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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -अभी तो खुश्क है मौसम, बरसात हो तो सोंचेंगे

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -अभी तो खुश्क है मौसम, बरसात हो तो सोंचेंगे

-सुभाष मिश्र

बस्तर में चिंतन शिविर के मांदर की थाप नृत्य करते भाजपा के नेताओं के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा हैं। उसी समय अवर्षा की स्थिति से चिंतित बस्तर का आदिवासी किसान आसमान की ओर उम्मीद से ताक रहा है। छत्तीसगढ़ के अधिकांश जिले इस समय अवर्षा की स्थिति से जूझ रहे हैं। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में पीने के पानी का भी गहरा संकट होगा। इसी बीच देश में चल रहा किसान आंदोलन विस्तारित होकर छत्तीसगढ़ की पुण्य नगरी राजिम में किये जाने की व्यापक तैयारी चल रही है। देशव्यापी किसान आंदोलन के दस महीने पूरे हो जायेंगे। 25 सितम्बर को किसानों की मांगों को लेकर भारत बंद का आह्वान है। 28 सितम्बर को राजिम में किसान महा पंचायत होने जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा लाए गये कृषि और आम उपभोक्ता विरोधी कानूनों को रद्द करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि उपजों की खरीदी की गारंटी देने को लेकर चल रहे इस आंदोलन के प्रति सरकार का रूख उदासीन है। सरकार और प्रकृति दोनों ही इस समय किसानों के साथ में दिखाई नहीं दे रही है। अवर्षा की स्थिति के चलते अभी तक धान रोपाई का काम भी ठीक ढंग से पूरा नहीं हो पाया है। छत्तीसगढ़ का किसान 15 अक्टूबर के बाद धान की कटाई शुरु कर देता था। लेकिन इस बार धान लगी ही नहीं है तो काटेगे कैसे?

राजनीतिक दल भाजपा बस्तर चिंतन शिविर के माध्यम से अगले विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी की फसल लहलहाते देखना चाहती है। सत्तारूढ़ कांग्रेस की चिंता राजनीतिक स्थितियों और मौजूदा स्थिति को लेकर है। किसान असहाय स्थिति में आसमान ताकने को मजबूर।

वनों से आच्छादित बस्तर का जनजातीय समाज अब धीरे-धीरे वनोपज के साथ-साथ धान, गेंहू, तिलहन, दलहन और वनोषधी की खेती भी करने लगा है। छत्तीसगढ़ के धमतरी, रायपुर, बलौदाबाजार, चांपा, जांजगीर जैसे जिले में नहरों के माध्यम से सिंचाई की जो सुविधा है, उस तरह की सुविधा बस्तर में नहीं है। बस्तर का किसान पूरी तरह आसमानी वर्षा पर निर्भर है। बस्तर के सुकमा को छोड़कर बाकी जगह औसत से भी कम वर्षा हुई है। छत्तीसगढ़ में सिंचित फसल का कुल रकबा 46 लाख हेक्टेयर है। पिछले कुछ सालों में सिंचाई क्षमता में ऐसी वृद्धि नहीं हुई जो किसानों को दो फसली कृषि के लिए प्रोत्साहित करें। सरकार अवर्षा से निपटने आकस्मिक प्लान तैयार कर रही है, इस आकस्मिक प्लान में जो फसले लगाने की सोचे हैं, उसे भी भी पकने में 60 से 65 दिन तो लगेंगे ही।

छत्तीसगढ़ में यदि वर्षा की स्थिति की बात की जाये तो प्रदेश की औसत वार्षिक वर्षा 12628 मि.मी. है। 31 अगस्त 2021 की स्थिति में छत्तीसगढ़ मे औसत वर्षा 792.8 मि.मी. दर्ज की गई है। जो की सामान्य वर्षा 913.6 मि.मी. से 120.8 मि.मी. (12 प्रतिशत) कम है। पिछले साल इसी अवधि में 1035.8 मि.मी. वर्षा दर्ज की गई थी। छत्तीसगढ़ में असमान्य एवं खंड वर्षा के कारण 28 जिलों में से 12 जिले अल्पवर्षा, अनावृष्टि से प्रभावित है।

