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सरकार खेल और खिलाडिय़ों को लेकर उदासीन : प्रदेश की वर्तमान खेल नीति और बजट में कोई तालमेल नहीं

 सरकार खेल और खिलाडिय़ों को लेकर उदासीन : प्रदेश की वर्तमान खेल नीति और बजट में कोई तालमेल नहीं

रांची । झारखंड के पूर्व मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विधायक भानुप्रताप शाही ने राज्य की हेमंत सरकार पर खेल एवं खिलाडिय़ों के प्रति संवेदनहीन होने का आरोप लगाते हुए रविवार को कहा कि प्रदेश की वर्तमान खेल नीति और बजट में कोई तालमेल नहीं है। शाही ने कहा कि महेंद्र सिंह धोनी, दीपिका कुमारी जैसे खिलाडिय़ों ने विश्व पटल पर झारखंड को एक विशेष पहचान और प्रतिष्ठा दिलाने का काम किया है। कह सकते हैं कि झारखंड की रीति रिवाज और संस्कृति में ही खेल रचता बसता है।

पूर्व मंत्री ने कहा कि 2014 से रघुवर दास के नेतृत्व में खेल जगत को बढ़ावा देने की दिशा में कई सार्थक प्रयास हुए। वर्तमान सरकार ने उन तमाम प्रयासों को बढ़ाने के बजाय उस पर पानी फेरने का काम किया है। खेल और खिलाडिय़ों के प्रति हेमंत सरकार की उदासीनता काफी दुखद है। मुख्यमंत्री कई विभागों के बोझ तले दबे हैं। इस विभाग को लेकर यदि सरकार संजीदा होती तो अभी यह विभाग मुख्यमंत्री की वजह किसी अन्य मंत्री के पास होता।

शाही ने कहा कि पूर्व की रघुवर सरकार ने गांव में छुपी प्रतिभाओं को निखारने और निकालने के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाओं को प्रारंभ किया लेकिन हेमंत सरकार ने वर्तमान में उन योजनाओं पर पूरी तरह ग्रहण लगाने का काम किया है। पूर्ववर्ती रघुवर सरकार ने 4500 कमल क्लब का गठन कर गांव की प्रतिभाओं को प्रदेश स्तर तक एक प्लेटफार्म उपलब्ध कराने का प्रयास किया था। हेमंत सरकार के गठन के बाद से उस फंड में एक भी रुपए नहीं दिया।

भाजपा नेता ने कहा कि पिछले एक साल से हेमंत सरकार ने इस कार्यक्रम पर ग्रहण लगा रखा है। इस कार्यक्रम के पीछे रघुवर सरकार की सोच थी कि 2024 में झारखंड के बच्चे ओलंपिक में गोल्ड मेडल लेकर आएंगे। प्रशिक्षण के नाम पर जो करार किया गया था वह भी हेमंत सरकार ने शिथिल कर रखा है। इसके अलावा कई प्रकार के प्रशिक्षण में केंद्र खोल कर भी खिलाडिय़ों को भी रघुवर सरकार प्रशिक्षित कराती रही है लेकिन हेमंत सरकार का फोकस खेल और खिलाडिय़ों को लेकर तनिक भी नहीं है। प्रशिक्षण नहीं होगा तो सकारात्मक परिणाम कैसे आएगा।

शाही ने कहा कि हेमंत सरकार आनन-फानन में कैबिनेट से बिना स्वीकृति कराए ही खेल नीति लेकर आ जाती है। बड़ा ताज्जुब लगता है कि बिना कैबिनेट स्वीकृति के खेल नीति कैसे वैध मानी जाएगी। इतना ही नहीं खेल नीति के पहले पन्ने को देखकर ही प्रतीत होता है कि राज्य सरकार ने कैसे खेल और खिलाडिय़ों के साथ खेल करने का काम किया है। झारखंड सरकार ने खिलाडिय़ों को तीन वर्गों में बांट कर एक अलग ही परंपरा की शुरुआत की है। खिलाडिय़ों के वर्गीकरण हो जाने से उनमें पहले ही हीन भावना घर कर जाएगी। इससे उनकी प्रतिभा तो कुंठित हो जाएगी।

विधायक ने कहा कि सिर्फ आनन-फानन में घोषणा करके पीठ थपथपा रही है। खेल नीति और बजट में कोई तालमेल भी नहीं है। जल्दबाजी में खेल नीति लाकर यह सिर्फ आईवास करने का प्रयास पर है। खेल नीति में संशोधन करना होगा नहीं तो जोरदार आंदोलन के लिए सरकार तैयार रहे।