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पति की दीर्घायु एवं समृद्धि की कामना से सुहागिनों ने रखा वट-सावित्री का व्रत

पति  की दीर्घायु एवं समृद्धि की कामना से सुहागिनों ने रखा वट-सावित्री का व्रत

खरसिया। सुहागिनों ने सोलह श्रृंगार कर परिवार की समृद्धि तथा पति की लंबी आयु की कामना को लेकर वटसावित्री का व्रत रखा। वहीं विधि-विधान से बरगद के पेड़ की पूजा की तथा सत्यवान-सावित्री की कथा का श्रवण किया।
मान्यता है कि इसी दिन देवी सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। कथा में उल्लेख है कि जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे जाने लगी। यमराज ने सावित्री को ऐसा करने से रोकने के लिए तीन वरदान दिए। एक वरदान में सावित्री ने मांगा कि वह सौ पुत्रों की माता बने, इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के संतान कैसे संभव है? सावित्री की बात सुनकर यमराज को अपनी भूल समझ में आ गई कि उन्होंने गलती से सत्यवान के प्राण वापस करने का वरदान दे दिया है। जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंदे से छुड़ाने के लिए यमराज के पीछे जा रही थी, उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देखरेख की थी। पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिए उसकी परिक्रमा की। इसलिए वटसावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का नियम है। सुहागन स्त्रियां वटसावित्री व्रत के दिन सोलह श्रृंगार करके सिंदूर रोली फूल अक्षत चना आम फल और मिठाई से वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री-सत्यवान और यमराज की कथा श्रवण कर ब्राह्मण देव को दान आदि दे कर अपनी पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए आशीर्वाद लेती हैं।