खरीफ के इस मौसम में छत्तीसगढ़ में कुल 48.08 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में विभिन्न फसलों की बोनी की गई थी। खरीफ वर्ष 2021 के लिए 48.20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में विभिन्न फसलों की बोनी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अब तक 48.63 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में विभिन्न फसलों की बोनी की जा चुकी है जो खरीफ के कुल लक्ष्य का 95 प्रतिशत गत वर्ष इसी अवधि में 47.03 लाख हेक्टर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बोनी की गई थी। अब तक धान बोता 25.78 लाख हेक्टेयर जो लक्ष्यका 101 प्रतिशत एवं रोपा 11.35 लाख हेक्टर में हो चुकी है जो लक्ष्य का 99 प्रतिशत है। छत्तीसगढ़ प्रदेश में माह जुलाई में 34 प्रतिशत एवं माह अगस्त में 12 प्रतिशत कम सामान्य वर्षा से कम दर्ज की गई,जिसके कारण बोता धान में बियासी का कार्य प्रभावित हुआ है।

नजरी फसल आकलन के अनुसार खरीफ वर्ष 2021 में 37 लाख 12 हजार 690 हेक्टेयर क्षेत्र में धान की बोनी की गई जिसमें से 3 लाख 34 हजार 173 हेक्टेयर क्षेत्र की फसल अल्प वर्षा से प्रभावित हुई है। 51 तहसीलों में 0-30 प्रतिशत फसल क्षति आकलन किया गया जिसमें से 19 तहसीलों में 31-50 प्रतिशत फसल क्षति आकलन पाया गया। सरकार ने अवर्षा से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए आकस्मिक कार्ययोजना भी बनाई है। इस योजान के तहत असिंचित हल्की भूमि में कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें जिनमें उड़द, मूंग, तिल, रामतिल एवं मक्का की बोनी तथा दलहनी एवं तिलहनी फसलों हेतु अधिक वर्षा होने की स्थिति में जल निकास की व्यवस्था जैसी बातें समाहित है।

छत्तीसगढ़ में कृषि कार्यो की समीक्षा के लिए 6 सितम्बर को कृषि पर गठित संसदीय स्थायी समिति, जिसमें लोकसभा, राज्यसभा के सांसद और भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी शामिल है ,छत्तीसगढ़ आ रहे है।

छत्तीसगढ़ की भूपेश बधेल सरकार जो किसानो की सरकार कहलाती है वह केन्द्र सरकार की नीतियों की वजह से दुविधा में है। भारत सरकार के खाद्य मंत्रालय ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना में छत्तीसगढ़ में लगाई जाने वाली सभी फसलो पर आदान सहायता राशि देने की बात कही है। यदि राज्य सरकार ऐसा नहीं करेगी तो एफ.सी.आई. धान नहीं लेगा। इस साल 105 लाख मे.टन धान खरीदी का लक्ष्य है। जिसमें से करीब 65 से 70 लाख टन चांवल प्राप्त होगा। राज्य की जरुरत मात्र 12 से 15 लाख टन ही है। यदि मौसम मेहरबान हो गया और धान का उत्पादन ठीक ठाक रहा तो बाकी धान का क्या होगा यह भी यक्ष प्रश्न है ?

छत्तीसगढ़ में उत्पन्न हो रही सूखे की स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार के पास राज्य आपदामोचन निधि में करीब 400 करोड़ का प्रावधान है। जिसमे केंद्र का 60 और राज्य का 40 फीसदी हिस्सा है। यह हर साल वित्त आयोग की सिफारिश पर राज्यों को मांग के अनुसार मिलता है। गत वर्ष इसी निधि से किसानों को करीब 180 करोड़ रूपये बांटे गए थे। छत्तीसगढ़ सरकार ने गर्मी में बेमौसम वर्षा, ओलावृष्टि और आंधी-तूफानों से फसलों को नुकसान होने पर 8 करोड़ 94 लाख 74 हजार रुपये किसानों को आर्थिक अनुदान दिया है।

छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री रवीन्द्र चौबे कहते हैं कि सरकार कम बारिश के कारण उपजे हालात परनजर रखे हुए हैं। जिन तहसीलों में हालात ठीक नहीं है, वहां नजरी आकलन करवाया जा रहा है। हमें भी हफ्ते-दस दिन में अच्छी बारिश से हालात सुधरने की उम्मीद है।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. संकेत ठाकुर का मानना है कि कम बारिश में भी फसलें अभी बहुत ज्यादा खराब नहीं हुई। 8-10 दिनों में बारिश हुई तो हालात सुधर सकते हैं। यह सही है कि इस बार वर्षा का नेचर अनियमित व खंडवर्षा वाला है। जिसकी मार फसलों पर पड़ी है।

उर्दू का एक शेर है
अभी तो खुश्क है मौसम बरसात हो तो सोचेंगे
हमें अपने अरमानों के बीज किस मिट्टी में बोना है।।

किसान बोये गये रोपों को फसल में तब्दील होते देखना चाहता पर उसके लिए पानी जरूरी है जो अभी कहीं रूका हुआ है, पता नही मांदर की थाप के बीच बादल कब झूमकर बरसेंगें।