाम लोग पत्रकारिता के ऐसे मील के पत्थर हैं, जो अपने समय में नहीं बल्कि काल को फर्लांग कर हर कालखंड में अपने कर्म, अपने लेखन की वजह से अपनी ईमानदारी और अपनी प्रतिबद्धता की वजह से कायम है। इनमें से कुछ महापुरुषों की अपनी राजनीतिक आस्था रही होगी, लेकिन उनकी राजनीतिक आस्था कभी भी उनकी पत्रकारिता की प्रतिबद्धता का अतिक्रमण नहीं कर पाई। यह बड़ी बात है। ये इतने बड़े मानक हैं कि इन के पार जाना आज की मीडिया के लिए बहुत मुश्किल लगता है, लेकिन इनके करीब भी यदि पहुंच पाए तो मीडिया अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा हासिल कर लेगा।

पहले मीडिया अधिकांश राजनीति को संचालित करता था। अब राजनीति मीडिया को संचालित ही नहीं कर रही है बल्कि धीरे-धीरे अपने कब्जे में ले रही हैं। यह स्थिति बाजार से भी ज्यादा खतरनाक है। बाजार सिर्फ मीडिया को अपने लिए इस्तेमाल कर रहा था वह भी मूल्य देकर, कोई दबाव नहीं था लेकिन अब भारी दबाव है।

बाजार के बारे में कहा जाता था कि विज्ञापन एक कारपोरेट कला ही नहीं है मीडिया और हमारे सूचना जगत का निर्माता हो चला है। खबर, विचार और मनोरंजन एक हो रहे हैं। बाजार खबर को विचार की तरह प्रस्तुत कर रहा है। यह दूसरी खतरनाक स्थिति है और विचार को रद्द करके मनोरंजन को प्राथमिकता दे रहा है।

21वीं सदी की शुरुआत में यह भी कहा जाने लगा था कि प्रिंट मीडिया टेलीविजन और साइबर स्पेसी मीडिया हमारे समाज के नए जन क्षेत्र बनाएगा। एक नए किस्म की स्वतंत्रता के भाव का उदय हुआ है। साइबर स्पेस पर कोई भी तानाशाह निर्णायक अंकुश नहीं लगा सकता। यह आजादी का ग्लोबल संस्करण है, जो साइबर स्पेस में मीडिया के आने के बाद पैदा हुआ है। लेकिन हुआ क्या है यह हम साफ-साफ देख रहे हैं। अंकुश लगाने के नए-नए तरीके खोजे जा रहे हैं, बल्कि खोज लिए गए हैं। सही गलत की परिभाषाएं बदली जा रही है। गांव में भी खबर और सूचना के लिए भूख बढ़ी है। जिसे टेलीविजन ने पैदा किया था और मीडिया के लिए नए जन क्षेत्र बनाए थे। टेलीविजन ने गांव के लोगों को भी ज्ञानवान चाहे ना बनाया हो लेकिन जानकार बनाने की कोशिश शुरू कर दी थी। जिसका परिणाम यह हुआ कि पुराने ढंग की राजनीति समाप्त होने लगी। राजनीति को भी बहुत जल्दी है समझ में आने लगा है कि गांव की राजनीति को भी मीडिया के जरिए संचालित और संतुलित किया जा सकता है। विचारधारा विशेष को भी इस तरह से स्थापित किया जा सकता है। राजनीति को यह जल्दी समझ में आ गया कि बाजार अपने लाभ के लिए यदि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का इस्तेमाल कर सकता है, तो राजनीतिक आग्रहों के लिए भी इसका इस्तेमाल बखूबी हो सकता है और इसका सफल दुष्परिणाम सामने है। चैनलों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए नीचे उतरना पड़ा है और पत्रकारिता मिशन नहीं रहकर प्रोफेशनल मजबूरी हो गई है।


