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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते

-सुभाष मिश्र

आधुनिक विश्व में जीवन को गतिमान बनाये रखने के लिए जीवाश्म ईंधन के रूप में पेट्रोल और डीजल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। माल-दुलाई और यात्री परिवहन में पेट्रोल डीजल ही मुख्य ईंधन है। जहाजरानी, रेल, वायुयात के अलावा ट्रकों-कारों और दुपहिया वाहनों में पेट्रोल या डीजल ही इस्तेमाल होता है। जैसे ही इन ईंधनों के दाम बढ़ते है इस बढ़ोत्तरी का व्यापक असर एक साथ कई चीजों पर पड़ता है। जिन शहरों में मेट्रो या लोकल ट्रेन अथवा नियंत्रित बस सेवाएं उपलब्ध है वहां तो हालत फिर भी ठीक है मगर वो शहर कस्बे गांव जहां से सुविधाएं नहीं है वो तो पेट्रोल डीजल से चलने वाले वाहनों पर ही आश्रित है। यात्री परिवहन के अलावा शहरों को दूध, पानी, सब्जी, अनाज, दवाईयां की आपूर्ति ट्रकों द्वारा होती है। ईंधन के दाम बढ़ते ही माल भाड़ा पर असर पड़ते है और प्रभावित होती है जरूरी सामानों की कीमतें।

डीजल पेट्रोल के भाव आसमान चढ़ रहे थे अब लोग महंगाई की मार झेलकर चुप बैठे थे। लंबे किसान आंदोलन का कोई परिणाम नहीं निकले और सरकार की तरह-तरह के विरोध को लेकर सार्वजनिक युप्पी किन्तु विरोध करने वालों की घेराबंदी देखकर बहुत से आंदोलनकारियों के हौसले पस्त हुए। जनता की चुप्पी, खामोशी क्या रंग लाती है। इससे सियासतदान खूब समझते हैं। अभी हाल ही में हिमाचल प्रदेश और अन्य जगहों पर हुए उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद अचानक से केंद्र सरकार ने डीजल, पेट्रोल के दाम में कमी की। केंद्र सरकार के इस निर्णय के बाद केंद्र की भाजपा शासित सरकार और राज्यों में काबिज और भाजपा शासित सरकारों के बीच डीजल, पेट्रोल की कीमतों में वैट, सेस टैक्स आदि को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। आने वाले समय में पांच राज्यों में जिनमें उत्तरप्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड शामिल हैं, के चुनाव को देखते हुए भाजपा महंगाई के मुद्दे पर व्याप्त खामोश जनाक्रोश को कम रने में लगी है।
भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में कोरोना महामारी से निपटने में केंद्र सरकार की कामयाबी को लेकर उसकी तारीफ में प्रस्ताव पारित होगा। वैक्सीनेशन कैंपेन, देश के विकास के लिए प्रधानमंत्री मोदी की पहल और उनकी सफल विदेश यात्रा की भी पार्टी प्रशंसा करेगी। इसके अलावा मीटिंग के दौरान देश की आर्थिक गतिविधियों में आए उछाल, रिकॉर्ड GST कलेक्शन को लेकर भी चर्चा हो रही है ।

कोरोना संक्रमण के दौरान करोड़ों लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद रहे। डीजल-पेट्रोल, रसोई गैस सहित बहुत सी जीवन उपयोगी चीजों की कीमतें बढ़ती जा रही है। ऐसे में लगातार बढ़ती डीजल, पेट्रोल की कीमत ने अर्थ व्यवस्था की टांग तोड़ दी।केन्द्र सरकार ने दीपावली का तोहफा देने के नाम पर दिवाली से पहले पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी कम कर दी। अब छत्तीसगढ़ में भी वैट की दरों में कमी आ सकती है, ।जनता को राहत देने सरकार को विचार करना होगा । छत्तीसगढ़ पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करने को शनिवार को भूपेश बधेल की सरकार के खिलाफ भाजपा युवा मोर्चा ने प्रदर्शन किया। वैट की दरों में कमी की मांग को लेकर युवामोर्चा ने राजधानी रायपुर के पेट्रोल पंप के सामने प्रदर्शन किया।

