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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - अब श्वांसों का ऑडिट होगा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  अब श्वांसों का ऑडिट होगा

-सुभाष मिश्र
ऑक्सीजन यूं तो प्राणवायु है पर इन दिनों इसका इस्तेमाल कार्बन डाई आक्साईड की तरह हो रहा है। केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट की एक उपसमिति की रिपोर्ट के जरिये बहुत सारी कार्बन डाईआक्साइड विसर्जित कर दिल्ली सरकार को घायल करना चाहती है। ऑक्सीजन उपयोग को लेकर आप पार्टी के नेताओं द्वारा क्रियेट की गई हाईप को अब मोदी सरकार खबरों के जरिए क्रियेट कर केजरीवाल सरकार को घेर रही है। ऐसा लग रहा है मानो दिल्ली सरकार ने ज्यादा ऑक्सीजन मंगाकर अपनी श्वासों के जरिए एक साथ फेफड़ों में भर ली हो ताकि चुनाव तक काम आये। कहा जाता है कि दिल्ली दिलवालों की है। अप्रैल-मई में जब कोरोना संक्रमण चरम पर था तो लोग अस्पतालों, सड़कों, घरों और अलग-अलग जगह ऑक्सीजन की गुहार कर रहे थे तो दिल्ली सरकार ने इसके लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहराया। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसका संज्ञान लेकर कड़ी टिप्पणी की। वहीं केंद्र सरकार अब सांसों का हिसाब मांग रही है। उसके प्रवक्ताओं को लग रहा है कि दिल्ली की आप सरकार ने ऑक्सीजन पर राजनीति कर कोविड-19 के दौरान लोगों की भावना के साथ खिलवाड़ किया। कभी कोरोना वैक्सिन, तो कभी ऑक्सीजन के मोर्च पर अपनी गलत नीतियों और अदूरदर्शिता के कारण कठघरे में खड़ी मोदी सरकार अब दूसरे के सर पर ठिकरा फोडऩा चाहती है।

कम होते कोरोना संक्रमण के चलते अब फिर से केंद्र सरकार की सांसें तेजी से चलने लगी है। संक्रमण के समय एक-एक सांस गिन रही है, राम-राम कर रही केंद्र की सरकार अब उन दिनों का सही-सही हिसाब मांगकर ऑक्सीजन आडिट की बात कह रही है। क्या यह संभव है कि दम तोड़ते आदमी को एक समय में कितनी ऑक्सीजन लगेगी। उसकी ऑक्सीजन का लेबल हमेशा एक सा रहेगा। जिस कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देकर केंद्र सरकार और उसकी पार्टी के लोग हमलावर हो रहे हैं उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। आक्सीजन की कमी के चलते पूरे देश में 512 लोगों की जान चली गई थी। कहा यह भी गया है कि मेडिकल ऑक्सीजन की कमी नहीं है, बल्कि निर्माण के संस्थान से अस्पतालों तक तरल ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए टैंकरों के वितरण नेटवर्क की अपर्याप्तता इस अफरा-तफरी का बड़ा कारण बना, जिसकी वजह से लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।  

ऑक्सीजन की मांग और आपूर्ति का मामला ऐसा है जिसका ठीक-ठीक हिसाब नहीं रखा जा सकता। कब किसकी सांस रूक जाये कोई नहीं जानता है। सांसों की माला का हिसाब मुश्किल है। इसका ठीक-ठीक आडिट संभव नहीं है। केंद्र सरकार अब ऑक्सीजन की खपत का आधिक्य बताकर हौवा खड़ा करने, सरकार को बदनाम करने के नाम पर केजरीवाल की सरकार को घेरने में लगी हुई है। जिस सरकार की रेल सेवा पटरी पर न हो, जिसकी रेल बिना पानी, बिना लक्ष्य के प्रवासी मजदूरों यात्रियों को लेकर तीन-तीन दिन तक यहां-वहां भटककर अपने गंतव्य पर नहीं पहुंचकर कहीं और

पहुंच जाये। वह सरकार सांसों का हिसाब मांग रही है। उसे तो खुद बेपटरी चली रेल के डीजल, पेट्रोल और अव्यवस्था का हिसाब देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित ऑक्सीजन ऑडिट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान दिल्ली सरकार ने जरूरत से चार गुना अधिक ऑक्सीजन की मांग की थी। रिपार्ट के अनुसार दिल्ली को उस वक्त करीब 300 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत थी, मगर दिल्ली सरकार ने मांग बढ़ाकर 1200 मीट्रिक टन कर दी थी। दिल्ली की अत्यधिक मांग के कारण 12 अन्य राज्यों को जीवन रक्षक ऑक्सीजन की भारी कमी का सामना करना पड़ा क्योंकि अन्य राज्यों की आपूर्ति दिल्ली की और मोड़ दी गई थी। यह तर्क ही अपने आप में हास्याप्रद है। क्या नीति निर्धारक इतने भोले-भाले, सहृदय है कि वे बाकी राज्यों की ऑक्सीजन दिल्ली वाले अरविंद केजरीवाल की आप सरकार के इशारे पर दिल्ली भेज दें। यदि मीडिया पर आ रही खबरों के दबाव में ऐसा हुआ है तो यह उस समय की सच्चाई थी जो चीख-चीख कर अस्पताल और उसके बाहर ऑक्सीजन मांग रही थी।

रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में ऑक्सीजन की उचित जरूरत का आंकलन करने के लिए एक परफॉर्म तैयार करके 260 अस्पतालों को बांट दिया था। इसके बाद 183 अस्पतालों ने अपने यहां ऑक्सीजन की खपत का आंकड़ा मुहैया कर दिया, जिनमें कई बड़े अस्पताल भी शामिल है। रिपोर्ट कहती है कि अस्पतालों में मिले आंकड़ों को तीन पैमानों पर परखा गया-आक्सीजन की वास्तविक खपत, केंद्र सरकार के फॉर्मूले के अनुसार आक्सीजन की जरूरत और दिल्ली सरकार के फॉर्मूले के अनुसार ऑक्सीजन की जरूरत।

क्या किसी मरीज को कितनी ऑक्सीजन लगेगी कितने लोग आक्सीजन की कमी महसूस करेंगे। ऐसा कोई फॉर्मूला या ज्ञात हो सकता है। दरअसल इस तरह की सोच साफ बताती है कि यह अब दिल्ली सरकार को कठघरे में घेरकर अपनी स्थिति को बेहतर दिखाने की कवायद है। राजनीति भाषा में इसे डैमेज कंट्रोल कहा जाता है।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा कहते हंै कि दिल्ली में ऑक्सीजन को लेकर जैसी राजनीति की गई, उस पर हमने एक रिपोर्ट देखी है। दूसरी लहर में दिल्ली में हाहाकार मचा था पर केजरीवाल ने ऑक्सीजन पर जो राजनीति की, उसका पर्दाफाश इस रिपोर्ट से हो गया। ऑक्सीजन पर भी कोई राजनीति कर सकता है क्या? पर केजरीवाल ने ऐसी छोटी राजनीति की।

वहीं दूसरी ओर दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा भाजपा के नेता जिस रिपोर्ट के हवाले से केजरीवाल को गालियां दे रहे हैं ऐसी कोई रिपोर्ट है ही नहीं भाजपा झूठ बोल रही है। मैं चुनौती देता हूं। भाजपा नेताओं को कि ऐसी रिपोर्ट लाइए। झूठ और मक्कारी की इंतेहा होती है और भाजपा उस चरम पर पहुंच गई है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। मैं कहना चाहता हूं कि कानूनी मामलों में ऐसी चीजें ठीक नहीं है। अप्रैल में आक्सीजन का संकट खड़ा हुआ था। जिनके लोग भर्ती थे वे इस बात को जानते हैं। इसकी जिम्मेदार केन्द्र सरकार है जिसने पूरे देश में ऑक्सीजन मैनेजमेंट का बंटाधार कर दिया। जिस कथित रिपोर्ट को लेकर यह बवाल मचा हुआ है उस रिपोर्ट के अनुसार सामान्य तौर पर दिल्ली में 284 से लेकर 372 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरुरत थी।

केजरीवाल की सरकार तो दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा मांग रही तो दवाब में आकर उसे पूर्ण राज्य घोषित कर देना चाहिए था। दिल्ली सरकार घर-घर राशन योजना चालू करना चाहती है, उसे भी चालू कर देना चाहिए। यह कहना बहुत ही हास्यापद है कि दिल्ली में बने दवाब के कारण अन्य राज्यों की उपेक्षा कर दिल्ली को ऑक्सीजन ज्यादा दे दी गई। केंद्र सरकार वैक्सीन का इस्तेमाल करने की बजाय श्वासों का आडिट कर यह बताने में लगी है कि किसे कितनी ऑक्सीजन चाहिए थी। यह संभव है कि भविष्य में सरकार सभी लोगों के लिए ऑक्सीजन का कोटा तय कर दे। जो आदमी ज्यादा श्वास लेकर ऑक्सीजन का दुरुपयोग करेगा, भंडारण करेगा उसे सजा होगी।

अस्पतालों को अब यह पैरामीटर तय करना होगा कि उसके यहां भर्ती मरीज कब कितनी ऑक्सीजन ले पायेंगे। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ तौर से यह भी कहा था कि हर राज्य के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता को समझने के लिए ऑक्सीजन आडिट करने के लिए एक विशेषज्ञ पैनल का गठन किया जाए।

सुप्रीम कार्ट ने बहुत स्पष्ट रूप से केंद्र से कहा कि आपको दिल्ली को 700 टन देना ही पड़ेगा। कोर्ट ने कहा था, अगर कुछ छिपाना नहीं है तो देश के सामने यह बात आने दीजिए कि कैसे केंद्र द्वारा आवंटन और वितरण पारदर्शी से किया जाता है। कोर्ट कचहरी और पब्लिक डोमेन में सारी बातों के आने के बाद अब एक रिपोर्ट के आधार पर एक-दूसरे को घेरना दरअसल उन लोगों के जले पर नमक छिड़कने जैसा है जिन्होंने अपनों को खोया है।