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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -बोल कि लब आजाद हैं तेरे

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -बोल कि लब आजाद हैं तेरे

देश में लगे 'आपातकाल को लेकर 45 वर्ष हो गये। 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी। विनोबा भावे ने आपातकाल को अनुशासन पर्व कहा था। अभिव्यक्ति की आजादी के लिए काम करने वाले और सत्ता के विरूद्ध बोलने वालों को जेल जाना पड़ा था। बहुत से अखबार बंद हुए थे। मेरे अग्रज स्वर्गीय बबन प्रसाद मिश्र युगधर्म रायपुर के संपादक थे। युगधर्म को भी तालाबंदी झेलनी पड़ी थी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिता की संतान को विरासत में आजादी की कीमत चुकाने के परिणाम मालूम थे। आपातकाल के समय दुष्यंत कुमार की गजलों के शेर जो अलग-अलग प्रतीकों के माध्यम से आपातकाल को बयां कर रहे थे, लोगों के लिए किसी आजादी के तराने की तरह थे, जो आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। पिछले दिनों देश के गृहमंत्री अमित शाह अपने भाषण में दुष्यंत कुमार के शेर सुना रहे थे।

साहित्य अपने आप में प्रतिपक्ष होता है। देश में जब आपातकाल लगा तो हिन्दी के मशहूर कवि, गांधीवादी चिंतक भवानी प्रसाद मिश्र ने आपातकाल के विरोध में प्रतिदिन सुबह-शाम कविता लिखने का संकल्प लिया और निभाया। बाद में ये कविताएं उनके संग्रह त्रिकाल संध्या में प्रकाशित हुई। आपातकाल का जितना विरोध राजनीतिक स्तर पर हुआ उससे कहीं ज्यादा विरोध लेखन के स्तर पर हुआ। बहुत से पत्रकारों को जेल जाना पड़ा जिनमें कुलदीप नैय्यर, गिरधर राठी जैसे नाम शामिल थे। बाबा नागार्जुन की इसी दौर में एक कविता बहुत लोकप्रिय हुई। इंदुजी, क्या हुआ है आपको, भूल गई है बाप को।

मेरे अग्रज स्वर्गीय बबन प्रसाद मिश्र ने अपातकाल पर एक कड़ा अग्रलेख लिखा। जिसका शीर्षक डी.आई.आर. यानी डंडा इंदिरा रूल था और मीसा यानी मेनटेनेन्स ऑफ इंदिरा सॉवरेनिटी था। उन्होंने कहा कि मैं अपने अग्रलेख में जितनी कड़ी शब्दावली में श्रीमती गांधी को कोस सकता था, वह मैंने किया। उन्होंने लिखा कि देश के नागरिकों को यह सोचना चाहिए कि बैंकों में सही समय पर काम हो, ट्रेनें समय पर आएं, शासकीय कर्मचारी समय पर काम करें इस हेतु क्या आपातकाल आवश्यक है? यदि केवल इस हेतु आपातकाल लगाया जा रहा है तो इसे कोई कैसे स्वीकृत देगा। जो जिस काम का वेतन लेता है उसे ईमानदारी से अपना कार्य पूरा करना चाहिए, यह धारणा मेरे जीवन में सदैव बनी रही। मानवीय प्रताडऩा और मानवीय सभ्यता के अपमान का आपातकाल का दौर इतना क्रूर और निरंकुश था कि मानवीय संवेदनाओं तक का हनन शुरू दिया गया था।

