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व्यंग्य : मिलिये श्रद्धांजलि विशेषज्ञ से - अखतर अली

व्यंग्य : मिलिये श्रद्धांजलि विशेषज्ञ से - अखतर अली


श्रीमान क श्रद्धांजलि विशेषज्ञ है | श्रद्धांजलि लेखन उनका शौक है , उनका नशा है | ये जब भी लिखे है श्रद्धांजलि ही लिखे है | कम से कम एक श्रद्धांजलि रोज़ लिखते है | इनका लक्ष्य है विश्व का सब से अधिक श्रद्धांजलि लिखने का रिकार्ड अपने नाम करना | श्रद्धांजलि लिखने के लिए ये किसी के दिवंगत होने का भी इंतेज़ार नहीं करते है | साफ़ साफ़ कहते है किसी का जीवित रहना मेरे लेखन को प्रभावित नहीं कर सकता | अगर लोगो के मरने का इंतेज़ार करता रहूगा तो लिखूगा कब ? जिससे भी खुश हो जाते उसकी श्रद्धांजलि यह सोच कर लिख लेते कि आड़े वक्त काम आएगी |

श्रद्धांजलि , यह इनके शब्दकोश का सब से हसीन शब्द है | कहते है इस शब्द में कूट कूट कर हुस्न भरा है | श्रद्धांजलि पर बात करो तो ये पहले से थोड़ा अधिक जी उठते है , ज़रा सा और जवान हो जाते है | बच्चे कहते भी है कि अब श्रद्धांजलि लिखना बंद करो तो कहते है जब तक लिख रहा हूं तभी तक जीवित हूं जिस दिन मै दूसरो के लिए लिखना बंद कर दूगा दूसरे मेरे लिए लिखेगे |

सुबह जल्दी उठ कर श्रद्धांजलि लिखते है | रात को देर तक जागते हुए श्रद्धांजलि लिखते है | आधी रात को नींद खुल जाती है तो श्रद्धांजलि लिखने बैठ जाते है | बीवी बच्चो से छुप छुप कर श्रद्धांजलि लिखते है | इन्होने अपना तख़ल्लुस श्रद्धांजलि रखा है , इनके मकान का नाम श्रद्धांजलि विला है , इनकी गाड़ी पर पीछे के कांच पर श्रद्धांजलि एक्सप्रेस लिखा हुआ है , इनकी दुकान का नाम श्रद्धांजलि गारमेंट्स है | कोई भी अच्छा शख्स मिलता है तो तुरंत उसके लिए श्रद्धांजलि लिख देते है | किसी ने देख कर मुस्काया , किसी ने नमस्ते किया , किसी ने हाल चाल पूछा और इन्होने उसकी हज़ार शब्दों की श्रद्धांजलि लिखी | एक श्रद्धांजलि इन्होने नौ सौ शब्दों में लिखी तो प्रश्नों की चौतरफ़ा बौछार हो गई कि सौ शब्द कम क्यों ? तब इन्होने कारण बताया कि स्वर्गीय गंजा था इसलिए उसके बालो का ज़िक्र नहीं किया गया है | अगर समाचार पत्रों में स्पेस की समस्या नहीं होती तो ये कुछ श्रद्धांजलि दो ढाई हज़ार शब्दों की भी लिखते | इनका कहना है कि कुछ किरदार इतने विशाल कद के है कि उन्हें हजार शब्दों में समेटना संभव है ही नहीं |

इनकी पेन ड्राईव और आलमारी में सैकड़ो श्रद्धांजलियां बरसो से रखी पड़ी अपने नायक के निधन की प्रतीक्षा कर रही है | शहर में इस बात की भी चर्चा है कि ये जिसकी भी श्रद्धांजलि लिखते है वह बहुत जीता है | इसी आधार पर दूर दूर से लोग इनके पास अपनी श्रद्धांजलि लिखवाने आते है | ये साहब भी हर किसी की श्रद्धांजलि नहीं लिखते है | आगंतुक इनके मापदंड पर खरा उतरना चाहिए | नेक , शरीफ़ , सच्चा , स्नेही , देशभक्त होना चाहिए तभी ये उसकी श्रद्धांजलि लिखते है | हल्के चरित्र वालो की श्रद्धांजलि लिखना इनको किसी कीमत पर भी मंज़ूर नहीं है यही कारण है कि इन्होने कई प्रसिद्ध लोगो की श्रद्धांजलि लिखने से साफ़ इनकार का दिया | अगर आदमी काबिल है तो उसकी श्रद्धांजलि लिखने में एक लम्हे की भी देर नहीं करते है और अयोग्य है तो दस बार भी मर जाये तो एक बार भी न लिखे |


