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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -सामाजिक मुद्दा है-कौन जात हो भाई

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -सामाजिक मुद्दा है-कौन जात हो भाई

- सुभाष मिश्र

बच्चा लाल उन्मेश की कविता कौन जात हो भाई इंस्टाग्राम पर पोस्ट होने के आधे घंटे बाद ही हटा ली गई। छिछले प्रश्न गहरे उत्तर के नाम की इस लंबी कविता के साथ ही सोशल मीडिया पर दलित विमर्श को लेकर बहुत सारी बातचीत होने लगी। चूंकि, इस समय उत्तरप्रदेश और पंजाब में होने वाले चुनाव में दलित एक बड़ा वोट बैंक है। सभी राजनीतिक पार्टियां दलितों को अपनी अपनी तरह प्रभावित करने में लगी हुई है। राजनीतिक दलों को अक्सर चुनाव के समय ही दलित, पिछड़े, गरीब याद आते हैं। दरअसल, यह कविता है क्या पहले इसे जान लेते हैं-

कौन जात हो भाई?
दलित हैं साब!
नहीं मतलब किसमें आते हो?
आपकी गाली में आते हैं
गन्दी नाली में आते हैं
और अलग की हुई थाली में आते हैं साब!
मुझे लगा हिन्दू में आते हो!
आता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।
क्या खाते हो भाई?
जो एक दलित खाता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या खाते हो?
आपसे मार खाता हूँ
कजऱ् का भार खाता हूँ
और तंगी में नून तो कभी अचार खाता हूँ साब!
नहीं मुझे लगा कि मुर्गा खाते हो!
खाता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।
क्या पीते हो भाई?
जो एक दलित पीता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या पीते हो?
छुआ-छूत का गम
टूटे अरमानों का दम
और नंगी आँखों से देखा गया सारा भरम साब!
मुझे लगा शराब पीते हो!
पीता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।
क्या मिला है भाई
जो दलितों को मिलता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या मिला है?
जि़ल्लत भरी जिंदगी
आपकी छोड़ी हुई गंदगी
और तिस पर भी आप जैसे परजीवियों की बंदगी साब!
मुझे लगा वादे मिले हैं!
मिलते हैं न साब! पर आपके चुनाव में।
क्या किया है भाई?
जो दलित करता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या किया है?
सौ दिन तालाब में काम किया
पसीने से तर सुबह को शाम किया
और आते जाते ठाकुरों को सलाम किया साब!
मुझे लगा कोई बड़ा काम किया!

किया है न साब! आपके चुनाव का प्रचार..।

इस कविता पर सुप्रसिद्ध लेखक पत्रकार प्रियदर्शन कहते हैं कि -
यह सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है। कविता शब्दों का खेल होती भी नहीं। इसमें सदियों की हूक है, उपेक्षा का अनुभव है, शोषण की स्मृति है।

दलित और आरक्षण यह एक ऐसा मुद्दा रहा जो आजादी के बाद से अभी तक ज्वलंत है और हर सत्ता दल से ज्वलंत बनाए रखता है। दलित का मुद्दा  जाति के संदर्भ में राजनीति से ही जुड़ा रहा। गांधी-अंबेडकर के बाद यह सामाजिक मुद्दा नहीं रहा। इसे सामाजिक मुद्दा बनाकर सभी जाति और धर्म के लोगों के बीच उनकी संवेदना से जोड़ा जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। आजादी के बाद से आज तक प्रत्येक सत्ता दल ने दलित संघर्ष, समस्या या मुद्दे का हल सिर्फ आरक्षण के जरिए हल करने की कोशिश की वह भी सिर्फ वोट की राजनीति के चलते। दलितों के लिए आरक्षण जितना जरूरी है उतना ही समाज में सम्मानजनक स्थान के लिए सामाजिक समरसता भी जरूरी है। दुर्भाग्य से किसी भी राजनेता ने, किसी भी राजनीतिक दल ने दलितों और सवर्णों के बीच सामाजिक समरसता की कोशिश नहीं की। दलितों के घर खाना खाकर अखबार में फोटो प्रकाशित करवा लेने से यह समस्या हल होने वाली नहीं है। आज तक किसी भी दल ने, किसी भी राजनेता ने दलितों को अपनी रसोई में बैठाकर खाना खिलाने की कोशिश नहीं की। भाजपा तो यह समरसता की कोशिश ज्यादा आसानी से कर सकती है क्योंकि उनके पास आरएसएस जैसी विशाल संस्था है जिसकी पहुंच समाज के कोने-कोने तक हो सकती है। लेकिन ऐसी कोशिश में आरएसएस का ब्राह्मणत्व आड़े आ जाता है। राजनीतिक दलों ने अपनी राजनीति के चलते दलितों और सवर्णों के बीच कहना कि इतनी बड़ी खाई पैदा कर दी है कि पहला काम इस खाई को भरने का होना चाहिए। देश और समाज में यह संदेश जाना चाहिए कि दलितों को आरक्षण के साथ ही सम्मान भी मिलना चाहिए।