देश के वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने भी आपातकाल को याद करके हुए बहुत ही महत्वपूर्ण बात लिखी है। आपातकाल नहीं चाहिए तो फिर कुछ बोलते रहना बेहद ज़रूरी है! आज तमाम नागरिक अपने-अपने शासकों, प्रशासकों और सत्ताओं के ईको पाइंट्स के सामने खड़े हुए हैं। गाइड्स उन्हें बता रहे हैं कि ज़ोर से आवाज़ लगाइए, आपकी बात मानवीय चट्टानों तक पहुँचेगी भी और लौटकर आएगी भी, यह बताने के लिए कि बोला हुआ ठीक जगह पहुँच गया है पर बहुत कम लोग इस तरह के ईको पाइंट्स के सामने खड़े होकर अपने 'मन की बातÓ बोलने की हिम्मत दिखा पाते हैं। अधिकांश तो तमाशबीनों की तरह चुपचाप खड़े रहकर सब कुछ देखते और सुनते ही रहते हैं। सच तो यह है कि साहस करके कुछ भी बोलते रहना अब बहुत ही ज़रूरी हो गया है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो हम भी चट्टानों की तरह ही क्रूर, निर्मम और बहरे हो जाएंगे। तब हमें भी किसी दूसरे या अपने का ही बोला हुआ कभी सुनाई नहीं पड़ेगा। बोला जाना इसलिए ज़रूरी है कि ईको पाइंट्स और हमारी प्रार्थनाओं के शब्दों को अपनी प्रतिक्रिया के साथ वापस लौटाने वाली चट्टानों के बीच एक बहुत बड़ा सजीव संसार भी उपस्थित है। यह संसार हरदम प्रतीक्षा में रहता है कि कोई कुछ तो बोले। इस संसार में एक बहुत बड़ी आबादी बसती है जिसमें कई वे असहाय लोग भी होते हैं जिन्हें कि पता ही नहीं है कि कभी कुछ बोला भी जा सकता है, चट्टानों को भी सुनाया जा सकता है, बोले गए शब्दों की प्रतिध्वनि से संगीत का रोमांच भी उत्पन्न हो सकता है।

सच बोलने का साहस हर किसी के पास होता है जिनके पास होता है, उनकी आवाजें लौह कपाट के पार भी जाती है। सच की अभिव्यक्ति सहज है, लेकिन यह सहजता गहरे अंतर्दंध्द से पैदा होती है। लौह कपाट के भीतर बैठा व्यक्ति बाहर की हर ध्वनि को कान लगाए सुनता है, और जाहिर यह किया जाता है कि सारी आवाजें लौह कपाट से टकराकर वापस जा रही है, लेकिन उन लौटती आवाजों में भीतर बैठे व्यक्ति की बेचैनी की सूचना भी होती है। सामान्य जन की आवाज से डर कर दूर भागता व्यक्ति लौह कपाट के पीछे छिपना एक भ्रम है। डरा हुआ आदमी ज्यादा आक्रामक होता है। वह कमजोर को डराता है, और अपना शक्ति प्रदर्शन करता है। सामान्य जन की आवाजों में ऐसा क्या होता है कि लौह कपाट के पीछे बैठा विशेष व्यक्ति बेचैन हो जाता है। उन आवाजों में मांग नहीं होती है, याचना कहीं होती है। उन आवाजों में समय का सच होता है। लौह कपाट के पीछे बैठा राजा सच से डरता है। सामान्य जन की पुकार या आवाजों में खुशामद के गीत नहीं होते हैं, उसमें जनता की बदहाली का वर्णना होता है, इससे लौह कपाट कांपने लगते हैं। जनता बदहाल है, परेशान है, भूखी है ऐसा सच राजा को पसंद नहीं है। वह इसे सामान्य जन की बदहाली मानता है। उसे लगता है सामान्य जन को गुमराह किया जा रहा है। ऐसा सोचकर, वह खुद को तसल्ली देता है। राज जन की आवाज से डरता है क्योंकि सच की अनुगूंज इन्हीं आवाजों में होती है। कुछ लोग सोचते हैं लौह कपाट के पीछे तक आवाज नहीं जाती है। लेकिन सामान्य जन की आवाजें अपनी दूरी तय करते हुए देश के हालात की पुकार को भी साथ हो जाती है। राजा को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे जो आज चुप हैं कल बोलेंगे, जब वे जान जाएंगे कि लौह कपाट के पीछे भी आवाजें जा सकती है।

दुष्यंत कुमार ने उस दौर में जो गजल लिखी उनमें आपातकाल का विरोध बहुत ही साफ प्रतीकों में दिखाई दिया। आपातकाल खत्म हुआ। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से सत्ता बदली। जनता पार्टी का शासन आया। फिर जनता पार्टी में टूट-फूट हुई और कांग्रेस आई। इसी जनता पार्टी में से समाहित जनसंघ, बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी। अभिव्यक्ति की आजादी पर हुए प्रहार को पूरे देश ने आलोचना की। सलमान रूश्दी जैसे लेखक ने अपने उपन्यास मिड नाइट्स चिल्ड्रन में आपातकाल के 19 महीने को लंबी रात बताया। फैज अहमद फैज की एक गजल है।