जब भी शहर में किसी का निधन हुआ है पांच मिनट में ये श्रद्धांजलि लेख लेकर अखबार के दफ़्तर पहुच जाते है | अक्सर इनकी श्रद्धांजलि से ही लोगो को जानकारी मिलती कि अमुक का निधन हो गया है और जब तक लोग इनकी श्रद्धांजलि नहीं पढ़ लेते किसी के निधन की सूचना पर विश्वास ही नहीं करते | इनका श्रद्धांजलि लेखन इतना चर्चित हो चुका है कि हर प्रशिक्षु पत्रकार इनका साक्षात्कार लेना चाहता है | प्रशिक्षु पत्रकार की कोशिश होती है प्रतिभा को छापना और प्रशिक्षित की होती है टालना | इन्होने जिन जिन की श्रद्धांजलि लिख कर अपने पास सुरक्षित रखी है उसके व्यवहार में परिवर्तन आने पर उसकी श्रद्धांजलि में भी परिवर्तन करते रहते है यह समझते हुए भी कि पुनर्लेखन मूल लेखन से ज़्यादा कठिन कार्य है |

अपनी श्रद्धांजलि लिखवाने लोग इनके दरवाज़े के सामने कतार में खड़े रहते है | ऐसे बहुत से लोग है जिनकी अंतिम इच्छा यही है कि बस एक बार अपनी श्रद्धांजलि पढ़ ले तो फिर चैन से मरे | उसमे कुछ जुडवा सके कुछ हटवा सके | जीवित लोग चिंतित है कि उनसे जीवन में गलती से जो गलती हो गई है वह गलती से भी श्रद्धांजलि लेख में न आ जाये | इस गलती को हटवाने वे गलती पर गलती किये जा रहे है |

आप श्रद्धांजलि में अचानक मृतक को महान नहीं बनाते है और न ही उसकी झूठी महानता के समकक्ष स्वयं को स्थापित करते | यह भी नहीं लिखते के इनके निधन के साथ एक युग का अंत हो गया , अब इनका रिक्त स्थान भर पाना असंभव है | यह भी नहीं लिखते की यह मेरी व्यक्तिगत क्षति है , और न ही यह लिखते है कि वह जितने अच्छे लेखक थे उससे अधिक अच्छे इंसान थे |


श्रीमान क ऐसा बिलकुल भी नहीं लिखते जैसा पाठक पढ़ना चाहता है , ये वैसा ही लिखते है जैसा ये लिखते है , जैसा वो लिखना चाहते है , जैसा वो लिखना जानते है , जैसा उनका तरीका है जैसा उनका अंदाज़ है | श्रीमान क तो महफ़िलो और गोष्ठियों में बेबाक कहते है कि वह लेखक ही क्या जो पाठक के रंग में रंग गया लेखक तो वह है जो अपने रंग में पाठक को रंग दे | उनका स्पष्ट कहना है कि पाठक लेखक की उंगली पकड़ कर चले न कि लेखक पाठक की |

इनकी लिखी श्रद्धांजलि इतनी सजीव और सच्ची होती है कि इसे सत्य घटना भी कह सकते है | कितने ही लोग सिर्फ़ इसलिये बिगड़ने से बचे रहे कि श्रीमान क को ही उनकी श्रद्धांजलि लिखनी है | श्रद्धांजलि लेखन में लेखन की बेहतरीन मिसाल पेश करते है | इनकी लिखी श्रद्धांजलि पढ़ कर लोगो के मन में मरने का लालच पैदा हो जाता है | पढ़ते पढ़ते लोग तो यह भी सोचने लगते है कि काश इसके बजाए हम ही मर गए होते |


ये श्रद्धांजलि में अवगुण का भी ज़िक्र करते है लेकिन ध्यान रखते है कि जुर्म से बड़ी सज़ा न हो जाये | श्रद्धांजलि में शब्द इतने नर्म नाज़ुक इस्तेमाल करते कि लगता मरहूम की मज़ार पर फूलो की चादर बिछा दी हो | इनके लिखे एक वाक्य में से कई वाक्य निकलते है , एक शब्द के अंदर कई शब्द समाये रहते है | श्रद्धांजलि में मृतक चलता फिरता नज़र आता है | श्रद्धांजलि तो श्रद्धांजलि लगती ही नहीं लगता है कोई हाकी मैच की कामेंट्री कर रहा है | आलेख के एक एक शब्द में से दिवंगत के जिस्म की खुशबू आती है |

एक अनौपचारिक बातचीत में जब इनसे पूछा गया कि श्रद्धांजलि सभा में महिलाओं की उपस्थति नगण्य क्यों होती है ? तो इन्होने कहा – इसका मुख्य कारण सभा के अंत में दो मिनट का मौन है | अगर इसे हटा दिया जाये तो महिलाओं की उपस्थिति बढ़ सकती है |

श्रीमान क की लिखी श्रद्धांजलि पूरी तरह श्रद्धांजलि होती है और श्रद्धांजलि के अतिरिक्त और कुछ नहीं होती | यह न तो कविता की तरह होती है न कहानी की तरह , निबंध की तरह होती है न गज़ल और कव्वाली की तरह | इसलिये जब भी इनकी लिखी श्रद्धांजलि किसी पत्र पत्रिका में छपती है तो अंत में यह लिखने की ज़रूरत नहीं होती कि लेखक वरिष्ठ श्रद्धांजलिकार है |