दलित राजनीति का दायरा और उस पर हो रहे अतिक्रमण के बीच उसके भविष्य पर चिंतन करने की जरूरत है। क्योंकि जब-जब चुनाव आते हैं तब-तब नेता और विश्लेषक समाज को कई भागों में बांटकर उसे अलग-अलग वोट बैंक की तरह देखने लगते हैं।
आजादी के बाद से देश में दलित समाज को जहां बड़ी पार्टियां एक वोट बैंक की तरह देखती रही हैं, वहीं दलित चिंतन को लेकर अस्तित्व में आए राजनीतिक दलों ने खुद को एक सीमा में बांधे रखा फिर वो कांशीराम और मायावती हों या रामविलास पासवान हों। ये नेता दलित वोट के सहारे चुनाव तो जरूर जीतते रहे लेकिन राष्ट्रीय पटल पर दलित राजनीति को स्थापित करने में सफल नहीं हो पाए।  

वैसे मायावती ने 2007 में प्रभावी सोशल इंजीनियरिंग द्वारा समावेशी राजनीति की ओर कदम बढ़ाया और सभी वर्गों के वोट से प्रदेश में सरकार बनाई। हालांकि अपने प्रयोग को वे बहुत आगे नहीं ले जा सकीं और राष्ट्रीय राजनीति की राह में भटक गईं। वहीं पासवान स्वयं निर्वाचित होते रहे, पर बिहार में दलितों को लामबंद नहीं कर सके। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कोई दलित नेता राष्ट्रीय राजनीति तो दूर अपने प्रदेश में ही पूरी तरह स्थापित क्यों नहीं हो पाता?
इसको लेकर कुछ जानकारों का मानना है कि दलित समाज की आंतरिक स्थिति वैसी नहीं है जैसा कि बाहर से आंकलन किया जाता है। दरअसल, दलित समाज कई जातियों में विभक्त हैं। इनमें आपस में ही जुड़ाव नहीं है इसलिए भी पूरे समाज का एक नेता नहीं बन पाता। पंजाब में सर्वाधिक 32 फीसद दलित हैं, लेकिन कोई दलित राजनीति की बात नहीं करता?

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार जनता के अथक लोकतांत्रिक संघर्ष के बाद हासिल हुआ है। आधुनिक लोकतंत्र में इससे प्रत्येक व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलता है जो अंतत: इस बात को सूचित करता है कि

संविधान की नजऱ में प्रत्येक व्यक्ति समान है लेकिन यह भी सत्य है कि सामाजिक विषमताओं से भरे समाज में वर्चस्व की शक्तियां यथास्थिति क़ायम रख अपने प्रभुतंत्र को बनाए रखने का प्रयत्न करती हैं। भारतीय समाज के भीतर दलित समुदाय संख्या बल में अधिक होने के बावजूद सामाजिक प्रभाव और आर्थिक हैसियत की दृष्टि से कमतर हैं लेकिन सार्वजनिक मताधिकार के संवैधानिक संरक्षण के चलते चुनाव में वह महत्वपूर्ण हो उठता है। इसलिए उनका समर्थन हासिल करने की होड़ में सभी राजनीतिक दल चुनावी मौसम में उन्हें लुभाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। उनकी नाराजग़ी के भय से कोई उन्हें संविधान द्वारा दी गई आरक्षण की व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ की हिम्मत भी नहीं करता बल्कि आरक्षण और अन्य सुविधाओं के विस्तार की सिफारिश करता है।

ज़ाहिर है, दलितों से सरोकार उन्हें एकमुश्त वोट बैंक मानकर चुनावी राजनीति में उनके इस्तेमाल की चतुर रणनीति का हिस्सा है। उनके कल्याण के प्रश्नों से वास्तविक सरोकार नदारद हैं। दलित कल्याण का मिथक उनके आर्थिक सशक्तिकरण के राज्य समर्थित उपक्रमों से ऊपर नहीं उठ पाता। वस्तुत: आरक्षण को आर्थिक उपाय से अधिक माना भी नहीं गया है, जबकि आवश्यकता उनके सामाजिक सशक्तिकरण की है। समूचे सामाजिक मानस को बदलने की है। आज भी सामाजिक समानता का लक्ष्य अधूरा है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि भारतीय समाज में जाति की जड़ें अब भी बहुत गहरी हैं। अनेक ऐसी घटनाएं नित्य घटती हैं जब दलितों को प्रताडि़त किया जाताहै। उनकी बहू-बेटियों को अपमानित होना पड़ता है। इसलिए दलितों को रिझाने के लिए उनके घरों में चुनाव के समय जाकर भोजन करना राजनीतिक स्वांग से अधिक कुछ नहीं जान पड़ता। अब जऱा दलित घरों में रोटी का रिश्ता जोडऩे वाले सवर्ण राजनेताओं से यदि कोई बेटी का रिश्ता जोडऩे की मांग कर बैठे तो कल्पना की जा सकती है कि उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय को साधुवाद। न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ और श्री वोपन्ना ने अपने निर्णय में कहा है कि आरक्षण योग्यता/मेरिट के खिलाफ नहीं है बल्कि सामाजिक न्याय है तथा संविधान के बुनियादी उसूल को मजबूत किया है। राजनीतिक स्वार्थ के चलते सामाजिक समरसता का नाट्य करने वाली मनोवृत्ति लोकतंत्र को लूट लेने को आतुर है। इसे दलित समुदाय भी समझता है। लेकिन इस तरह के प्रायोजित उपक्रम सत्ताकांक्षी मनोवृत्ति पूरी निर्लज्जता के साथ करती । इस मनोवृत्ति पर बच्चालाल उन्मेष की कविता पुरज़ोर चोट करती है।