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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - क्षमा करो हे मृतकजनो

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - क्षमा करो हे मृतकजनो

- सुभाष मिश्र
मोदी सरकार के सात साल पूरे हुए। मोदी जी ने कहा कि जो सात दशक में नहीं हुआ वह सात साल में हुआ। कांग्रेस सहित विपक्ष ने मोदी सरकार की सात बड़ी गलतियां गिनाई। हमारी धार्मिक परंपरा में अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगना शामिल है। जो क्षमा मांगता है उसे लोग अच्छा आदमी मानते हैं। सरकारों की शब्दावली में क्षमा जैसा शब्द नहीं है। सरकार कोई भी हो वह अपनी उपलब्धि ही गिनाती है, गलतियों के लिए क्षमा नही मांगती।

हिन्दू धर्मावलंबियों के यहां होने वाली कथा पूजा के बाद अंत में यह श्लोक बोला जाता है।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन। यत्पूजितं मया देव! परिपूर्ण तदस्तु मे॥
हे ईश्वर मैं आपका आवाह्न अर्थात् आपको बुलाना नहीं जानता हूं, न विसर्जनम् अर्थात् न ही आपको विदा करना जानता हूं, मुझे आपकी पूजा भी करनी नहीं आती है। कृपा करके मुझे क्षमा करें। मेरे अहंकार को दूर कर दें।

जैन धर्म को मानने वाले क्षमा पर्व मिचछामी दुक्कड़म कह कर सबसे क्षमा मांगते हैं। क्रिश्चियन चर्च में जाकर अपनी गलतियों के लिए कन्फेस करते हैं। इस्लाम यह धारणा है की इंसान गलतियों का पुतला है। जाने अंजाने या जान बूझकर हुई गलती के लिए कभी भी फजर की नमाज के समय अल्लाह से क्षमा मांगते हैं जिसे इस्तीगफर कहते हैं।

हम अपने रोजमर्रा के जीवन में हम अपनी गलतियों के लिए सॉरी बोलते हैं। सॉरी शब्द को सुनते ही बहुत सारे गिले शिकवे दूर हो जाते हैं। कायदे से हमारी सरकार को अपनी दो साल की उपलब्धियों का बखान करने के साथ-साथ देश की जनता से क्षमा भी मांगनी थी। ऐसा करके सरकार अपना सम्मान जनता की नजरो में बढ़ाती। सरकार के मुखिया मोदी जी की पीड़ा को आंखों में आंसू के रूप पिछले दिनो हम सबने टीवी चैनल पर देखा। कोरोना की व्यथा बताते हुए उनका गला भर आया था। वे चाहते तो अपनी सरकार की फैसलों, उपलब्धियों का बखान करते हुए उन लापरवाहियों का भी उल्लेख कर सकते थे जिनके कारण लाखो लोगो को अपनी जान गंवानी पड़ी। बहुत सारे लोगों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार तक नहीं हो पाया। अभी भी उनकी लाश नदी में तैरती मिल जाती है। वे हाथ जोड़कर मृतकजनों से क्षमा मांग सकते थे। हमारे यहां तो वैसे भी मृतकों का सम्मान करने की परंपरा है। पितृ पक्ष मनाकर हम अपने पुरखो को याद करते हैं, ये तो अभी-अभी की बात है। अभी भी लोगों का मरना जारी है। देश के बहुत से लोग, उनके भक्तों की तरह मोदीजी के फैन हो जाते। वे उन किसानो से भी माफी मांग सकते थे जो आंदोलन करते ठंड में, सड़क किनारे मर गये। नोटबंदी के गलत फैसले और उससे उपजी पीड़ा के लिए भी लोगो से माफी मांगी जा सकती थी। जनता के सुख-शांति, अमन-चैन और देश को विश्व गुरू बनाने के लिए वो जो तपस्या वो गुफा में बैठकर कर रहे थे उस परपंरा में भी सबसे बड़ा हथियार क्षमा ही है।  

सरकार में चूंकि मोदीजी मुखिया हैं इसलिए उनकी जवाबदेही औरो से ज्यादा है। देश के बाकी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को जिन्होने कोरोना संक्रमण की अनदेखी कर चुनाव रैलियां की, क्रिकेट मैच और उस जैसे बहुत से बड़े आयोजन किये, बड़ी-बड़ी सभाओं भाग लेकर कोरोना संक्रमण को बढ़ाने में योगदान दिया, उन्हे भी देश की जनता से क्षमा मांगनी चाहिए। गोस्वामी तुलसी दास को याद करके ये भी स्वीकार कर सकते हैं -'मो सम कौन कुटिल खल कामी। तुम सौं कहा छिपी करुनामय, सब के अंतरजामी।