बोल कि लब आजाद है तेरे, बोल जवां अब तक तेरी है

तेरा सुत्वां जिस्म है तेरा, बोल कि जो अब तक तेरी है।

चाहे फैज अहमद फैज हो, या गजानन माधव मुक्तिबोध सभी लेखक, शायर, कवि ने अपने-अपने समय में अभिव्यक्ति की आजादी की बात को प्रमुखता से उठाकर, अपनी रचनात्मकता के जरिये एक प्रतिरोध पैदा किया। आज जब लिखने के लिए सोशल मीडिया है, बोलने के लिए बहुत सारे मुद्दे हैं तो बहुत सारे लोगों के लब सिले हुए हैं। लोग जहां बोलना चाहिए वहां चुप रहते हैं। जहां दूर से प्रणाम करना चाहिए वहां लेटने लगते हैं। सत्ता का आकर्षण, दबाव इतना ज्यादा है कि जो अभिव्यक्ति की आजादी के सबसे बड़े लम्बरदार बनते हैं, वह मीडिया भी जनता को जरूरी मुद्दों से भटकाकर वो सब दिखा रहा है, जो उसके बुनियादी प्रश्न नहीं है। आज जब रोज पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ रहे हैं, कहीं से कोई बड़ा प्रतिरोध दिखाई नहीं देता। जब लाखों-लाख मजदूर भूखे-प्यासे सड़क नापते हैं, कहीं कोई बड़ा प्रतिरोध दिखाई नहीं देता। सारी सत्ताएं धीरे-धीरे या तो बहरी हो जाती है, या फिर वो सुनना पसंद करती है जो उन्हें पसंद है। ठकुर सुहाती सबको अच्छी लगती है। बहुत सारे लोगों को लगता है कि जब सभी जन चुप हैं तो हम बोलकर क्यों पंगा लें। कुछ लोगों का मानना होता है कि-

जैसी चले बयार, पीठ को तैसी कीजिए।

इसके विपरीत दुष्यंत कुमार जैसे शायर कहते हैं 'रोने गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नहीं पेटभर कर गालियां दो, जी भर कर बद्दुआ

बहरहाल दोस्तो, ये समय इस बात को लेकर सोचने विचारने का है कि चुप्पी सबसे बड़ा खतरा है,एक जिंदा आदमी के लिए आपातकाल को लेकर सबके अपने-अपने दावे हैं। आपातकाल के बाद बहुत से जेल यात्रियों को मीसाबंदी मानकर पेंशन भी दी गई, जिसे बाद में कुछ राज्यों में बंद भी किया गया। आजादी की लड़ाई में जेल जाने वालों की पीढ़ी अब लगभग समाप्ति पर है। आजादी की लड़ाई में शामिल सभी लोगों ना तो इतिहास है, ना ही बहुत से लोग उन्हें जानते हैं। इसी तरह आपातकाल के खिलाफ लडऩे वाले यदि वे राजनीतिक पार्टियों से नहीं जुड़े थे तो उन्हें भी लगभग बिसरा दिया गया है। सवाल किसी के याद करने, नहीं करने का नहीं है, सवाल है हमारी अभिव्यक्ति की आजादी का। सवाल है अपने समय के सवालों से रूबरू होकर उसके शब्द खड़े होने का। यदि हमें जहां जरूरी है, वहां भी नहीं बोला, लब नहीं खोला तो हमारी चुप्पी आने वाले दिनों में बड़ा अंधेरा, बड़ी खामोशी लाएगी। जहां से हमें केवल एक ओर से आती हुई आवाजें सुनाई देगी। हमारे नेता केवल अपने-अपने माध्यमों से अपने-अपने मन की अपनी बात कहेंगे, हमारी नहीं सुनेंगे। हमें आपातकाल को याद करके अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करते हुए ,जहां कहीं हस्तक्षेप जरूरी है, बोलना जरूरी है, बोलना चाहिए। 

'कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की

तुमने कह दी है जो कहने की सजा लो यारो।