इस आंदोलन और पेट्रोल डीजल की कथित कमी को लेकर कांग्रेस का कहना है की यूपीए की सरकार के समय पेट्रोल पर 9 रुपये एक्साइज ड्यूटी लग रही थी, जिसे एनडीए की सरकार ने 30 रुपये तक बढ़ाया और अब 5 रुपये कम करके वाहवाही लूट रहे हैं, यूपीए सरकार की तरह एक्साइज ड्यूटी 30 रुपए से घटाकर 9 रुपये करके केंद्र सरकार दिखाए। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के नुमांइदे कह रहे हैं  कि उपचुनाव हारने से इनकी अक्ल ठिकाने आ गई है। छत्तीसगढ़ चारों तरफ से दूसरे राज्यों से घिरा हुआ है। ऐसे में वहां की कीमतों को भी ध्यान में रखना होगा। इनका विवरण मांगा गया है। ज्यादा दाम रखते है तो लोग वहां दूसरे राज्यों में तेल भराकर आते हैं। इससे वैट का भी नुकसान होता है। पेट्रोल-डीजल से सेंट्रल एक्साइज कम होने से राज्य की आमदनी भी कम हो गई है। सेंट्रल एक्साइज का 42 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को आता है। केंद्र सरकार ने इसके अलावा की तरह के सेस लगा रखे हैं। जिसका हिस्सा राज्यों को नहीं मिलता। अब केंद्र ने राहत के नाम पर अपना हिस्सा नहीं घटाया वह हिस्सा कम किया, जिससे राज्यों की आदमी प्रभावित हो।फिलहाल 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने वैट की दरों में भी कटौती की है। ऐसे   प्रदेशों में कनार्टक, पुडुचेरी, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, असम, सिक्किम, बिहार, मध्यप्रदेश, गोवा, गुजरात, दादरा और नागर हवेली दमन और दीव, चंडीगढ़ हरिणाया, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश और लद्दाख शामिल है।

पूरे देश में लगातार पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच जब हमारे यहां पेट्रोल की कीमत 101.91 रुपये प्रति लीटर हो गई तब पेट्रोल की कीमते पड़ोसी देशों में तुलनात्मक रूप से काफी कम  हैं। श्रीलंका में पेट्रोल की कीमत रु। 68.64. ,पाकिस्तान प्रति लीटर पेट्रोल रुपये में बेच रहा है। 52.12. भारत का छोटा पड़ोसी नेपाल भी प्रति लीटर पेट्रोल 78.92 रुपये में बिक रहा है ।पेट्रोल और डीजल की आसमान छूती कीमतें कुछ अन्य वस्तुओं को अधिक महंगा बना देती हैं, जिससे निम्न आय वर्ग के लोगों को परेशानी होती है। ईंधन की बढ़ती कीमतों में पिछले छह महीने में 70 फीसदी का इजाफा हुआ है।

देश में लॉकडाउन के कारण तेल की खपत भी कम हो रही है और विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम भी कम हैं, फिर भी भारत में तेल क्यों महंगा है?  यह सवाल लोग लगातार करते रहे हैं ।

दरअसल एक फॉर्मूला है, जिसके आधार पर पेट्रोल पंप पर बिकने वाले ईंधन के दाम तय होते हैं। इसमें कच्चे तेल के दाम, परिवहन, रिफाइनरी का खर्च, केंद्र व राज्य सरकारों के कर, पंपों का कमीशन जैसी तमाम चीजें शामिल होती हैं।पंपों पर ग्राहकों को बेचे जाने वाले तेल की कीमत ट्रेड पैरिटी प्राइसिंग (टीपीपी) फॉर्मूले से तय होती है। इसका 80:20 का अनुपात रहता है। यानी देश में बेचे जाने वाले पेट्रोल-डीजल के मूल्य का 80 प्रतिशत हिस्सा विश्व बाजार में वर्तमान में बेचे जा रहे ईंधन के दामों से जुड़ा होता है। शेष 20 फीसदी हिस्सा अनुमानित मूल्य के अनुसार जोड़ा जाता है।पेट्रोलियम पदार्थों पर प्रत्येक राज्य अपनी दरों के अनुसार कर वसूलता है। केंद्रीय उत्पाद शुल्क के अलावा राज्यों के कर व स्थानीय कर शहरों द्वारा वसूले जाते हैं। दिल्ली में गत वर्ष दिसंबर में पेट्रोल के आधार मूल्य पर दिल्ली में केंद्र व राज्य 180 फीसदी कर वसूलते थे, जबकि डीजल पर 141 फीसदी। दूसरी और जर्मनी में 65 फीसदी ईंधन पर कुल 65 फीसदी और इटली में मात्र 20 फीसदी कर वसूला जाता है।

पिछले तीन सालों में पेट्रोल-डीजल से सरकार को टैक्स से कमाई तीन गुना से ज्यादा तक बढ़ चुकी है। अप्रैल 2020 से जनवरी 2021 के बीच सरकार ने तेल पर टैक्स के माध्यम से 2.94 लाख करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया है।

इस दौरान विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतें नीचे आईं, इसके बाद भी इस पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी जारी रही। 2020-21 में यह 12.2 फीसदी तक पहुंच गया । 2014-15 से पिछले छह सालों में पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क के माध्यम से कुल कर संग्रह में 307.3 फीसदी की वृद्धि हुई है।

‏जैसे -जैसे चुनाव आयेंगे मतदाता को रिझाने के लिए बहुत से ऐसे लोककल्याणकारी फैसले लिए जायेंगे जिससे आम आदमी को राहत मिले । लोगों के बीच गोदी मीडिया के जरिए कीमते , मंहगाई कम करने का पूरा श्वांग रचा जायेगा । राजनीतिक  पार्टियां लोगो को मुफ्त में , सस्ते में वे सब चीजें देने की घोषणा करेगी जो जनता को प्रभावित करे । दरअसल जब अपने पास से कुछ नही देना हो तो मालिके मुफ्त दिल बेहरम तो हो ही जाता है ।