इस महोत्सव में मुझे भी अपनी मन की बात कहने का अवसर मिलेगा। एक जनसंपर्क के अधिकारी होने के नाते इंदौर की पत्रकारिता और वहां के पत्रकारों से मिलने, सीखने और बैठकर बतियाने के बहुत से मौके मिले हैं। जब मै इंदौर को याद करता हूँ, तो मुझे मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग में सहायक संचालक पद के लिए हुआ अपना साक्षात्कार याद आता है। साक्षात्कार समिति में राहुल बारपुते और राजेन्द्र माथुर जैसे दिग्गज पत्रकार बैठे थे। पहले से कोई परिचय नही था, जो कुछ था अपना लिखा-पढ़ा और जीवन अनुभव। लंबे साक्षात्कार के बाद जब चयन सूची जारी हुई तो अपना नाम सबसे आगे देखकर लगा, चलो कुछ बोला गया, कुछ लिखा गया सार्थक हुआ। थोड़े दिन बाद ही व्हाया भोपाल-इंदौर पर पदस्थापना हो गई और वहॉ जनसंपर्क के पितृपुरूष, हमें पार्टनर कहने वाले बहुत ही आर्कषक और जीवंत व्यक्तित्व के धनी आर एस महेश्वरी जैसे बॉस के साथ काम करने मिला। उन्ही के साथ रहकर इंदौर और देश के बहुत से ख्याक्तिनाम पत्रकारों, लेखक से मुलाकात हुई। यही राहत इंदौरी मिले, प्रभु जोशी मिले, नईम साहब मिलें, रामविलास शर्मा मिले। व्यंग्य लेखक होने के नाते और हरिशंकर परसाई पर शोध की वजह से शरद जोशी जी से पहले से मिलना हो चुका था। इंदौर ने मुझे न केवल पोहे जलेबी, मावाबाटी, दाल बाफले का स्वाद चखाया बल्कि मुझे रवीन्द्र शाह जैसा दोस्त भी दिया, जो पत्रकारिता का एक विश्वसनीय नाम था। अफसोस वो हमें जल्दी छोड़कर चला गया।

यह आयोजन जिन लोगो को समर्पित है उनसे मेरी भी अच्छी खासी भेंट मुलाकात थी। इंदौर में ख्यातिनाम साहित्यकार प्रभाकर माचवे, नरेश मेहता ने भी पत्रकारिता को समृध्द किया है। इनके अलावा मुझे जवाहर लाल राठौर, विधाधर शुक्ला, जयकृष्ण गौड़, चांद साहब, विनय लाखे, शशीन्द्र जलधारी, शहिद मिर्जा, महेन्द्र बाफना याद आते हैं। जो अभी भी सक्रिय हैं, उनमें वेद प्रकाश वैदिक, श्रवण गर्ग, आलोक मेहता, प्रभु जोशी, प्रकाश हिन्दुस्तानी, राजेश बादल, जयप्रकाश चौकसे जैसे नाम शमिल हैं। इंदौर में पत्रकार मित्रों की लंबी सूची है नवनीत शुक्ला से लेकर कीर्ति राणा तक, आशुतोष बाजपेयी से लेकर दिलीप ठाकुर तक। 

इंदौर स्कूल आफ जर्नलिज्म अपने आपमें बहुत मायने रखता है। आज जब संपादक नामक संस्था लगभग खत्म सी हो रही है तब प्रभाष जोशी, राजेन्द्र माथुर, राहुल बारपुते याद आते हैं। आज इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिये बहुत से भ्रम जाल फैलाये जा रहे हैं। सच और झूठ क्या है, इसका फर्क करना मुश्किल हो गया है। यह हमारे सामाजिक सौहार्द को, भाईचारे को नुकसान पहुंचा रहा है। मीडिया के जरिये मनचाहा ओपनियन बनाने का एजेंडा काम कर रहा है। यह बताने की कोशिश की जा रही है कि यह देश और आजादी कुछ खास लोगो की वजह से है। नैतिकता की सबसे ज्यादा दुहाई देने वाला मीडिया को अब लोकतंत्र की चिंता नहीं है। संपादक अब राजेन्द्र माथुर प्रभाष जोशी विचारक नहीं है यदि वे विचारक हैं भी तो मीडिया संस्थानो को उनकी जरूरत नहीं है। मीडिया को मैनेजर की जरूरत है, चुंकि राजनीति अब मीडिया पर आधारित हो गई है और मीडिया अपनी इस सत्ता शक्ति का पूरा लाभ उठा रहा है। ऐसे में उसे वो लोग चाहिए जो उसके हित लाभ का ख्याल रख सकें।