मोदी सरकार को देश के लोगों से आर्थिक कुप्रबंधन के कारण आई आर्थिक मंदी के लिए क्षमा मांगनी चाहिए। सात साल पहले उन्हें विरासत में 8.1 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर मिली थी जो अभी घटकर- 2.41 प्रतिशत रह गई है। उन्होंने लोगों को अच्छे दिन आने वाले हैं का सपना दिखाया था, वे अच्छे दिन नहीं ला पाये इसकी क्षमा। सरकार को बेरोजगारों से माफी मांगनी चाहिए की बेरोजगारी कम होने की बजाय बढ़ गई। हर वर्ष दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में बेरोजगारी की दर 11.3 प्रतिशत पहुंच गई। कोरोना काल में 12 करोड़ 20 लाख लोगों ने अपना रोजगार खोया है। डीजल-पेट्रोल पर अनाप-शनाप टैक्स लगाकर पैसे वसूलने वाली सरकार ने लोगों से महंगाई कम करने, एक देश-एक टैक्स का वादा किया था। उस वादे को पूरा नहीं कर पाने के लिए क्षमा जरूरी है।

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाना मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। इसमें कोई दो मत नहीं की मोदी सरकार वे अपने चुनावी घोषणा पत्र में किये गये वादों में से राम मंदिर निर्माण सहित जम्मू-कश्मीर की बात हो या मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक का मामला हो उन्हें पूरा किया। परन्तु यहां सवाल यह भी है कि जम्मू-कश्मीर की जनता पिछले डेढ़ सालों से अघोषित लाकडाउन झेल रही है। उसका क्यों मोदी सरकार ने अपनी उपलब्धियों को गिनाकर अपनी पीठ थपथपा रही है। उनकी वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार सात साल से खुद को प्रधानसेवक की भूमिका के लिए समर्पित कर रही हैं। पीएमओ अंत्योदय, सबका साथ-सबका विकास-सबक विश्वास में उज्ज्वला, जनधन, ओआरओपी, स्वच्छ भारत, किसान सम्मान, आयुष्मान भारत, सभी आत्मानिर्भर भारत के लिए सामने से नेतृत्व किया है।

गृहमंत्री अमित शाह के अनुसार मोदी सरकार ने विकास, सुरक्षा, जनकल्याण और ऐतिहासिक सुधारों के समांतर समन्वय का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के अनुसार सात वर्षों में जनसेवा, लोक कल्याण, विकास, सुशासन एवं सुधार का नया अध्याय लिखा गया है। गरीब से गरीब व्यक्ति के भी सशक्तिकरण का प्रयास किया है। परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने अनुसार इन 7 सालों में देश ने अभूतपूर्व विकास और सुधारों का दौर देखा है, जो अब भी जारी है।
सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई लिखते हैं कि-इस देश का राजनेता जनता को बदचलन औरत समझकर उसे तरह-तरह से फुसलाता है। अपनी नेताई छवि से, वादों से, नारों से, उछल-कूद से, लोभ से, छाती पीट से, अश्रुपात से, हिन्दूवाद से, गांधीवाद से, समाजवाद से- गाने गाता है, सीटी बजाता है, हाव-भाव करता है। मगर कभी जनता पलटकर इस नेता को चप्पल जड़कर कहती है- हरामजादे, मैं क्या तुझे जानती नहीं हूं, तू शोहदा है। मैं कोई बदचलन औरत नहीं हूं।

मोदीजी कहते हैं देश ने एक टीम के रूप में काम किया है सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वास का हमने पालन किया है। जब सरकार ने इस मंत्र का पालन किया है जो देश के एक बड़े तबके और लोगों के मन में भय क्यों है? बहुत सी कार्यवाही शक्ल, विचारधारा देखकर क्यों होती है? कांग्रेस मोदी सरकार की सात बड़ी भूल गिनाकर अपने गौरवमयी इतिहास की बात कर रही है। कांग्रेसियों ने गांधी-नेहरू की विरासत से कुछ खास नहीं सीखा। देश की राजनीतिक पार्टियों को विशेषकर सत्तारूढ़ पार्टियों को आत्ममुग्धता नहीं आत्ममंथन की जरूरत है। गोदी मीडिया या विज्ञापनों के जरिए निर्मित की गई छवियां अस्थायी होती है। इतिहास कभी भी किसी को माफ नहीं करता। गांधी जी अपनी कथनी-करनी और अपनी गलतियों को स्वीकारने के कारण आज भी प्रासंगिक है।