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जो आज नया है, वह कल पुराना होगा

जो आज नया है, वह कल पुराना होगा


 विजय मिश्रा ‘अमित‘

प्रतिवर्षानुसार 31 दिसम्बर को जनसमुदाय नववर्ष के स्वागत के लिए उल्लास में डूबे हुये जश्न की तैयारी में दिखाई दे रहा है। वहीं वर्ष 2020 का कैलेण्डर अपने अस्तित्व को सदा सदा के लिए समाप्त होने की अंतिम घड़ी की ओर टकटकी लगाये ताकते दिखा। उसे इस बात का अहसास हो रहा था कि जो कैलेण्डर रोज रोज तारीख बदलता रहा, उसी कैलेण्डर को 31 दिसम्बर की तारीख ने पूरी तरह से बदल कर रख दिया। जिंदगी का भी यही फलसफा है, जो आज है, वह कल नहीं रहेगा। जो आज नया है, वह कल निश्चित रूप से पुराना होगा।  

पुराना कैलेण्डर इस सच्चाई को स्वीकारने और हर दिन हर पल को भरपूर आनंद से जीने का संदेशा दे गया। वह अंत का नहीं, नवजीवन का उद्घोष करते हुए संदेश दे रहा था- ‘‘पौधों से गिरते पीले पत्तों ने बताया है कि जिंदगी का यह अंत नहीं, यह तो केवल साया है।‘‘ पुराने कैलेण्डर के चेहरे पर झुर्री और शरीर पर जर्जरता के भाव नहीं दिखे, बल्कि सफल सशक्त जीवन को पूरा करने का भाव वह व्यक्त कर रहा था। ढलते साल, सठियाना, पक जाना जैसे विचारों से कहीं अलग वह पूरी निष्ठा के साथ कर्तव्यनिवर्हन करने की चमक अपने चेहरे पर बनाये हुए मुस्कान बिखेर रहा था। आंखे नम करके चेहरा लटकाने के बजाय आत्मसंतोष का भाव लिए उसके फड़फड़ाते हुये पन्ने आंतरिक प्रसन्नता में डूबे सुमधुर गीत गुनगुना रहे थे।

नववर्ष के कैलेण्डर के लिए उसे अपनी जगह को छोड़ने का गम कम तथा खुशी अधिक थी, दरअसल उसने हर दिवस की महत्ता को हर दिन ईमानदारी से उजागर कर अपनी कर्तव्यपरायणता को निर्विवाद निभाया था। एक कैलेण्डर होने के धर्म को बखूबी निभाते हुये 2020 का कैलेण्डर संकेत दे गया कि संतोष की जिंदगी पाने का यही सूत्र है। पुराने कैलेण्डर के माथे पर कोरोना वायरस कोविड 19 सदा सदा के लिए कलंकित टीका की तरह दर्ज हो गया था। इसे भी सहते हुए कैलेण्डर संदेश दे रहा था कि जीवन में बुरे दौर से निपटने के लिए सदैव शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए।  

नये से पुराने हो जाने की दशा को पुराना कैलेण्डर बूढ़ापा कहने के बजाय ‘‘अनिवार्य सुखद परिवर्तन’’ का नाम दे रहा था। वर्षभर दीपावली, ईद, क्रिसमस, प्रकाश पर्व जैसे अनगिनत पर्वों के दिवस की जानकारी जनमन को देने के सुख की लकीर बारम्बार उसके चेहरे पर उभर रही थी। वह बयां कर रहा था कि विविध पर्वों के पीछे निहित भावनाओं और उद्देश्य के अनुरूप आचरण व्यवहार करेंगे तो आप कभी बूढ़े नहीं होंगे, क्योंकि उमंग, उल्लास, भाईचारा, मानवता, प्रेम,ज्ञान, परोपकार, नर्मता के भाव कभी वृद्ध नहीं होते। ऐसे गुणों के बीज को बोने, उगने और बढ़ने देने की ललक हमेशा मानव मन को युवा बनाये रखता है।

वर्षांत में सेवानिवृत्त होता हुआ कैलेण्डर यह भी कह रहा था कि दिन पर दिन गिनते हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे तो मुट्ठी में भरी रेत की तरह जिंदगी फिसल कर निकल जायेगी। दिन बीतते जा रहा है, उम्र बढ़ती जा रही है, आगे क्या होगा जैसे विचार-सवाल में उलझे रहने से तो असमय ही निश्चित रूप से बूढ़ापा एक रोग की तरह घेर लेगा। इससे बचने का आसान उपाय यही है कि हर दिन को नई ऊर्जा के साथ नयापन से भर दें। इसी सकारात्मक सोच को उजागर करते कैलेण्डर ने आखिरी दिन तक अपनी महत्ता को बनाये रखा।

बूढ़ा होना प्रकृति का नियम है, अतः बूढ़ा हो रहा हॅूं के गम में डूबने के बजाय कैलेण्डर यह सोचकर खुश होता रहा कि अपने अच्छे कर्मों से सेवाकाल को संपन्न कर सिर उठाये सेवानिवृत्त हो रहा हॅू। उसका यह आत्मविश्वास उसे हर दिन सर्वश्रेष्ठ होने का तमगा देता रहा। अपनी योग्यता को परखते-प्रदर्शित करते स्वयं को सशक्त बनाये हुये किसी भी प्रकार की कुंठा-ठहराव की स्थिति से निर्भय बना रहा, फलस्वरूप वह प्रथम दिवस से जिस कील पर, दीवार की उस जगह पर जहाॅ वह स्थापित हुआ था, उसे अंत तक यथावत अपने लिए सुरक्षित बनाये रखा। अंतिम दिवस पर कैलेण्डर मुस्कान बिखेरते हुये कह गया -

कुछ जीत अभी बाकी है, कुछ हार अभी बाकी है.

अब तक तो केवल एक अध्याय को पढ़ा है,

अभी तो पूरी किताब बाकी है।

(अतिरिक्त महाप्रबंधक(जनसम्पर्क), छ.ग.स्टेट पाॅवर कंपनी मुख्यालय, डंगनिया, रायपुर)